मिस्र की मिस्ट्री
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(१)
जब मैं नवीं कक्षा में पढ़ता था तो फिल्म 'जंगली' में सायराबानो को देखकर मेरे दिल ने उन्हें बाहों में समेट लेने की तमन्ना की थी। ऐसी ही ख़्वाहिश 'मेरे महबूब' में साधना को देखकर भी हुई। इसी तरह की और भी अनेक ख्वाहिशें दिल में समाई और सिर पटक-पटक कर टें बोल गई। मैं समझ गया कि मुझे जो मिलना होगा वह तदबीर से नहीं, तकदीर से मिलेगा।
किशोरावस्था में यात्रा वृतांत पढ़ने का बहुत शौक था। इस विषयक जो भी पुस्तक मिलती उसे बड़े प्यार से पढ़ता, लेखक के साथ घूमते हुए पढ़ता था। उन दिनों पढ़ी पुस्तकों में राहुल सांकृत्यायन की 'वोल्गा से गंगा तक', धर्मवीर भारती की 'ठेले पर हिमालय', रामेश्वर नौटियाल की 'मेरी विश्व यात्रा', सतीश कुमार की 'बिना पैसे दुनिया का सफर' आदि की याद आज भी ताज़ा है। उसी दौरान भगवतशरण उपाध्याय की पुस्तक 'पुरातत्व का रोमांस' मेरे हाथ लगी जिसमें तूतनखामेन की कब्र के रहस्योद्घाटन पर एक अध्याय इतना रोचक था कि उसे पढ़कर मैंने कभी-न-कभी मिस्र देखने की चाहत अपने दिल में सँजो ली थी। तकदीर ने अपना काम किया और 68 वर्ष की उम्र में मेरी वह चाहत पूरी हो गई। मैंने मिस्र देखा, वह सब देखा जो तूतनखामेन की कब्र की खोज में बाहर निकल कर आया। जो देखा वह अद्भुत था, अपूर्व था और उस वैभव को अपनी आँखों से देखे बिना समझ पाना असंभव है।
घुमक्कड़ी एक शौक है, खर्चीला और तन को कष्ट देने वाला शौक। यह जिसे लग गया उसकी दीवानगी उसे पागलपन के शुरू होने की सीमा तक ले जा कर छोडती है। आम तौर ये वे लोग होते हैं जो प्रकृति को अपनी आँखों से घूम-घूम कर निहारना चाहते हैं, कुछ लोग नए लोगों से परिचय और बातें करना चाहते हैं। कुछ में आज़ादी की खुली हवा में जीने की ललक होती है जो उन्हें घर की घुटन से निकालकर बाहर धकेल देती है।
घर-गृहस्थी से जुड़े लोग घूमने-फिरने का मन करते हैं लेकिन उनकी विवशताएं उनके पैरों की जंजीर बनकर उन्हें बांधे रखती हैं और वे अपनी कल्पना में ही यात्रा कर लिया करते हैं। जब मेरे उमंग के दिन थे तब यात्रा के शुभ मुहूर्त यदा-कदा निकलते थे, वह भी रिश्तेदारी में जाने के लिए। घर के बड़ों से लड़-झगड़ कर मैं कभी-कभार ही निकल पाया, अन्यथा दिल की दिल में ही रह गई। अब बुढ़ापे में, जब घुटने डगमगाने लगे हैं, घुमक्कड़ी की सुविधा बन गई है इसलिए अपनी घरवाली को साथ देश-विदेश निकल जाता हूँ। अब ऐसा लगता है, न जाने कितने दिनों का हमारा यह साथ बचा है, न जाने कब तक यह शरीर साथ देगा इसलिए जितना हो सके घूम-फिर लिया जाए। आजकल हम दोनों बहुत घूम रहे हैं।
(२)
27 जनवरी 2016 को हम दोनों दूरंतो एक्स्प्रेस में सवार होकर मुंबई के लिए निकल गए, 29 जनवरी की सुबह छत्रपति शिवाजी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से इजिप्त की राजधानी काहिरा के लिए वायुयान में बैठकर उड़ चले। नौ घंटे की यात्रा के बाद जब हमारा यान काहिरा एयरपोर्ट पर उतरा, हम बाहर निकले तो ठंडी हवाओं ने पूरे शरीर को कंपकपा दिया। ये क्या हुआ ? गर्मी में ठंडक का एहसास ! हम तो रेगिस्तानी भूमि पर गर्मी का सामना करने आए थे लेकिन यहाँ हमारा स्वागत कश्मीरी-ठंड ने किया।
दोपहर तीन बजे हम लोग काहिरा से कुछ दूर बसे शहर गीज़ा पहुंचे जहां के 'पिरामिड्स पार्क रिसोर्ट' में हमारे रुकने की व्यवस्था थी। पांच-सितारा शैली का बना हुआ यह रिसोर्ट इतना पसरा हुआ था जैसे दो सूमो पहलवान बैठे-बैठे कुश्ती लड़ रहे हों। लिफ्ट का कोई काम नहीं, केवल भू-तल और प्रथम-तल। 'रिसेप्शन' से कमरों की दूरी इतनी अधिक थी कि चलते-चलते छाती हांफने लगे। इतने वृहद् आकार का 'स्वीमिंगपूल' और उसकी लाबी कि उतनी जगह में एक होटल खड़ा हो जाए। कमरे शानदार, गुदगुदे बिस्तर और मुलायम कम्बल-रजाई। कमरे में मिनी-फ्रिज, वार्डरोब, चाय बनाने का सामान। बताने का तात्पर्य यह है कि सब कुछ उच्च-स्तरीय। आधुनिक शैली का मनोरम बाथरूम जिसमें 'बाथ-टब' भी था। बाथटब को देखकर मुझे फिल्म 'झुक गया आसमान' के उस गीत की याद आ गई जिसे सायराबानो को नहाते हुए फिल्माया गया था-
'उनसे मिली नज़र कि मेरे होश उड़ गए
ऐसा हुआ असर, ऐसा हुआ असर
ऐसा हुआ असर कि मेरे होश उड़ गए...'
सोचा, सबसे पहले फिल्मी शैली में नहा लिया जाए लेकिन बाथरूम में न बाल्टी थी न मग, नहाएं कैसे ? बाथ-टब में घुसकर नहाने के अतिरिक्त कोई विकल्प न था। ठंड बहुत लग रही थी इसलिए गरम और ठंडे पानी का मिश्रण तैयार करके मैं टब में प्रवेश कर गया। उस टब-स्नान के दौरान मुझे कितनी परेशानियों से जूझना पड़ा, उसका लंबा किस्सा है, आपको कितना बताऊँ ? न शरीर में साबुन लगाते बने, न रगड़ते बने, न खखारकर थूकते बने, न नाक छिरकते बने। कोई कैसे नहाए ? पाँच मिनट में नहाकर बाहर निकल जाने वाले इन्सान को नहाने में आधा घंटा लग गया। 'फ्रेश' होने के बजाय मैं थक गया। आम तौर पर मैं एक बाल्टी भर पानी में नहा लिया करता हूँ जबकि टब-स्नान में लगभग तीस बाल्टी पानी बर्बाद हुआ। पानी की यह बर्बादी उसी तरह मूर्खतापूर्ण थी जैसे 250 मिलीग्राम पेशाब को बहाने के लिए आम लोग 'सिस्टर्न' का 'फ्लश' खोलकर पाँच लीटर पानी बहाते हैं।
सायराबानो जैसी कोमलांगी को बाथटब में घुसेड़ कर घंटों तक शूटिंग करने वाला निर्देशक लेख टंडन अगले जन्म में क्रोकोडाइल की योनि में जन्म लेगा, वह जीवन भर पानी में डूबा रहेगा, देखना !
(3)
भूख से बेहाल हम लोग बमुश्किल भोजन कक्ष खोज पाए जहां विविध व्यंजन हमारी प्रतीक्षा में थे। बेकरी में निर्मित विविध खाद्य पदार्थ, सूप, सलाद, फल, चांवल, दाल, सामिष-निरामिष साग-सब्जियाँ, जेम-जेली, शहद, योगर्ड, खजूर, फलों के रस आदि जो खाना-पीना हो, जितना लेना हो, करीने से सजा हुआ था। इतना विस्तृत और व्यवस्थित भोजनकक्ष मैंने पहली बार देखा था।
रात आठ बजे दो आरामदेह वातानुकूलित बस हम सबको अपने साथ लेकर नील नदी की ओर ले चली जहां पर नदी पर तैरते 'लांच' रात्रिभोज के लिए हमारा इंतज़ार कर रहे थे। बहुरंगी विद्युत झालरों से सुसज्जित लांच के द्वार पर तैनात अरबी वेषभूषा वाले एक लंबे-चौड़े इन्सान ने हमारी अगवानी की। भीतर छोटा सा रेस्तरां था जिसमें एक तरफ भोजन सजा हुआ था, मध्य में टेबल और कुर्सियाँ रखी हुई थी और समानान्तर स्थान पर मंच जैसी खाली जगह थी जहां दीवार के पास तीन कुर्सियों पर बैठे कलाकार संगीत की स्वर-लहरियाँ बिखेर रहे थे। लांच में लगे पारदर्शी काँच से गीज़ा शहर की रात का जगमगाता नज़ारा दिखाई दे रहा था। लांच बिना किसी कंपन के धीरे-धीरे नील नदी की सतह पर तैर रहा था और रात में बिखरी रोशनाई को चहुंओर प्रदर्शित कर रहा था। नील नदी के जल पर पड़ रहा शहर की विद्युत छटा का प्रतिबिंब बेहद सुहाना लग रहा था।
कुछ देर बाद कलाकारों की टोली बदली और चार नए सदस्य अवतरित हुए। इनमें एक गायक था और तीन बजायक। वे गीत हमारी समझ के बाहर थे पर सब सुन रहे थे, अचानक एक नर्तकी प्रगट हुई और उसने इजिप्त का प्रसिद्ध 'बेली' नृत्य प्रस्तुत करना आरंभ किया। अब मेरा ध्यान नील नदी के जगमगाते जल से हटकर नर्तकी की ओर केन्द्रित हो गया क्योंकि वह नृत्यबाला अपेक्षाकृत अधिक आकर्षक लग रही थी। मुश्किल से पाँच मिनट बीते होंगे, नर्तकी की देह मेरी दृष्टि से अनायास ओझल हो गई, केवल उसका नृत्य मेरी आँखों के समक्ष बच रहा। उसकी अद्भुत नृत्य-कला मुझे अपने देश की फिल्म अभिनेत्री-नर्तकी हेलेन की याद दिला रही थी- ''पिया तू, अब तो आ जा...'। आधे घंटे तक उस नृत्यबाला ने अपनी नृत्य साधना को हमारे समूह के समक्ष प्रस्तुत किया, उसका अंग-अंग नृत्यमग्न था, मनमोहक था और अभिनंदनीय भी। वाह।
साठ साल पुरानी यादें हैं, जब मैं बच्चा था, हमारे पास मोबाइल नहीं थे, कंप्यूटर नहीं थे, टीवी नहीं थे इसलिए कार्टून फिल्में नहीं थी, गेम एप्प नहीं थे, क्रिकेट नहीं था। माँ-बाप के पास उतना पैसा नहीं था इसलिए उनके दिल में हमारे लिए लाड़-प्यार भी नहीं था। घर के बाहर पतंग उड़ाते थे, बिल्ला खेलते थे, कंचे खेलते थे, गिल्ली-डंडा खेलते थे, कबड्डी खेलते थे, टीप-रेस खेलते थे, फुटबाल और हाकी खेलते थे। मैं इन सभी खेलों में फिसड्डी था। पतंग उड़ाऊँ तो वह आकाश में उड़ने की बजाय पेड़ में जाकर अटक जाए, बिल्ला लड़कियां खेलती थी, कंचे और गिल्ली-डंडा का निशाना मुझसे कभी नहीं सधा। मैं फुटबाल और हाकी अवश्य खेलता था लेकिन फारवर्ड खेलने का अवसर कभी नहीं मिला, हाँ, गोलकीपर बना दिया जाता था। आप तो जानते हैं, गोलकीपर वह प्राणी होता है जिसकी गोल बचाने पर कोई तारीफ नहीं होती लेकिन गोल हो जाने पर भरपूर गालियां खाने को मिलती हैं। घर-परिवार में भी मैंने आजीवन गोलकीपर की भूमिका निभाई, आज भी निभा रहा हूँ।
एक और खेल था, भौंरा चलाने का। भौंरा लकड़ी से बना एक गोल लट्टू होता था जिसमें सफ़ेद रस्सी को लपेट कर उसे इतनी ज़ोर से इस तरह फेंका जाता था कि वह जमीन पर कुछ देर तक घूमता रहता। अब तो बैटरी-चलित भौंरा आ गया है जो घूमते ही रहता है लेकिन हमारा वह भौंरा कुछ देर चलकर रुक जाता था। उसी उम्र में हम लोग अपने दोनों हाथों को समानान्तर फैलाकर गोल-गोल घूमते थे लेकिन सात-आठ चक्कर लगाने के बाद चक्कर सा आने लगता था और संतुलन बिगड़ने पर गिर भी जाते थे।
उस रात लांच में बेली नृत्य सम्पन्न होने के पश्चात एक नर्तक अवतरित हुए, कई परतों का घाघरा पहने हुए, फ्लोर पर गोल-गोल चक्कर लगाने लगे और आधा घंटे तक एक क्षण रुके बगैर एक ही दिशा में चक्कर लगाते ही रहे। वह 'दरवेश सूफी डांस' था जिसे 'तन्नूरा शो' कहते हैं। उसे देखकर मुझे अपने बचपन की याद आ गई जब हम चक्कर लगाते-लगाते गिर पड़ते थे। साथ ही ओशो-शिविर में किए 'नो डायमेंशन मेडिटेशन' की भी याद गई। फर्क यह था कि 'नो डायमेंशन मेडिटेशन' में दिशा बदल-बदल कर चक्कर लगाना होता है और सूफी डांस में केवल एक दिशा में, वह भी लगातार। नर्तक के घाघरे में असंख्य एल॰ई॰डी॰ बल्व लगे हुए थे जो उसकी खूबसूरती को बढ़ा रहे थे। घूमते -घूमते वह अनोखे करतब दिखाता रहा, दर्शकों के पास जाकर तस्वीरें खिचवाता रहा और सबका मन मोह लिया। नर्तक की नृत्य साधना, उसकी असीमित ऊर्जा और उसका फन देखने काबिल था, मेरे पास उसका वर्णन करने के लिए शब्द नहीं हैं। अप्रतिम नृत्यशैली जिसका आनंद देखकर ही लिया जा सकता है, मिस्र की उस नर्तन-कला को मेरे लाखों सलाम।
रात ग्यारह बजे जब भोजन ग्रहण करने के पश्चात क्रूज़ से बाहर निकले तो नील नदी की सतह पर लहरा रही ठंडी हवाओं ने हमें अपने आगोश में लपेट लिया। हमारी बस कहीं दूर खड़ी थी, उसके आने तक हम सब फुटपाथ पर खड़े-खड़े ठिठुरते रहे। जब बस आई तो हम लपक कर उसमें जा घुसे। आधे घंटे में रिसोर्ट आ गया, ठंड और अधिक बढ़ गई थी, कंपकंपी छूट रही थी। कमरा खोला और नर्म बिस्तर में लगी रज़ाई में घुस गए। रज़ाई के ऊपर दो कंबल भी थे लेकिन बिस्तर इतना ठंडा था कि ऐसा लगे, जैसे आज कुल्फी जम जाएगी। नव-विवाहितों के बिस्तर तड़-फड़ गर्म हो जाते हैं लेकिन हम तो 41 वर्ष प्राचीन विवाह के अवशेष हैं। वर्तमान दौर में हमारी तकियों के मध्य एक फुट चौड़ा फासला हुआ करता है इसलिए बिस्तर होते-होते गर्म होता है।
(४)
सुबह 4.30 का अलार्म बजा। हम दोनों फटाफट नहा-धोकर योग-प्राणायाम में लग गए। घड़ी आठ बजा रही थी, हमें नास्ता लेकर आठ बजे आरम्भ होने वाले ग्यारहवें अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के कार्यक्रम में उपस्थित होना था। दौड़ते-भागते नास्ता किया और काफी खोज-बीन की लेकिन सम्मेलन के कोई संकेत नहीं दिखे तो हम दोनों पुनः अपने कमरे में जाकर सो गए। ग्यारह बजे मेरी नींद खुली, मैंने माधुरी को जगाया। वे बोली- 'तुम जाओ, मुझे सोने दो।' वे रज़ाई तान कर फिर सो गई। मैं कमरे से निकल कर रिसेप्शन में पहुंचा, जहां मुझे बताया गया कि 'हबीबी हाल' में कार्यक्रम चल रहा है। कार्यक्रम आरंभ हो चुका था, मैं संभवतः आधा घंटा विलंब से पहुंचा।
सम्मेलन के चार सत्रों में लगभग ग्यारह घंटे तक साहित्यिक गतिविधियां चलीं, भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आए रचनाकारों ने अपने विचार व्यक्त किए, आलेख पढ़े, कविताएं सुनाई। अंतिम सत्र में सुश्री चित्रा जांगिड़ (जयपुर), सुश्री काजल मूले (भावनगर), सुश्री अनुराधा दुबे (रायपुर) ने कत्थक शैली में अद्भुत नृत्य प्रस्तुत किए। सुश्री ममता अहार (रायपुर) ने छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य की छटा बिखेरी।
अगली सुबह ओस के कोहरे से घिरी हुई थी। आज हमें मिस्र का अंदरूनी सफर शुरू करना था। मेरी बस में गाइड थी सू, जितनी खूबसूरत उतनी होशियार, उसे देखना और सुनना दोनों मोहक था। इजिप्त का इतिहास उसको रटा हुआ था, वर्तमान से जुड़े हर प्रश्न का उत्तर उसके दिमाग में था। वह तीन भाषाएँ जानती थी, अरबी, स्पेनिश और अंग्रेजी। वह धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलती थी, जितना अच्छा बोलती थी उतनी अच्छी भावभिव्यक्ति भी करती थी। उसने हमें बताया- 'इजिप्त का सबसे बड़ा शहर काहिरा है, आज हम आपको इजिप्त के दूसरे बड़े शहर अलेक्जेंड्रिया ले चलेंगे जो कारखानों का शहर है। इसे 'सिटी ऑफ फिशरमेन' भी कहा जाता है।'
31 वर्ष ईसा पूर्व वहाँ के शासक अलेक्ज़ेंडर ने इस शहर को बसाया था। मेरिडिटोरियन सागर के तट पर बसा यह शहर 35 किलोमीटर की लंबाई में बसा हुआ है। यहाँ की रातें रंगीन होती हैं और दिन बेहद व्यस्त। देश भर के लोग छुट्टियों में अलेक्जेंड्रिया पहुँच जाते हैं और मौज-मस्ती करते हैं। यहाँ का मौसम जनवरी और फरवरी में ठंडा रहता है, शेष दिनों में समशीतोष्ण। केवल एक बार सन 1961 में शहर का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक हो गया था।' सू ने बताया कि इजिप्त में कपास, गन्ना, फल और अनाज की पैदावार होती है। फलों में आम, संतरा, स्ट्राबेरी, केला और खजूर बहुतायत में होते हैं। पानी तथा बिजली के दाम बहुत मंहगे हैं। मकान की कीमतें आसमान में हैं।
चलती हुई बस में सू ने यह भी बताया- 'इजिप्त की राष्ट्रीय आय का सबसे अधिक हिस्सा स्वेज़ नहर में मालवाहक जल-जहाजों के आवागमन की वसूली से आता है। स्वेज़ नहर लाल सागर और मेरिडिटोरियन सागर को एक-दूसरे से जोड़ती है तथा योरोप को एशिया से जोड़ने वाला सबसे कम दूरी वाला मार्ग है। उसके बाद आय का दूसरा साधन है, पर्यटन जो पहले की अपेक्षा घटकर 25% रह गया है। अमेरिका और योरोप से आने वाले सैलानियों की आवक कम हो गई है जिसका पर्यटन उद्योग पर बुरा असर हुआ है। आय का तीसरा साधन है 'मनी ट्रांस्फर'। इजिप्त के लोग बड़ी संख्या में विदेशों में काम कर रहे हैं जिनका सबसे बड़ा सपना होता है, खुद का अपना मकान। वे अपनी बचत का पैसा यहाँ भेजते है ताकि वे जब स्वदेश लौटें तो अपने बनाए घर में रह सकें। इजिप्त का नागरिक दुनिया में कहीं भी नौकरी या रोजगार करे, वह कहीं नहीं रुकता, अपने देश वापस आता है, उसे अपने देश की धरती प्यारी लगती है।'
अलेक्जेंड्रिया की आबादी 44 लाख है। सैलानियों की सुविधा के लिए यहाँ कई रिसार्ट्स हैं, खूबसूरत समुद्र का किनारा है, आकर्षक बाजार है, क्लब और थिएटर हैं। इस शहर में एक ऐसा वृहद पुस्तकालय है जहां दो करोड़ किताबें आधुनिक ढंग से संग्रहीत हैं। पुस्तकालय का भवन बेहद आकर्षक और सुरुचिपूर्ण है। इसे देखे बिना कल्पना नहीं की जा सकती कि पुस्तकालय ऐसा भी हो सकता है। हमने पूछताछ कर यह पता करने की कोशिश की कि क्या हिन्दी भाषा का साहित्य उनके पास है ? उनके उत्तर से ऐसा लगा जैसे वे हिन्दी भाषा को जानते ही नहीं हैं। हमारे सहयात्री-साहित्यकार श्री जे॰आर॰ सोनी ने अपनी दो पुस्तकें उन्हें भेंट में दी, इस तरह अब उस पुस्तकालय में हिन्दी भाषा की भी पुस्तक सज गई।
अलेक्जेंड्रिया में एक रेस्तरां है जहां भारतीय शैली का स्वादिष्ट भोजन मिला, मज़ा आ गया। 230 किलोमीटर की वापसी यात्रा करके रात को नौ बजे हम सब गीजा स्थित अपने रिसोर्ट में वापस आ गए. आज बस-यात्रा बेहद मजेदार रही. केश रंजन, जयप्रकाश मानस, चित्रा जांगिड़ व अन्य साथियों ने रास्ते भर नाचते-गाते हुए खुशनुमा माहौल बनाए रखा. बस में ओडिशा अवतरित हुआ, राजस्थान और छत्तीसगढ़ भी.
(५)
मिस्र अर्थात 'अरब रिपब्लिक ऑफ ईजिप्त' एक अंतर्महाद्वीपीय देश है। इसका एक हिस्सा अफ्रीका, दूसरा एशिया और तीसरा योरोप महाद्वीप में अवस्थित है। 1010408 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल वाले इस देश के उत्तर-पूर्व में गाज़ा पट्टी और इज़राइल है, पूर्व में अकाबा गल्फ, दक्षिण-पश्चिम में लाल सागर, दक्षिण में सूडान और पश्चिम में लीबिया है। इस देश का अधिकांश इलाका सहारा मरुभूमि है, 40000 वर्ग किलोमीटर में नील नदी के आसपास आबादी वाला क्षेत्र है। अरब देशों में यह सर्वाधिक आबादी वाला देश है जिसका जनसंख्या की बहुलता में विश्व में पंद्रहवाँ स्थान है।
मिस्र का भूपृष्ठ केवल नील नदी के आस पास अधिक चौरस है। नदी के पश्चिम की भूमि धीरे धीरे ऊँची होती गई है (लगभग 1000 फुट तक), जहाँ हवा के प्रभाव से निर्मित चिकनी चट्टानें तथा लिबिया की रेगिस्तानी बालू दृष्टिगोचर होती है। नदी के पूर्वी ओर अरब के रेगिस्तान का विस्तार पाया जाता है, जो और आगे चलकर लाल सागर के निकट लगभग 7000 फुट ऊँची पहाड़ियों के रूप में परिणित हो जाता है। नदी के पश्चिमी ओर काहिरा के उत्तर में लगभग 80 किलोमीटर दूर फायूम की उपजाऊ भूमि है। यहाँ का अधिक भाग जलविहीन है, केवल नील नदी ही जल का स्रोत है। निचले मिस्त्र में नील नदी से नहरें निकाली गई हैं जिनका उपयोग जलमार्गो के रूप में तथा खेतों की सिंचाई के लिये किया जाता है। विश्वविख्यात स्वेज नहर भूमध्य सागर तथा लाल सागर को उत्तर-पूर्वी मिस्त्र में सिनाइ प्रायद्वीप से होकर जोड़ती है। कहीं कहीं पर मरूद्यान भी दृष्टिगोचर होते हैं जहाँ भूमिगत जल के प्रभाव के कारण पौधे उग जाते हैं।
मिस्त्र में शुष्क तथा गरम रेगिस्तानी जलवायु पाई जाती है। दिन में सूर्य की प्रखरता के कारण अत्यधिक गर्मी तथा रात में बालू की शीतलता के कारण अत्यधिक ठंड पड़ती है। भूमध्यसागरीय तट को छोड़कर देश के अधिकांश भागों में वर्षा नहीं होती। भूमध्यसागरीय तट की औसत वार्षिक वर्षा 8" के लगभग है। ऊपरी नील की ओर यह औसत केवल 1" के लगभग रह जाता है। मिस्त्र में दक्षिण की ओर से आने वाली हवाओं को 'खामसिन' कहते हैं। इन हवाओं के साथ गर्मी में धूल के भीषण तूफान आते हैं।
(६)
1 फरवरी की सुबह दोनों बस हमारे रिसोर्ट पर आ खड़ी हुई, सब बैठ गए लेकिन मैंने कल वाली बस बदल ली क्योंकि मैं दूसरी बस की खूबसूरत गाइड रिहब को देखना और सुनना चाहता था। रिहब भी मिस्र जानकारियों से भरपूर थी और वहाँ की सामाजिक परिस्थितियों और मनोविज्ञान पर उसकी पकड़ अच्छी थी। उसने बताया- 'मिस्र का अर्वाचीन इतिहास ईसा-पूर्व 3100 वर्ष का ज्ञात है जो मानव के उस समय सभ्य होने के प्रमाण हैं। मिस्र में पर्वत नहीं है, वर्षा भी नहीं है। यह देश सीधे-सीधे दो भागों में बंटा हुआ है, पूर्व और पश्चिम। पूर्व का आशय है सूर्योदय अर्थात जीवन और पश्चिम का संकेत है सूर्यास्त याने मृत्यु। मंदिर, मस्जिद, आवासीय घर आदि जो भी निर्माण हुए हैं, वे सभी पूर्व मिस्र में किए गए हैं। वहीं पर मृत्यु से जुड़े स्मारक पश्चिम में निर्मित हैं। इसीलिए सम्राटों की कब्रें पश्चिम दिशा में स्थित रेतीले मरुस्थल में स्थापित हैं। मिस्र में सूर्य और कमल का बहुत आदर है। यहाँ पुराने समय में सूर्य मंदिर बनाए गए हैं। एक रोचक बात यह है कि पुरातन काल में हुए सभी निर्माण युग्म में किए गए हैं, एक उत्तर दिशा में तो दूसरा दक्षिण में, जैसे, दो महल, दो मुकुट, दो अजायबघर आदि। अलेक्ज़ेंडर के समय से शासन करने के लिए परिवार परंपरा चली आ रही है, अर्थात शासक का पुत्र शासक। राजशाही के विरोध में सन 1952 में हुई क्रांति के पश्चात राजशाही का अंत हुआ, इजिप्त रिपब्लिक घोषित हुआ और 1953 में जन-प्रतिनिधियों के लिए चुनाव हुए। प्रथम राष्ट्रपति थे, मोहम्मद नगीब, उनके पश्चात क्रमशः गमाल अब्दुल नासेर, अनवर सादत, होस्नी मुबारक, मोहम्मद मोरसी और वर्तमान राष्ट्रपति हैं, अब्दुल फतह अल सिसी।'
'आज मैं आपको पश्चिम में फैले रेगिस्तान में बने प्राचीनतम पिरामिड को दिखाने ले जा रही हूँ जो सक्कारा में स्थित है।' हमारी गाइड ने बताया।
सक्कारा नील नदी के पश्चिम में है जो मिस्र की राजधानी काहिरा से लगभग 20 किलोमीटर के दूरी पर है। यहां के पिरामिड का प्रवेश-द्वार चूना-पत्थर से बना हुआ, दस मीटर ऊंचा यह द्वार चिकना और अत्यंत आकर्षक है। अंदर हम घूम-घूम कर उसकी दीवारें देख रहे थे, मोबाइल से तस्वीरें ले रहे थे, तभी एक खूबसूरत लड़की हमारे सामने पड़ी। हम लोग एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए। उसने हमसे पूछा- 'आप कहाँ से आए हैं ?'
'अरे, आप हिन्दी जानती हैं ? हम लोग भारत से आए हैं।' मैंने उत्तर दिया और पूछा- 'आप कहाँ से आई हैं ?'
'हम आपके दुश्मन हैं, पाकिस्तान से हूँ।' उसकी आवाज़ में थोड़ा तल्खी, थोड़ी मुस्कान और थोड़ी जिज्ञासा थी।
'अरे, हम आपके दुश्मन कैसे हो गए ? दुश्मन हों हमारे दुश्मन।' मैंने कहा। मेरी बात सुनकर वह खुश हो गई। उसने चेहरे में प्रसन्नता के अद्भुत भाव उभर गए। वह बोली- 'सच में ?'
'हां, सच में। हमारी-तुम्हारी क्या दुश्मनी ?'
'आप सही कह रहे हैं, हम दोनों में कैसी दुश्मनी ?'
'तुम्हारा नाम क्या है ?'
'मेरा नाम इसरा है, मेरे पापा आगरा के हैं और मम्मी सहारनपुर की।'
'ऐसा क्या ?'
'हूँ।' वह खुशी में झूम रही थी।
'तुम्हारी शादी हो गई क्या ?'
'अभी नहीं, कुछ दिन और जी लूँ।'
'अरे, क्या शादी के बाद ज़िंदगी नहीं होती ?'
'सुना है, ज़िंदगी होती है लेकिन ज़िंदादिली नहीं होती।' वह बोली।
'तुम्हारी फोटो ले लूँ ?' मैंने पूछा।
'श्योर।' उसने मुस्कान फेंकी और मिस्र की यात्रा में पहली मिसरी के डली हमारे मुंह में घुल गई।
सक्कारा के पिरामिड में जाने के लिए बने प्रवेशद्वार में केवल एक दरवाजा है, बाकी दीवारों से घिरा हुआ है। पिरामिड और अधिक बनते लेकिन उन दिनों राजकोष खाली हो गया था इसलिए न बन सके। सक्कारा का पिरामिड बाहर से धंसकने लगा है इसलिए ऊंचे बांस की चैली लगाकर सुधार कार्य किया जा रहा है ताकि यह प्राचीन धरोहर सुरक्षित रह सके।
मिस्र के शासक को 'फारो' नाम से जाना जाता था। इसे 'फारोह' भी लिखा जाता है। फारो को मिस्र के देवता होरस का पुनर्जन्म माना जाता था। होरस द्यौ (आकाश) का देवता था और इसे सूर्य भी माना जाता था। मिस्र के पिरामिड वहां के तत्कालीन फैरो के लिए बनाए गए स्मारक स्थल हैं, जिनमें उनके शवों को दफनाकर सुरक्षित रखा गया है। उनका पुनर्जन्म पर विश्वास था इसलिए उनके शव रासायनिक लेप लगाकर ताबूत में सुरक्षित रखे जाते थे जिन्हें 'ममी' कहा जाता है। उनके शवों के साथ खाद्यान्न, पेय पदार्थ, वस्त्र, गहनें, बर्तन, वाद्य यंत्र, हथियार, जानवर एवं सेवक सेविकाओं को भी दफनाया गया था ताकि जब जब फारो का पुनर्जन्म हो तो उसके उपयोग की सारी सुविधा उसे तुरंत प्राप्त हो सके।
भारत की तरह ही मिस्र की सभ्यता भी बहुत पुरानी है और प्राचीन सभ्यता के अवशेष वहाँ की गौरव गाथा कहते हैं। मिस्र में 138 पिरामिड हैं और काहिरा के उपनगर गीज़ा में तीन लेकिन सामान्य विश्वास के विपरीत सिर्फ गिजा का ‘ग्रेट पिरामिड’ ही प्राचीन विश्व के सात अजूबों की सूची में है। यह पिरामिड 450 फुट ऊंचा है। सन 1311 में लंदन में निर्मित लिंकन केथेड्रल के निर्माण के पूर्व तक यह दुनिया की सबसे ऊंचा निर्माण रहा। इसका आधार तेरह एकड़ में फैला है जो करीब सोलह फुटबॉल मैदानों जितना है। यह पच्चीस लाख चूना-पत्थरों के टुकड़ों से निर्मित है जिनमें से हर एक पत्थर का वजन दो से तीस टन के बीच है।
ग्रेट पिरामिड को इतनी परिशुद्धता से बनाया गया है कि वर्तमान तकनीक ऐसी कृति को दोहरा नहीं सकती। कुछ साल पहले तक (लेसर किरणों से नाप-जोख का उपकरण ईजाद होने तक) वैज्ञानिक इसकी सूक्ष्म सममिति (सिमट्रीज) का पता नहीं लगा पाये थे, प्रतिरूप बनाने की तो बात ही दूर है ! प्रमाण बताते हैं कि इसका निर्माण करीब 2560 वर्ष ईसा पूर्व, मिस्र के शासक खुफु के चौथे वंश द्वारा अपनी कब्र के तौर पर कराया गया था। इसे बनाने में लगभग 23 वर्ष लगे थे। म्रिस के इस पिरामिड को लेकर अक्सर सवाल उठाये जाते रहे हैं कि बिना मशीनों के, आधुनिक औजारों के मिस्रवासियों ने कैसे विशाल पाषाणखंडों को 455 फीट ऊंचाई तक पहुंचाया होगा ? कैसे इस बृहत परियोजना को महज तेईस वर्षों मे पूरा किया गया ? पिरामिड मर्मज्ञ इवान हैडिंगटन ने गणना करके हिसाब लगाया कि इसके लिए दर्जनों श्रमिकों के द्वारा साल के 365 दिनों में हर दिन दस घंटे के काम के दौरान हर दूसरे मिनट में एक प्रस्तर खंड को रखा गया होगा। क्या ऐसा करना संभव था ? ऐसा अनुमान है कि एक लाख श्रमिकों ने इस योजना को मूर्त रूप दिया है। विशाल श्रमशक्ति के अलावा प्राचीन मिस्रवासियों को क्या इतना गणितीय और खगोलीय ज्ञान रहा होगा ? विशेषज्ञों के मुताबिक पिरामिड के बाहर पाषाण खंडों को इतनी कुशलता से तराशा और लगाया गया है कि जोड़ों में एक पतली ब्लेड भी नहीं घुसायी जा सकती। मिस्र के पिरामिडों के निर्माण में कई खगोलीय आधार भी पाये गये हैं, जैसे कि तीनों पिरामिड ओरियन राशि के तीन तारों की सीध में हैं। वर्षों से वैज्ञानिक इन पिरामिडों के पीछे छिपे रहस्य को जानने के प्रयत्न में लगे हैं किंतु अभी तक ठीक से समझ नहीं पाए हैं।
ग्रेट पिरामिड एक पाषाण-कंप्यूटर जैसा है। यदि इसके किनारों की लंबाई, ऊंचाई और कोणों को नापा जाय तो पृथ्वी से संबंधित अनेक तथ्यों की सटीक गणना की जा सकती है। पिरामिड में नींव के चारों कोने के पत्थरों में बॉल और सॉकेट बनाये गये हैं ताकि ऊष्मा से होने वाले प्रसार और भूकंप से वह सुरक्षित रहे। पिरामिड में पत्थरों का प्रयोग इस प्रकार किया गया है कि इसके भीतर का तापमान हमेशा स्थिर और पृथ्वी के औसत तापमान २० डिग्री सेल्सियस के बराबर रहता है। मिस्रवासी पिरामिड का इस्तेमाल वेधशाला, कैलेंडर, सनडायल और सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी की गति तथा प्रकाश के वेग को जानने के लिए किया करते थे। पिरामिड को गणित की जन्मकुंडली भी कहा जाता है जिससे भविष्य की गणना की जा सकती है। कुछ लोग पिरामिडों में मानव स्वास्थ्य पर शुभ प्रभाव डालने वाले जादुई प्रभाव की बात भी करते हैं।
हमारी गाइड रिहब ने हमें चेताया कि पिरामिड का व्यास बहुत बड़ा है, यदि हमने उसकी परिक्रमा की तो एक घंटा लग जाएगा इसलिए हम उसे चारों तरफ जाकर न देखें इसलिए हम सब बस-स्टाप के सामने ही रहे। बहुत भीड़ थी। मिस्र के स्थानीय निवासियों के अतिरिक्त अन्य देशों के लोग भी उत्सुकता के साथ पिरामिड को निहार रहे थे, उसके ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। हम दोनों तलहटी में थे, एक सुमुखी बाला हमें देखकर मुस्कुरायी और हमसे पूछा- 'इंडिया ?'
'यस, इंडिया।' माधुरी ने स्वीकारोक्ति की।
'आई लव इंडिया। आय एम फातिमा...पेलेस्टाइन।'
'यासर अराफात वाज़ अवर फ़्रेंड, सो यू आर आल्सो अवर फ्रेंड।' मैंने कहा। वह खुश हो गई। उसने हमसे कहा- 'मे आई टेक योर फोटो ?'
'श्योर।' हम सबने एक-दूसरे के चित्र लिए। भाषा की समस्या थी, अधिक बात न हो सकी लेकिन हम सब इस तरह मिलकर भावविभोर थे। करीना कपूर जैसी खूबसूरत लड़की के बगल में खड़े फोटो खिंचवाने का सुख केवल काले-कलूटों को ही समझ में आ सकता है। वैसे एक बात आपको ऐसी बता सकता हूँ कि हिन्दुस्तानी युवतियाँ जल-भुन जाएंगी, पक्का । अपने देश में तो उँगलियों में गिनने लायक करीना कपूर हैं, इजिप्त और आसपास के देशों की हर लड़की करीना कपूर है। फक्क-गोरा रंग, मदहोश करने वाली आँखें, आँखों में मोटा कजरा, गुलाब के फूल जैसे होंठ, और भी बहुत सी खूबियाँ लेकिन सबसे ऊपर उनका गुण है, अपरिचितों के संग भी मधुर-संभाषण। हमारे देश की लड़कियों से बात करो तो खूबसूरत हों न हों, ऐसा भाव खाती हैं कि मत पूछो !
अचानक एक युवक ने मेरी पीठ थपथपाई- 'इंडिया ?'
'यस, इंडिया।' मैंने जवाब दिया, वह खुशी के मारे उछलने लगा- 'इंडिया... शारुख्खान, रितिक, अमिताभ ?'
'यू सी इंडियन फिल्म ?'
'यस, आई लव शारुख्खान।' वह बहुत देर तक हम लोगों से भारतीय फिल्मों के बारे में बात करता रहा और हमें अपनी माँ और छोटी बहन से मिलवाने ले गया। वे स्थानीय निवासी थे, सत्तर किलोमीटर दूर से पिकनिक मनाने आए थे। इजिप्त में हमारी फिल्में बहुत लोकप्रिय हैं, ये फिल्में हमारे देश की पहचान है। मुझे ऐसा लगा कि शाहरुख खान की लोकप्रियता वहाँ चरम पर है, मैंने कई युवतियों से बात की तो शाहरुख खान का ज़िक्र आते ही नाम सुनकर सम्मोहित हो जाती थी। कुछ लड़कियों ने तो झूमते हुए 'शारुख्खान' का नाम लिया और आसमान की ओर देखकर 'फ्लाइंग किस' भेजने लगी, एक बार नहीं, कई बार ! सच में।
(७)
पिरामिड देखने के बाद रास्ते में 'स्फ़िंक्स' दिखा, गाइड ने हमें बस में बैठे-बैठे दूर से दिखा दिया। जब हम लोगों ने बस से उतर कर पास जाकर देखने की इच्छा बताई तो उसने 'समय कम है, आपको और भी दो जगह ले जाना है' का कारण समझाया, हम उसकी बात मान गए लेकिन गाइड की चालाकी बाद में तब समझ आई जब दोनों बसें गीजा शहर की इत्र की और पेंटिंग्स की दूकानों के सामने दो-ढाई घंटे तक खड़ी रही और हम लोगों के द्वारा की गई खरीदी का कमीशन उनके खाते में जुड़ता रहा।
इत्र की दूकान का ज़िक्र करना ज़रूरी है क्योंकि वहाँ का सेल्समेन चतुर खिलाड़ी था, गंजे को कंघा बेचने की क्षमता-हासिल मनुष्य था और एक नंबर का लम्पट और मक्कार था। उस सुसज्जित चमकती-दमकती दूकान में हम सबका उसने प्रेम से स्वागत किया, 46 लोगों को गोलाकार बैठक में आराम से बिताया और सबसे पहले हमसे प्रश्न किया- 'आप कौन सी चाय लेंगे, पुदीने वाली या पिपरमेंट वाली ?' सबने अपनी पसंद बता दी। उसके बाद किसी सिद्धहस्त जादूगर की तरह उसने समां बांधना शुरू किया- 'देखिए, आप जिस जगह में बैठे हैं, वह कोई प्राइवेट दूकान नहीं है, सरकारी दूकान है। हम यहाँ पर आपको इत्र की ऐसी किस्में दिखाएंगे जो आपने कभी कहीं नहीं देखी होगी। ये इत्र हमारे इजिप्त की खासियत है, पहले आप नमूना देखिए।' उसके बाद हम सबके हाथ के पंजों में उसने इत्र की कई किस्मों को लगाया, सुंघवाया और प्रभावित कर लिया। उसने एक ऐसे इत्र के बारे में भी जानकारी दी जिसका उपयोग किसी भी उम्र में 'हनीमून' मनाने की ऊर्जा प्रदान करता था उसके बाद उसने विभिन्न इत्रों को औषधीय गुणों से जोड़कर उनके महत्व का बखान करना शुरू किया जिसे सुनकर यह समझ में आया कि इत्र का संबंध केवल सुगंध से नहीं है, इत्र अनेक गंभीर बीमारियों से निज़ात पाने का उपाय भी है। मुझे ऐसा लगा कि जैसे मैं अपने राष्ट्रपति भवन के उद्यान से निकलकर बाबा रामदेव के चिकित्सालय में पहुँच गया हूँ। उसकी ग्राहकी जम गई थी, कुछ सहयात्रियों के दिल उन इत्रों को खरीदने के लिए मचलने लगे तभी किसी ने आवाज़ उठाई- 'चाय का क्या हुआ ?'
ट्रे में चाय आई, हम सब गर्म चाय की आस लगाए उसका प्रवचन सुन रहे थे लेकिन चाय ऐसी आई जो न गर्म थी न ठंडी। स्वाद इतना बेहूदा था कि वह पी न जाए। अधिकतर लोग अपने हाथ में लगे इत्र को सूंघते हुए बाहर निकल आए लेकिन कुछ ने तगड़ी खरीददारी की। वहाँ से निकले तो मिस्र से संबन्धित 'पेंटिंग्स' की प्रदर्शनी में हमें घुसेड़ दिया गया। वहाँ भी लोगों ने मिस्र के यादगार बतौर कुछ पेंटिंग्स खरीदी। हम सब बस में वापस आकर बैठ गए तो गाइड ने हम लोगों से पूछा- 'आप लोगों ने क्या-क्या खरीदा ? जिसने खरीदा हो, अपने हाथ उठाएँ।' जिन्होंने हाथ उठाए, गाइड उनके पास गई, उनसे बिल मांगे, सब इकट्ठा किया और बस से यह कहते हुए उतर गई- 'जस्ट वेट प्लीज़, आय एम कमिंग वेरी सून।'
हम सब भौंचक्के होकर एक दूसरे को देख रहे थे।
(८)
मिस्र की कुल आबादी में 90% मुस्लिम हैं, अधिकतर सुन्नी मुस्लिम, शिया नहीं के बराबर; शेष 10% ईसाई हैं। सब एक-दूसरे से हिल-मिल कर रहते हैं, कोई विवाद या भेद उनमें नहीं उभरता। वे मुस्लिम और ईसाई बाद में हैं, पहले इजीप्शियन हैं। बस्तियाँ मिली-जुली हैं और खान-पान भी एक जैसा है। मुस्लिम परिवारों में ईद के मौके पर घरों में 'कुसरी' बनती है जो उनके भोजन की खास पाक-विधि है। बीफ, खास तौर से भैंसे का, वहाँ का अति-प्रिय व्यंजन है। 'बखलावा' नामक स्वादिष्ट मिठाई भी तैयार की जाती है। इसके अलावा पुडिंग और बेकरी की अनेक वस्तुएँ भी इस उत्सव का अनिवार्य अंग होती हैं, कुछ घरों में बनती हैं, कुछ बाज़ार से लाई जाती हैं।
मिस्र की सभी स्त्रियाँ हिजाब पहनती है क्योंकि पर्दा करना है, यह पवित्र कुरान का आदेश है। इजिप्त में आधुनिक लड़कियों ने बहुतायत में पश्चिमी फैशन अपना लिया है, ऐसे वस्त्र-धारण करती हैं कि अपनी मुंबई उनके सामने 'फेल' है लेकिन सिर पर 'स्कार्फ' अनिवार्य रूप से बंधा रहता है। बुर्का पहनकर घर के बाहर निकलने वाली महिलाओं की संख्या कम हो चली है। हमारी गाइड रिहब ने बताया- 'हमारे देश में महिलाओं ने चाहे जो पहन रखा हो, मर्द उन्हें घूर नहीं सकते। औरतों को घूरने पर सख्त बंदिश है। वैसे, बीमार मानसिकता वाले लोग जिस तरह पूरी दुनिया में हैं, वैसे हमारे यहाँ भी हैं लेकिन यहाँ स्त्रियॉं के साथ बलात्कार की घटनाएँ सुनाई नहीं देती क्योंकि बलात्कार की सज़ा सीधे आजीवन कारावास है। सभी इजीप्शियन एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, खास तौर से बुजुर्गों का, क्योंकि वे हमारी अमानत हैं।'
रिहब की बातें सुनते-सुनते हम पुनः 'स्फ़िंक्स' के समीप पहुँच गए जहां हमें वहाँ पर आयोजित रात्रिकालीन 'साउंड एंड लाइट शो' दिखाया जाने वाला था। सात बजे रंगीन प्रकाश और तेज संगीत से मरुस्थल पर स्थित 'स्फ़िंक्स' दैदीप्यमान हो उठा। मिस्र के प्राचीन इतिहास का विवरण हमें उस अतीत में ले गया जो अब से साढ़े चार हजार साल पहले जीवित था, अब भौतिक रूप से जर्जर हो गया लेकिन विलीन नहीं हुआ। वे अवशेष चुप हैं लेकिन उनकी क्षमता, शौर्य, कारीगरी और बुद्धिमता की कहानी बताने के लिए मूर्तमान होकर हमारे समक्ष प्रस्तुत हैं।
रेतीले रेगिस्तान की ठंड और तेज वायु-प्रवाह ने खुले-आकाश में आयोजित 'साउंड एंड लाइट' कार्यक्रम ने हमें कंपकंपा दिया, दिन भर की थकान ने हम पर असर डालना शुरू कर दिया था। वहीं पर नींद के झोंके आने लगे। आठ बजे कार्यक्रम समाप्त हुआ तब हम वहाँ से लौटे तो 'स्फ़िंक्स' को दिन के उजाले में करीब से देखने की हमारी इच्छा और अधिक बलवती हो गई। अगली सुबह फिर इसी जगह पर आने का संकल्प करके हम लोग अपने रिसोर्ट वापस आ गए। हम दोनों ने रात को उपवास करने का निर्णय लिया और तुरंत बिस्तर में घुस गए ताकि सुबह साढ़े चार बजे बजने वाले अलार्म का सम्मान हो सके और योग-प्राणायाम करने के लिए दो घंटे का समय हमारे हाथ में रहे। उसके पश्चात गहरी नींद ने हमें अपने आगोश में ले लिया।
(९)
अगली सुबह हमारी बस में माधुरी जी ने गांधीगिरी आरंभ की और 'स्फ़िंक्स' ले चलने के लिए दबाव बनाया। गाइड ने इंकार कर दिया और कहा कि वहाँ जाने का समय नहीं है। टूर आपरेटर कुणाल को बुलवाया गया, उन्होंने कहा- 'दूसरी बस के लोग 'स्फ़िंक्स' नहीं जाना चाहते, कैसा करें।'
'वे नहीं जाना चाहते तो न जाएँ, हम जाएंगे।' माधुरी जी ने आवाज़ उठाई। बस में बैठे अन्य लोगों ने भी उनका साथ दिया। बात असल में यह थी कि 'स्फ़िंक्स' जाने के लिए फिर से 'एंट्री' करनी पड़ती और पुनः प्रवेश शुल्क देना पड़ता जो 80 डालर के लगभग हो रहा था इसलिए टूर आपरेटर ने अपना पैसा बचाने की गरज से 'फूट डालो और राज्य करो' जैसी कोशिश की। जब हमारी बस वहाँ जाने के लिए अड़ गई तब दूसरी बस को भी हमारे साथ ले जाना पड़ा और कुछ देर बाद हम सब इजिप्त की शानदार प्राचीन कलाकृति के समक्ष खड़े होकर उसे निहार रहे थे।
ऐसा माना है कि गीज़ा के पिरामिड की सुरक्षा-प्रतीक के तौर पर तात्कालीन फारोह खूफू की मूर्ति स्थापित की गई थी जिसे 'स्फ़िंक्स' कहा जाता है। 'स्फ़िंक्स' को अरबी भाषा में अबू अल-हाल कहते हैं जिसका अर्थ है, डरावना। यह चूने के पत्थर से बनी है और विश्व में निर्मित सबसे बड़ी मूर्तियों में से एक मानी जाती है। यद्यपि यह विवादित है कि इसे कब बनाया और स्थापित किया गया है लेकिन जानकारों का अनुमान है कि इसे ईसा के लगभग 2500 वर्ष पूर्व बनाया गया था। इस विशालकाय संरचना की लंबाई 241 फुट, चौड़ाई 63 फुट और ऊंचाई 66.34 फुट है। इसे देखकर मुझे कोयम्बत्तूर के ध्यानलिंग मंदिर में आदियोगी शिव के समक्ष स्थापित नंदी की मूर्ति का ध्यान आ गया। अंतर सिर्फ इतना था, शिव और नंदी कि मूर्तियाँ एक-दूसरे के आमने-सामने बैठाई जाती हैं जबकि 'स्फ़िंक्स' पिरामिड के पहरेदार की तरह सामने मुंह किए बैठा था। 'स्फ़िंक्स' की शक्ल किसी मनुष्य की है लेकिन शेष देह शेर की अनुकृति है। उसे देखकर ऐसा अनुमान लगा जैसे मनुष्य के मस्तक में स्थित बुद्धि और शेर के शरीर के निहित शक्ति का मिश्रित संदेश 'स्फ़िंक्स' के माध्यम से दिया जा रहा हो।
न जाने कब यह संरचना रेत में दब कर छुप गई और अदृश्य हो गई। इसके कुछ अंश ईसा पूर्व 1400 वर्ष पहले एक युवा अन्वेषक तुत्मोज़ चतुर्थ के हाथ लगे। उसके एक सौ वर्ष बाद पुनः वह खोज कुछ आगे बढ़ी। निर्णायक उत्खनन सन 1817 में केप्टन जीवानी बतिस्ता कावग्लिया के द्वारा की गई जिसमें 'स्फ़िंक्स' का धड़ तक का हिस्सा बाहर दिखा। स्फ़िंक्स की सम्पूर्ण आकृति सन 1925 से 1936 के बीच किए गए उत्खनन में दुनिया के सामने आई जिसे पुरातत्ववेत्ता एमिल बेरेज़ ने खोजा।
यह विशालकाय मूर्ति इतनी भव्य है कि देखते ही बनती है, सम्भवतः मिस्र की सर्वाधिक आकर्षक कलाकृति। यदि इसे हम सूर्य के प्रकाश में इतने करीब से न देखते तो विश्व की इस प्राचीन महानतम कृति को आँखों में समेटे बगैर वापस आ जाते। धन्यवाद माधुरी और हमारी बस में बैठे सह-यात्रीगण।
आतंकवादियों का कहर इजिप्त पर भी हावी है। उसके चारों ओर खतरे-ही-खतरे हैं। पड़ोसी अरब देशों से घुसपैठिए लगातार घुसने की कोशिश में रहते हैं जिन्हें मिस्र की सेना सख्ती से रोकती है। दक्षिण में स्थित अफ्रीकी देश सूडान और लीबिआ उनके लिए सबसे बड़े सिरदर्द हैं जहां से 'ड्रग्स' तस्कर मिस्र में घुसकर नशे का अवैध व्यापार करते हैं। इजिप्त अपने पड़ोसी फिलिस्तीनियों का समर्थन करता है वहीं पर उसने स्वेज़ नहर से आवागमन करने के लिए इजरायल पर पाबंदी लगा रखी है। मिश्रवासी इन दोनों बेहद कठिन दौर से गुज़र रहे हैं, अर्थ-व्यवस्था डांवाडोल है। सीमाओं की सुरक्षा, तस्करों और आतंकवादियों की रोकथाम के अतिरिक्त लगातार कम हो रहा पर्यटन उनकी राष्ट्रीय आय पर विपरीत प्रभाव डाल रहा है। अमेरिका और योरोप के सैलानियों का इजिप्त आना एकदम कम हो गया है जिसका असर पर्यटन से जुड़े हर व्यवसाय पर पड़ रहा है।
चलती बस में हमारी गाइड रिहब हमें इजिप्त के इतिहास, भूगोल, राष्ट्रीय सोच, सामाजिक व्यवहार के बारे में विस्तार से और खुलकर बता रही थी। हमारे एक सहयात्री ने पूछा- 'आपके यहाँ तलाक होते है ?'
रिहब जो स्वयं तलाक़शुदा है, ने बताया- 'मुस्लिम रिवाज़ के अनुसार पुरुषों को तलाक देने और अन्य शादियाँ करने की इजाज़त है लेकिन यहाँ तलाक कम होते हैं। कम होने की वजह यह है कि इजिप्त के कानून के अनुसार तलाक़शुदा पत्नी और उसके बच्चे के भरण-पोषण को लेकर कानून बहुत सख्त है। तलाक देकर पति अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकता, बीवी के जीवनयापन की बढ़िया इंतजाम और बच्चे की परवरिश तथा पढ़ाई की पूरी व्यवस्था करना अनिवार्य है।'
'एक से अधिक शादियाँ तो कर सकते हैं ?' एक और प्रश्न उछला।
'क्यों नहीं, किसने मना किया है ? मैंने आपको पहले बताया कि वे तलाक दे सकते हैं, दूसरी-तीसरी शादी कर सकते हैं लेकिन आम इजीप्शियन इतना पैसेवाला नहीं होता कि वह एक से अधिक बीवी और उनके बच्चों के खर्च का बोझ उठा ले। एक का खर्च उठाने में तो पसीने आ जाते हैं क्योंकि इजिप्त बहुत मंहगा है।'
'फिर भी, तलाक तो होते होंगे ?' एक और सवाल आया।
'हाँ, अगर दोनों का निभना एकदम मुश्किल हो जाए तो तलाक होते हैं।' रिहब के चेहरे पर तनाव और पीड़ा के भाव उभरे और तत्क्षण विलीन भी हो गए, एक दक्ष 'प्रोफेशनल गाइड' की तरह।
(१०)
'स्फ़िंक्स' देखने के पश्चात हम लोग बस में बैठे रिहब से इजिप्त की राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर चर्चा कर रहे थे, तभी हमारी बस सड़क के किनारे रुकी और 'इजीप्शियन काटन फेब्रिक' के शोरूम के सामने खड़ी हो गई। इत्र और पेंटिंग की दूकान के बाद यह तीसरा पिंजरा सामने था जिसके भीतर हमें बेड़ने की तैयारी हो चुकी थी। हम लोग मिस्र के विश्वप्रसिद्ध संग्रहालय को देखना चाहते थे जहां तुतनखामेन (तुत-अंख-आमून) की कब्र से निकली धरोहर सुरक्षित की गई थी लेकिन बीच में यह नया 'कमर्शियल ब्रेक' आ गया। माधुरी जी ने अपनी सीट में बैठे-बैठे तेज आवाज़ में अपना विरोध दर्ज़ किया और अन्य सहयात्रियों को समझाया कि खरीददारी में व्यय किए हुए समय की कटौती संग्रहालय देखने के हमारे समय में होगी। लोगों को बात समझ में आ गई और कोई भी बस से नहीं उतरा लेकिन तब तक दूसरी बस के लोग उतरकर शोरूम में घुस चुके थे। हम दोनों भी तेजी से बस से उतरे, शोरूम में घुसे और उन सहयात्रियों से पूछा- 'इजिप्त कपड़े खरीदने आए हैं या यहाँ की प्राचीन धरोहर देखने ? टूर आपरेटर्स और गाइड हमारे कीमती समय के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और हम उनके शिकार बन रहे हैं।' हमारे समूह के 46 में से 2 लोग संभवतः कपड़े खरीदने के लिए ही मिस्र आए थे, उन्होंने हमें अनसुना कर दिया, वे कपड़े खरीदकर ही माने लेकिन बाकी सब लोग हमारी बात समझकर तुरंत बस में वापस लौट गए। दूकानदार हमारी हिन्दी भाषा को तो नहीं समझ पाया होगा लेकिन वह और गाइड यह समझ गए कि 'कुछ गड़बड़ है, आज नुकसान हो गया।'
किसी प्रकार हम लोग उस संग्रहालय तक पहुंचे जिसे देखने के लिए मन लालायित था, विशालकाय और अति-समृद्ध 'इजीप्शियन म्यूजियम।'
मिस्र की रेत की ढेर पर दबा हुआ इतिहास सदियों से जिज्ञासा का केंद्र रहा। अनेक पुरातत्ववेत्ताओं ने इस रहस्य को उजागर करने की कोशिश की, वे असफल होते रहे, नए आते रहे और उसके पीछे लगे रहे। मुसीबत यह हो गई कि जो भी इस रहस्य को जानने के लिए आगे बढ़ता, उसकी असामयिक मृत्यु हो जाती थी इसलिए किवदंती बन गई कि इस कब्र की खोज करने वाले व्यक्ति को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा और उसके हाथ कुछ नहीं आएगा।
विश्व में कई रहस्य ऐसे हैं जो अब तक उजागर नहीं हुए हैं लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कभी सामने नहीं आएंगे। मनुष्य की बुद्धि और उसकी लगन के आगे रहस्य भी नतमस्तक हो जाते हैं, ऐसा ही सन 1922 में हुआ जब हावर्ड कार्टर (1874-1939) ने अपने सहयोगी जार्ज हर्बर्ट के साथ मिलकर मानव सभ्यता के सर्वाधिक प्राचीन इतिहास को खोद कर संसार के समक्ष प्रस्तुत कर दिया और यह सिद्ध किया कि साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व भी मानव न केवल बलशाली था, वरन बुद्धिशाली व सभ्य भी था। हावर्ड कार्टर की पुस्तक 'द डिस्कवरी ऑफ द टोम्ब ऑफ तुत-अंख-आमोन' उनकी खोज के ऐतिहासिक प्रयासों व उपलब्धियों का दस्तावेज़ है।
सवाल यह है कि आखिर इस खोज में ऐसा क्या मिला कि पूरी दुनिया की नज़र इस ओर घूम गई ? हर कोई इसे जानने और देखने के लिए क्यों उत्सुक हो गया ? इस उत्सुकता के अनावरण में रोचक तथ्य यह है कि सामान्यतया रहस्य खुल जाने के बाद उत्सुकता शांत हो जाती है लेकिन इसका रहस्य जैसे-जैसे खुलता गया, उत्सुकता चरम उत्सुकता में बदलती गई। मिस्र की धरती पर आज से लगभग 3340 वर्ष पूर्व फारोह (राजा) आख-एन-आतेन का साम्राज्य था। उसकी पाँच बहनें थी जिसमें से एक के साथ उसका विवाह हुआ था। ईसा पूर्व 1341 में उन दोनों से एक पुत्र हुआ जिसका नाम था, तुत। तुत जब केवल नौ वर्ष का था, ईसा पूर्व 1323 में उसके पिता की मृत्यु हो गई, मृत्यु क्यों हुई- इसका कारण अज्ञात है, तुत वहाँ का राजा बन गया। वहाँ के राजाओं को 'फारों' या 'फारोह' कहा जाता था। तुत बेहद गुस्सैल था, उसके क्रोध को नियंत्रित करना उसके सलाहकार होरेम्बहेब के ही वश की बात थी। राज्य की आर्थिक दशा अत्यंत दयनीय थी, पड़ोसी राज्यों से संबंध बिगड़े हुए थे इसलिए तुत ने उस छोटी सी उम्र में किसी योग्य प्रशासक की तरह सधे हुए प्रयास शुरू किए और मिस्र को आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ बनाया और आस-पड़ोस में अपना वर्चस्व स्थापित किया। क्या आप विश्वास करेंगे, तुत नामक इस शासक को केवल 19 वर्ष की आयु मिली और वह मात्र ग्यारह वर्ष शासन कर पाया !
तुत का विवाह उसकी मौसेरी बहन आंखेसेनमुन से हुआ था। इनकी कोई संतान न थी। दो गर्भस्थ शिशुओं का गर्भपात हो गया था, एक गर्भावस्था के छठवें माह और दूसरा नवें माह में। दोनों भ्रूण लड़कियों के थे। इन दोनों के भ्रूण भी तुत की कब्र के पास सुरक्षित रखे गए थे। तुत के पिता 'आतेन' नामक देवता के उपासक थे और स्वयं को आतेन का अवतार कहते थे लेकिन तुत ने अपने शासन काल में आतेन की उपासना बंद करवा दी। तुत ने 'आमून' देवता को अपना आराध्य घोषित किया, मंदिर बनवाए, पुजारी नियुक्त किए। वह स्वयं को देवता आमून का जीवित स्वरूप मानता था इसीलिए उसने अपना नाम 'तुत-अंख-आमून' घोषित कर दिया। अपने शासन काल के तीसरे वर्ष तुत ने पड़ोसी राज्यों से संबंध सुधारने और उन्हें अपने दबाव में रखने के प्रयास शुरू कर दिए। वह जब अपने सिंहासन पर बैठता तो उसके कदमों तले चार पड़ोसी राज्यों के नक्शे बना हुआ कालीन बिछा रहता था। वह शरीर से भले ही कमजोर था लेकिन दिमाग से बहुत तेज था। वह कभी युद्ध लड़ने स्वयं नहीं गया लेकिन उसकी सेना बेहद ताकतवर थी और उसने अपने बल-बूते पर मिस्र राज्य को समर्थ और समृद्ध बनाया। उत्खनन के दौरान ऐसे अनेक उपहार मिले हैं जिन्हें पड़ोसी राज्यों ने तुत को भेंट-स्वरूप दिए थे। तुत ने अपने पिता की पुरानी राजधानी आखेतातेन को नेस्तनाबूत कर दिया और थेविस को नई राजधानी बनाया। तुत का कद 5'11" था, यह तथ्य 2007 से 2009 के मध्य तुत की 'ममी' के परीक्षण से ज्ञात हुआ। अनुमान है कि उसकी मृत्यु मलेरिया रोग से ग्रस्त होने के कारण हुई होगी क्योंकि उसकी ममी में मलेरिया के कीटाणु पाए गए। कुछ विद्वान मानते हैं कि उसकी मृत्यु किसी रथ-दुर्घटना में हुई होगी क्योंकि तुत के शव के बाएँ पैर में 'कंपाउंड फ्रैक्चर' था। वैसे, उसकी हत्या होने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता किन्तु ये सब उत्खनन में प्राप्त अवशेषों के विश्लेषण पर आधारित अनुमान हैं, बुद्धि-विलास चल रहा है। चूंकि तुत की कोई संतान नहीं हुई इसलिए उसकी परिवार शृंखला उसकी मृत्यु के साथ समाप्त हो गई।तुत की कब्र तक पहुँचना असंभव था। उसकी मृत्यु के बाद तात्कालीन लुटेरे और डाकुओं ने वहाँ की संपदा को हथियाने के बहुतेरे प्रयास किए। ये दस्यु अति-वीर और खोजी थे, उन्हें पता लग गया था कि तुत की कब्र में बेशकीमती खजाना दबा हुआ है लेकिन वे असफल रहे। यदि वे सफल हो जाते तो हावर्ड कार्टर को जो मिला वह कभी न मिलता, उसी समय बंट-खप जाता और मिस्र की प्राचीन मानव सभ्यता के ये प्रमाण कभी हाथ न आते।हावर्ड कार्टर की ज़ुनूनी कोशिशें रंग लाई और तुत की कब्र का रहस्य जब दुनिया के सामने आया तो विश्व भर की आँखें फटी रह गई। तुत के शव को अज्ञात रसायन लपेट कर सुरक्षित रखा गया था ताकि उसका मरणोपरांत उसकी मृत देह का क्षय न हो। उस युग में लोगों का पुनर्जन्म की धारणा पर विश्वास था, वे मानते थे कि एक दिन उनका फारोह तुत-अंख-आमून पुनर्जीवित होगा।संग्रहालय में तुत का शव को शीत-ताप-नमी अवरोधक काँच के पारदर्शी ताबूत में जन-सामान्य के लिए देखने हेतु रखा गया है जिसके लिए 100 इजीप्शियन पाउंड प्रति व्यक्ति की टिकट लगती है अर्थात भारतीय मुद्रा में लगभग 1200/- जो हमारे पास नहीं थे इसलिए हम उसे नहीं देख सके। हमने तुत के शव को टीवी के कार्यक्रमों में देख रखा था इसलिए उतनी उत्सुकता न थी और उस समय वणिक-बुद्धि भी हावी हो गई थी लेकिन अब उसे अपनी आँखों से न देखना अखर रहा है। मेरी समझ में संग्रहालय में देखने लायक अन्य वस्तुएँ उस ममी से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। तुत की कब्र से कुल मिलाकर 5398 वस्तुएँ निकली। स्वर्ण-जटित काफीन, मुखौटा, मुकुट और अन्य अनेक वस्तुएँ उस युग की आश्चर्यजनक कलाकारी के नमूने हैं। उन्हें देखकर नज़र ठहर सी जाती है, वे इतनी मोहक और आकर्षक कलाकृतियाँ हैं कि लगता है, देखते रहो। तुत के बालपन में उसके बैठने की कुर्सी, वयस्क होने पर उसका सिंहासन, पलंग, झूला, गलीचा, मूर्तियाँ, नौका, धनुष-बाण, भोजन के बर्तन, क्राकरी, खिलौने और न जाने क्या-क्या ! उसके परिधान, अंतःवस्त्र, अन्न, शराब, चन्दन आदि इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी सुरक्षित है, जिन्हें वहाँ देखा जा सकता है। तुत की कब्र के अन्वेषक हावर्ड कार्टर को उत्खनन में प्राप्त वस्तुओं की सूची तैयार करने में 10 वर्ष लगे थे।
गीज़ा का यह संग्रहालय बेशकीमती है, बेशकीमती इसलिए नहीं कि उसमें स्वर्ण-जड़ित वस्तुएँ हैं, बल्कि इसलिए कि मानव इतिहास का सबसे प्राचीन अज्ञात अब इस विश्व को ज्ञात हो गया। अतीत तो व्यतीत हो गया लेकिन इस भूगर्भ रहस्योद्घाटन ने यह सिद्ध कर दिया कि साढ़े तीन हजार वर्ष पहले का मनुष्य आज के स्कूली मनुष्य से कुछ कम नहीं था। यह सही है कि पुनर्जन्म की उनकी मान्यता साकार न हो सकी, उनके कठिन प्रयास निष्फल हो गए लेकिन उनकी अग्रगामी और सकारात्मक सोच का जो पहलू उभर कर हमारे सामने आया, वह आधुनिक जगत के लिए सूर्य के प्रकाश जैसा प्रखर और दैदीप्यमान है। संग्रहालय में जो है, जितना है और जैसा है, उसे देखने के लिए बहुत समय और धैर्य चाहिए। हमारी गाइड ने हमें उस परिसर में रुकने और देखने के लिए दो घंटे का समय दिया था, हम निर्धारित समय पर दौड़ते-भागते बाहर निकल आए लेकिन अपनी जिज्ञासा वहीं छोड़ आए। मेरे जैसे अज्ञानी को कम-से-कम दो दिन चाहिए थे, पढ़े-लिखे जिज्ञासु को दो सप्ताह, इतिहासकार को दो वर्ष और पुरातत्ववेत्ता को दो जीवन देना पड़ेगा, तब उस संग्रहालय में रखी अनमोल कृतियाँ के रहस्य और सौंदर्य को जाना-समझा जा सकेगा। आपने अगर हैदराबाद में निज़ाम का संग्रहालय देखा है तो समझ लीजिए कि वह गीज़ा के संग्रहालय का केवल एक अध्याय है। मिस्र की यात्रा का यह अंतिम दर्शनीय पड़ाव था। स्वेज़ नहर और आसवान-डैम हम नहीं देख पाए क्योंकि वह हमारे 'टूर-शिड्यूल' में नहीं था। इन जगहों पर यदि कोई इत्र, पेंटिंग्स या काटन-फेब्रिक जैसी कोई दूकान होती तो संभवतः वहाँ तक हम पहुंचा दिए जाते। ज़िंदगी में 'इफ' और 'बट' तो चलते रहता है, किन्तु जो भी देखने और समझने को मिला, वह अद्भुत था। अद्भुत देश है वह, मौका मिले तो घूम आइए। यह न कहिएगा कि मैंने आपको सब बता दिया, अब जाने की जरूरत क्या ? मेरे शब्दों में वह शक्ति नहीं जो मिस्र के इतिहास और वर्तमान को साकार कर सके।
गीज़ा का यह संग्रहालय बेशकीमती है, बेशकीमती इसलिए नहीं कि उसमें स्वर्ण-जड़ित वस्तुएँ हैं, बल्कि इसलिए कि मानव इतिहास का सबसे प्राचीन अज्ञात अब इस विश्व को ज्ञात हो गया। अतीत तो व्यतीत हो गया लेकिन इस भूगर्भ रहस्योद्घाटन ने यह सिद्ध कर दिया कि साढ़े तीन हजार वर्ष पहले का मनुष्य आज के स्कूली मनुष्य से कुछ कम नहीं था। यह सही है कि पुनर्जन्म की उनकी मान्यता साकार न हो सकी, उनके कठिन प्रयास निष्फल हो गए लेकिन उनकी अग्रगामी और सकारात्मक सोच का जो पहलू उभर कर हमारे सामने आया, वह आधुनिक जगत के लिए सूर्य के प्रकाश जैसा प्रखर और दैदीप्यमान है। संग्रहालय में जो है, जितना है और जैसा है, उसे देखने के लिए बहुत समय और धैर्य चाहिए। हमारी गाइड ने हमें उस परिसर में रुकने और देखने के लिए दो घंटे का समय दिया था, हम निर्धारित समय पर दौड़ते-भागते बाहर निकल आए लेकिन अपनी जिज्ञासा वहीं छोड़ आए। मेरे जैसे अज्ञानी को कम-से-कम दो दिन चाहिए थे, पढ़े-लिखे जिज्ञासु को दो सप्ताह, इतिहासकार को दो वर्ष और पुरातत्ववेत्ता को दो जीवन देना पड़ेगा, तब उस संग्रहालय में रखी अनमोल कृतियाँ के रहस्य और सौंदर्य को जाना-समझा जा सकेगा। आपने अगर हैदराबाद में निज़ाम का संग्रहालय देखा है तो समझ लीजिए कि वह गीज़ा के संग्रहालय का केवल एक अध्याय है। मिस्र की यात्रा का यह अंतिम दर्शनीय पड़ाव था। स्वेज़ नहर और आसवान-डैम हम नहीं देख पाए क्योंकि वह हमारे 'टूर-शिड्यूल' में नहीं था। इन जगहों पर यदि कोई इत्र, पेंटिंग्स या काटन-फेब्रिक जैसी कोई दूकान होती तो संभवतः वहाँ तक हम पहुंचा दिए जाते। ज़िंदगी में 'इफ' और 'बट' तो चलते रहता है, किन्तु जो भी देखने और समझने को मिला, वह अद्भुत था। अद्भुत देश है वह, मौका मिले तो घूम आइए। यह न कहिएगा कि मैंने आपको सब बता दिया, अब जाने की जरूरत क्या ? मेरे शब्दों में वह शक्ति नहीं जो मिस्र के इतिहास और वर्तमान को साकार कर सके।
(११)
चलते-चलते आपको यह बता दूँ कि कुवैत से मुंबई लौटते समय कुवैत एयरवेज के वायुयान में माधुरी जी अपने पैर पसार कर मस्त सोते हुए आई ! आकाश मार्ग में स्लीपर कोच का आनंद ! सच में, माधुरी जी कई मायने में बहुत भाग्यशाली हैं।
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