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संदेश

सद्गुरु से बंगलुरु तक

मन माने न  ------------ घर में रहो तो बाहर जाने का मन होता है और बाहर जाओ तो घर लौटने का मन करता है। ये हमारा मन है जो कहीं टिकता ही नहीं है। गौर करें तो हम लालची नहीं हैं, हमारा मन लालची है। जो उपलब्ध है उससे हमारा मन उससे संतुष्ट नहीं रहता, 'कुछ नया, कुछ और' की रट निरंतर गूँजती रहती है। हम सबके घर में अत्यंत स्वादिष्ट भोजन बनता है, चाहे लौकी की सब्जी बनी हो, अच्छी लगती है लेकिन कभी-कभी बाहर किसी होटल में जाकर कुछ 'और' खाने का भी मन करता है। तो, प्रोग्राम बनाओ, सजो-सँवरो, पर्स चेक करो, वाहन को पोछो और पेट्रोल भराओ, सड़क में भीड़-भाड़ का सीना चीरते हुए रेस्तरां पहुँचो।  रेस्तरां पहुँचकर 'वेटिंग' में सावधान की मुद्रा में खड़े रहो, किसी के उठकर जाने के बाद खाली हुई टेबल से जूठा उठाते और उसे पोछते कर्मचारी पर नज़र रखो, कुर्सियाँ खिसका कर बैठो।  आर्डर लेने वाले बेयरा को आँखों के माध्यम से ढूंढो, मेनू पर दिमाग खपाओ, रेट देख कर अपने डूबते दिल को सम्हालो, अपने बजट के अनुसार सामान मँगवाओ, घरवाली या बच्चे किसी मंहगी चीज का आर्डर करें तो उन्हें उस सामान के निरर्थक हो...

ये लखनऊ की सरजमीं

लखनऊ का नाम सुनते ही दिमाग में उस तहज़ीब की याद आती है, 'पहले आप, पहले आप'. फिर फिल्म 'चौदहवीं का चाँद' (1960) केे उस गीत की याद आती है जिसे शकील बदायूँनी ने लिखा था : "ये लखनऊ की सरजमीं. ये रंग रूप का चमन, ये हुस्न और इश्क का वतन यही तो वो मुकाम है, जहाँ अवध की शाम है जवां जवां हसीं हसीं, ये लखनऊ की सरजमीं. शवाब-शेर का ये घर, ये अह्ल-ए-इल्म का नगर है मंज़िलों की गोद में, यहाँ हर एक रहगुजर ये शहर ला-लदार है, यहाँ दिलों में प्यार है जिधर नज़र उठाइए, बहार ही बहार है कली कली है नाज़नीं, ये लखनऊ की सरजमीं. यहाँ की सब रवायतें, अदब की शाहकार हैं अमीर अह्ल-ए-दिल यहाँ, गरीब जां निसार है हर एक शाख पर यहाँ, हैं बुलबुलों के चहचहे गली-गली में ज़िन्दगी, कदम-कदम पे कहकहे हर एक नज़ारा दिलनशीं, ये लखनऊ की सरजमीं. यहाँ के दोस्त बावफ़ा, मोहब्बतों के आशना किसी के हो गए अगर, रहे उसी के उम्र भर निभाई अपनी आन भी, बढ़ाई दिल की शान भी हैं ऐसे मेहरबान भी, कहो तो दे दें जान भी जो दोस्ती का हो यकीं, ये लखनऊ की सरजमीं." इस बार जब लखनऊ जाने का सबब बना तो मेरी पत्नी माध...

दिलवाली दिल्ली

लेखक से साहित्यकार बनने की यात्रा लंबी होती है, कई किताबें छपवानी पड़ती हैं जबकि अंजान साहित्यकार से प्रतिष्ठित साहित्यकार की यात्रा और भी जटिल और समय-विनाशक होती है। मैंने जब लिखना शुरू किया तो सीधे आत्मकथा लिखना शुरू किया, जैसे कोई मेट्रिक पास छात्र थीसिस लिखने बैठ जाए। शुरुआत में ब्लॉग का सहारा लिया, फिर फेसबुक का, उसके बाद पहला खंड 'कहाँ शुरू कहाँ खत्म' पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। यह पुस्तक फिल्म 'जय संतोषी माता' की तरह अनपेक्षित रूप से हिट हो गयी। उसके बाद आत्मकथा का दूसरा खंड 'पल पल ये पल' और तीसरा खंड 'दुनिया रंग बिरंगी' पुस्तकाकार में आया। कुछ दिनों बाद शब्द चित्रों का एक संग्रह 'याद किया दिल ने', यात्रा संग्रह 'मुसाफिर जाएगा कहाँ' और उपन्यास 'मद्धम मद्धम' आ भी गया। एक गैर-साहित्यकार की छह साल में छह पुस्तकें? कुछ हड़बड़ी सी नहीं लग रही है क्या? निश्चयतः हड़बड़ी तो है। मेरा व्यापार और लेखन दोनों साथ-साथ चल रहा है, इसके लिए समय प्रबंधन करना होता है, साहित्यिक कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए समय निकालना पड़ता है। कह...

हमेशा हनीमून

'हमेशा हनीमून' (Honeymoons are forever) उत्सव नहीं है, एक सोच है। साथ रहने का सुख, बतियाने का सुख, एक-दूसरे का हाथ थाम कर गुदगुदी महसूस करने का सुख और 'हमारा साथ बना हुआ है' की तसल्ली का सुख। लहर में कांपती नाव में कदम रखती पत्नी को हाथ से सहारा देकर बुलाने के उपक्रम में कहीं दूर एक मधुर स्वर कानों में गूँजता सा है, 'कहाँ ले चले हो, बता दो मुसाफिर, सितारों के आगे, ये कैसा जहां है...' हनीमून की बात इसलिए निकली, कि ट्रेन में मिली एक नवयुवती ने हमसे पूछा, 'आप लोग नैनीताल क्यों जा रहे हैं, घूमने?' 'घूमने नहीं, हनीमून मनाने।' मैंने उत्तर दिया। उसके चेहरे पर विस्मय मिश्रित मुस्कान फैल गयी, आँखें तनिक बड़ी हो गयी, गाल और कान गुलाबी हो गए। फिर उसने मेरे पके बालों पर नज़र डाली, उसके बाद माधुरी जी के काले बालों पर नजर घुमायी, ऐसा लगा जैसे उसके मन में कोई सवाल आया लेकिन उसकी ज़ुबान नहीं खुली, वह चुप रह गयी और मुस्कुराते हुए ट्रेन के बाहर देखने लगी। हम दोनों ने भी एक-दूसरे को देखा और उस लड़की की तरफ देखने लगे। जब माहौल सहज हो गया तो मैंने बालिका को समझाया, ...