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कुल्लू से मनाली से दिल्ली

कुल्लू से मनाली से दिल्ली 
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(१)

          मगरमच्छ पानी से ऊबकर कुछ देर के लिए वह धरती पर आता है, धूप के मज़े लेने या खुली हवा में सांस लेने, उसी प्रकार मैदानी इलाकों में रहने वाले नीरस लोग रस की तलाश में समुद्र की ओर भागते हैं या पर्वत की ओर. मगरमच्छ और मनुष्य का स्वभाव एक जैसा है, कुछ देर के लिए बाहर निकलने का लेकिन दोनों में कुछ मौलिक अंतर है. मगरमच्छ बाहर निकल कर रेत पर पसरकर आराम करता है जबकि मनुष्य पैदल चल-चल कर हैरान होने के लिये बाहर निकलता है. जिसे भी पैदल चलने में कष्ट होता हो, उसे अपने घर में टीवी के सामने बैठकर दुनिया देखनी चाहिए लेकिन यदि घर से निकल पड़े तो ट्रेन, टैक्सी, ऑटो, होटल की विविध समस्यायों के साथ पैरों का दर्द भी सहना होगा, यह यात्रा का समानान्तर सुख है.
          एक दिन की बात है, जाने-माने कवि-व्यंग्यकार लालित्य ललित, असली नाम डा.ललित किशोर मंडोरा, सहायक संपादक नेशनल बुक ट्रस्ट, नयी दिल्ली, बिलासपुर आये थे, उनसे अचानक मुलाकात हो गयी. उन्होंने मुझे कुल्लू में होने वाले 'व्यंग्य यात्रा' गोष्ठी के बारे में बताया तो मेरा मन मचल गया और मैं सप्रयास इस यज्ञ का यजमान बन बैठा. बिलासपुर से डा.सोमनाथ यादव और राजेंद्र मौर्य भी साथ हो लिए, इस प्रकार हम तीन दिल्ली जाने वाली ट्रेन में कुल्लू के लिये निकल पड़े.
          अगली की अगली सुबह हम लोग कुल्लू पहुँच गए. वहां मौसम आशिकाना था, बिलासपुर की प्रचंड गर्मी से निकल कर कुल्लू की शीतल वायु में प्रवेश मनभावन लग रहा था. व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय द्वारा आयोजित 'व्यंग्य यात्रा' का कार्यक्रम आरम्भ हुआ जिसमें कोई तीस-एक साहित्यकार व्यंग्य विधा पर चर्चा करने बैठे. प्रथम सत्र में मुझे मुख्यअतिथि के आसन पर बीचोबीच बैठने का अपूर्व सुख मिला. कार्यक्रम की बागडोर नयी दिल्ली के लालित्य ललित ने संभाली. लखनऊ के सुधाकर अदीब ने मूल व्यक्तव्य प्रस्तुत किया, उनके बाद के एम.एम.चंद्रा ने व्यंग्य विधा पर अपनी सारगर्भित टिप्पणी की. फिर मेरा नंबर आया.
          मैंने आश्चर्य व्यक्त किया कि जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में एक भी व्यंग्य नहीं लिखा उसे मुख्य अतिथि बनाना भी एक व्यंग्य है. शिमला के वरिष्ठ साहित्यकार सुदर्शन वशिष्ठ के भाषण के पश्चात 'व्यंग्य यात्रा' के आयोजक प्रेम जनमेजय ने मेरी आपत्ति को यह कह कर लीप-पोत दिया कि 'हमने व्यंग्यकार को नहीं, व्यंग्य की समझ रखने वाले को मुख्य अतिथि बनाया है. प्रेम जी की बात से मुझे मालूम हुआ कि मुझे भी व्यंग्य की समझ है, कमाल है! गलतफहमियां भी सुख देती हैं.
          दो दिन तक चले कार्यक्रम में व्यंग्य मनीषियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया और व्यंग्य विधा पर गंभीर चर्चा की. कुल्लू की इस व्यंग्य यात्रा में रचनाकारों के मिलने-जुलने और विचारों के आदान-प्रदान का सुखदायक अवसर था, कुल्लू की महीन ठण्ड में हमारा आपसी परिचय हुआ और पुराने मित्रों से पुनर्मिलन हुआ.
          हिमाचल प्रदेश में स्थित शहर कुल्लू जिला मुख्यालय है. कुल्लू का पुराना नाम था कुलंत पीठ, जिसका अर्थ है- 'रहने योग्य दुनिया का अंत.' ब्यास नदी के किनारे बसा हुआ यह शहर 'सिल्वर वैली' के नाम से प्रसिद्ध है. जनश्रुति है कि महाप्रलय के पश्चात ऋषि मनु की नाव यहीं आकर रुकी थी.
          कुल्लू का दशहरा देश में मनाए जाने वाले दशहरा से अलग है. विशेषता यह है कि देश भर में दशहरा उत्सव समाप्त हो जाने के बाद यहाँ का सात दिवसीय पर्व शुरू होता है. आश्चर्यजनक बात है कि यहाँ रावण और उसके भाइयों के पुतले का दहन नहीं किया जाता. उत्सव के दौरान भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा धूमधाम से निकाली जाती है. ऐसी मान्यता है कि एक हजार देवी-देवता इस अवसर पर पृथ्वी में अवतरित होकर इस यात्रा में सम्मिलित होते हैं.
          कुल्लू शहर के बाहर पहाड़ की तलहटी पर एक बहुत बड़ा मैदान है, जहाँ दशहरा का उत्सव मनाया जाता है. वहां का दशहरा हमारी पहुँच से छः माह दूर था लेकिन आटोवाले भैया ने बताया कि इन दिनों वहां एक मेला चल रहा है. सोमनाथ यादव ने कहा- 'चलो भैया, मेला देख आते हैं. हिमाचल की संस्कृति और यहाँ के लोगों की विविधता देखने को मिल सकती है.'
          ऑटो से हम उतरे, पैदल-पैदल आगे बढ़े. चौक पर एक यातायात सिपाही को नृत्य करते हुए यातायात नियंत्रित करते देखा. हम लोग चौक पर स्थित एक डिवाइडर पर खड़े हो गये और उनकी काम के प्रति लगन और कला को मंत्रमुग्ध होकर निहारते रहे. उसकी फोटो खींची और वीडियो बनाया. कुछ देर बाद जब उन्हें प्यास लगी तो वे चौराहा छोड़कर पानी पीने के लिये कार्नर की दूकान के बाहर लगे नल तक गए, हम लोग भी दौड़कर उनके पास पहुँच गए. उनसे हाथ मिलाया, उनकी कार्यशैली की सराहना की और उनका हालचाल पूछा. साथ खड़े होकर फोटो भी खिंचवाई. काश, सरकारी कार्यालयों में कार्य के प्रति ऐसी निष्ठा सर्वत्र दिखती!
          सिने समीक्षक नसरीन मुन्नी कबीर की पुस्तक 'सिनेमा के बारे में' में शायर-पटकथा लेखक जावेद अख्तर का लंबा-चौड़ा साक्षात्कार है जिसमें एक जगह ज़ावेद अख्तर ने कहा है- 'एक कहावत है- 'आप किसी को अच्छी तरह जानना चाहते हैं तो उसके साथ चौदह साल रहें या फिर उसके साथ सफ़र करें.'
          इस व्यंग्य यात्रा में डा.सोमनाथ यादव और राजेंद्र मौर्य के संग सात दिनों का साथ रहा. हम सब इतने समर्थ कलाकार हैं कि अपने चेहरे पर एक और चेहरा लगाकर रखते हैं ताकि कोई असलियत बाहर न आ पाये. वैसे हम कुछ अधिक जानने के उत्सुक भी न थे, बस जावेद अख्तर के डायलाग का परीक्षण कर रहे थे कि उनकी बात में कितनी सच्चाई है? फिर भी, हम लोग बातचीत के दौरान हौले-हौले खुलते रहे और अन्तरंग वार्तालाप के दौरान तीनों में एक अद्भुत साम्यता मिली, कि तीनों पति अपनी पत्नी से अत्यंत भयाक्रांत हैं जबकि हम तीनों एकनिष्ठ हैं, मर्यादित जीवन जीते हैं, अपनी पत्नी से उतना डरते हैं जितना अपने पिता से डरा करते थे. उनके आदेशों का वेदवाक्य की तरह पालन करते हैं. पुरानी कहावत है- 'कर नहीं, तो डर नहीं' फिर बिना कुछ गड़बड़ किये यह डर कैसा? हम क्यों डरते हैं और वे हमें क्यों डराती हैं?
          ओह, आपको कुल्लू के मेले के बारे में बताना था लेकिन मैं यहाँ पर पत्नी-पुराण लेकर बैठ गया. अकसर भटक जाता हूँ, शायद बढती उम्र का असर है. तो हुआ यह कि मेले में हम तीनों को अपनी-अपनी घरवाली की याद आ रही थी. मेले में ९०% दूकानों में हमारे काम का कोई सामान न था, वहां 'उनकी' उपस्थिति का महत्व था. मस्तक से लेकर चरणों के नाखून तक सजने-संवरने का सामान दूकानों में अटा पड़ा था लेकिन हम लोग चाह कर भी कुछ खरीदने की स्थिति में न थे. अगर कुछ भी खरीद लेते तो सामान को देखते ही उनकी त्वरित प्रतिक्रिया तय थी- 'ये क्या उठा लाये? साइज़ भी नहीं जानते? ये कोई डिजाइन है? तुमको 'कलर सेन्स' भी नहीं है!' ऐसी विवशता के चलते हमारी जेब भरी होने के बावजूद हम कुछ न ले पाये और वहां के दूकानदार हमें हेय दृष्टि से घूरते रहे. कई सेल्समेन हम लोगों को देखकर 'यू टर्न' लेकर अपने सामान की झाड़-पोछ करने लगे, अत्यंत अपमानजनक दृश्य था वह.
             
(२)

          डा.सोमनाथ ने बिलासपुर में मुझसे कहा था- 'भैया, कुल्लू से मनाली चलेंगे, दो दिन के लिये. वहां घूमेंगे और रोहतांग दर्रा देखने चलेंगे. होटल बुक करवा लिया है.' मैंने सोचा कि यह अच्छा अवसर है क्योंकि दो वर्ष पहले शिमला से मनाली जाने का कार्यक्रम बनाया था लेकिन उस मौसम ख़राब होने के कारण वहां नहीं जा सके थे.
          हम लोग प्राइवेट बस में बैठकर कुल्लू से मनाली के लिये रवाना हो गए. सड़क के बगलगीर ब्यास नदी कलकल करती बह रही थी, हर कदम पर 'राफ्टिंग' के लिए बोट तैनात थी लेकिन पूरे रास्ते में हमें ब्यास नदी पर 'राफ्टिंग' करते हुए कोई भी न मिला. नदी वीरान थी, नाविक ग्राहक के इंतज़ार में बैठे मक्खियाँ उड़ा रहे थे. तीन घंटे के सफ़र के बाद हम मनाली पहुँच गये.
          मनाली अच्छा लगा, वैसा ही जैसे अन्य हिल स्टेशन होते हैं. ठण्ड सामान्य थी. बस स्टाप में पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि रोहतांग दर्रा का रास्ता बंद है, एक सप्ताह बाद खुलने की संभावना है तो हमारा मन दुखी हो गया. खैर, हम लोग होटल पहुंचे, हमारे वहां पहुँचने के बाद तेज बारिश शुरू हो गयी इसलिए हम लोग कमरे में ही कैद हो गए. साथ अच्छा हो तो होटल का कमरा भी बुरा नहीं लगता लेकिन मौसम आशिकाना हो तो दोस्तों से काम नहीं न चलता है! फिर मैं ठहरा निर्पेयक, जो मदिरा को हाथ नहीं लगाता इसलिए बारिश का पूरा मज़ा न ले पाया. वह झिरझिराती रही और मैं चुपचाप देखता रहा.
पूरी रात मेह बरसता रहा. सुबह दस बजे हमारी टैक्सी आ गयी, जिसमें सवार होकर हमें हामटा नामक स्थान पर जाना था, वहां बर्फ गिरने की खबर थी, टैक्सी किराये के तीन हज़ार रुपये दांव पर लगे थे. हमारी टैक्सी थी 'मारुति-आल्टो-800' जिसे देखकर मैं शकाया- 'क्या पता, ये छोटी सी डुगडुगिया पहाड़ पर चढ़ेगी या नहीं?' पर मित्र, गज़ब का इंजिन है, अजब ताकत है इस कार में. मैं लम्बा हूँ इसलिए बैठने और पैर फैलाने में तनिक दिक्कत थी अन्यथा इसी कार को खरीदने का मन बना लिया था उस दिन. मैंने देखा कि पूरे मनाली में टैक्सी के रूप में 'मारुति-आल्टो-800' ही चल रही थी. शाबाश.
सैंतीस तीखे मोड़ पर मुड़ने के पश्चात हमारी कार हामटा पहुंची. पसरी हुई पहाड़ी पर बदरंग बर्फ जमी हुई थी. बच्चे और युवा बर्फ पर फिसल रहे थे, गिर रहे थे, हंसते हुए उठ रहे थे. मेरा भी मन हुआ कि बर्फ पर फिसल लूं इसलिए पहाड़ी पर चढ़ने लगा लेकिन मेरे पैर बर्फ में जम नहीं पा रहे थे, चार कदम चढ़ना मुश्किल था. ऊपर जाये बिना भला नीचे कैसे आता? राजेंद्र मौर्य जी ने चेताया- 'ऊपर मत जाइए भैया जी, कहीं चोट लग गयी तो मुसीबत आ जाएगी.' मैंने उनका कहा मान लिया और तलहटी पर वापस उतर आया जहाँ पर एक तम्बू के अन्दर गर्म चाय मिल रही थी. कड़ाके की ठण्ड में गर्म चाय का अहसास, क्या बताऊँ आपको!
कुछ देर वहां रूककर हम लोग कार से वापस निकले. पास में ही पांडव गुफा थी. जनश्रुति है कि वनवास का समय पांडवों ने इसी गुफा में बिताया था और भोजन के लिये धान की खेती भी की थी. जिस जगह पर उन्होंने धन बोया था, वह जगह एक छोटे से सरोवर में तब्दील हो गयी है. पांडव गुफा के पास ही मुख्या सड़क पर एक झोपड़ी है, शकुंतला वहां की मालकिन है. वह झोपड़ी उसका घर है और उसकी दूकान भी है. वहां सैलानियों के लिये स्वादिष्ट चावल-राजमा, आमलेट, नान-वेज, बिस्कुट, चाय-काफी उपलब्ध है और कच्ची शराब और चावल की बीयर भी. मतलब, ठण्ड को गर्माहट में बदलने की व्यवस्था, वह भी पहाड़ी सन्नाटे में.
हम लोग गर्मागर्म चावल-राजमा का आनंद ले रहे थे, तब ही एक युवा परिवार वहां पहुंचा, साथ में दो छते बच्चे भी थे. वे हैदराबाद से आये, तेलुगुभाषी थे. श्रीमान ने शकुंतला से पूछा- 'ड्रिंक है क्या?'
'है, बैठिए.'
'कौन-कौन सी है?'
'एक ही है, लोकल.'
'कैसी है?'
'पीकर देखो, मस्त है, मज़ा आ जाएगा.'
'दे दो.' उसने कहा. शकुंतला ने कांच के गिलास में लगभग पौन गिलास शराब उसे दी. उसने 'सिप' ली और उछलते हुए चीख पड़ा- 'अरे बाप रे, बहुत तेज है.'
'अरे, 'नीट' ले लिये क्या? पानी मिलाना था.' शकुंतला बोली.
'पहले बताना था.' ग्राहक बोला. इतने में उसकी बच्ची आ गयी, उसने 'लेज़' की मांग रखी. उसने दिलवाया फिर अपनी पत्नी से झोपडी के बाहर पूछने गया कि वह क्या खाएगी? इस बीच उसकी शराब का गिलास टेबल पर रखा था. जब वह लौटा तो उसका गिलास गायब था. उसने पूछताछ की तो वहां पर काम कर रहे एक मात्र बेयरा ने बताया कि उसने उसे पानी समझकर फेंक दिया. दरअसल, शराब का रंग पानी जैसा पारदर्शी था इसलिए ग़लतफ़हमी में शराब फेंका गयी. जब शकुन्तला को मालूम पड़ा कि शराब पहाड़ी में बह गयी तो वह हंसने लगी और बोली- 'जाने दीजिए साहब, मैं आपको दूसरा गिलास देती हूँ.' उसने झट से दूसरा गिलास भरा, दिया और बोली- 'पानी मिलाना मत भूलना.'
राजेंद्र मौर्य ने मुझसे कहा- 'भैयाजी, मौसम सुहाना है, आज थोड़ा सा आप भी चख लीजिए.'
'अब इस उम्र में क्या खाक मुसलमां होंगे?' मैंने उत्तर दिया.
'इस जनम में आपने नहीं लिया तो आपको फिर से दुनिया में यह कहकर वापस भेजा जाएगा- 'जाओ पी के आओ.'
'साहब, आप नहीं पीते क्या?' शकुंतला ने हमारी बात में हस्तक्षेप करते हुए कहा.
'नहीं.' मैंने मुस्कुराते हुए समझाया.
'तो फिर मेरे पास आपके लिए बीयर है, चावल की बीयर, इसे लीजिए.' उसने प्लास्टिक के एक जग का ढक्कन खोला, आधा गिलास भर कर दिया. मैंने राजेंद्र मौर्य को देने का इशारा किया, बीयर का गिलास उनके हाथ में पहुँच गया और मैं सांय से उस झोपड़ी से बाहर निकल गया. शकुंतला हंसते हुए बाहर आयी और मेरे अनुरोध पर 'फोटो-सेशन' के लिए अपने केश व्यवस्थित करने लगी, अपना स्कार्फ खोलकर फिर से बाँधा.
भुगतान करने बाद डा.सोमनाथ और मैं कार के पास वापस आ गए लेकिन राजेंद्र मौर्य का पता नहीं था. हमने सोचा, ठण्ड है, 'ब्लेडर' खाली कर रहे होंगे लेकिन हम गलत थे. राजेंद्र मौर्य झोपड़ी में ही अटक गए थे. डा.सोमनाथ ने आवाज लगाई- 'मौर्य जी, वापस चलेंगे या यहीं बसने का इरादा है?'
'आ रहा हूँ, आ रहा हूँ.' मुंह पोछते हुए दौड़कर आये और कार की पिछली सीट पर पसरकर बैठ गए और बोले- 'मज़ा आ गया भैया जी.'
हामटा से लौटते समय हमने ऊपर से मनाली शहर को देखा. चारों ओर बिखरी हरयाली देखी. टैक्सी वाले ने हमारी अज्ञानता का फायदा उठाया और डेढ़ हजार के तीन हजार वसूल लिए. वहां से लौटकर हम मनाली के माल रोड पर पहुंचे. जिस छोटी सी दूकान पर हम लोग खाने के लिये घुसे, वहां बैठने की जगह कम थी, साफ़-सफाई भी न थी. एक टेबल पर नवविवाहित जोड़ा बैठा था, उनके सामने हम भी धंस गए. खाने का आर्डर दिया डा.सोमनाथ ने. जब तक खाना आया, मैं सामने बैठे जोड़े को कनखियों से देख रहा था.
पहले उनका खाना आया, दो प्लेटें उनके सामने थी, बाला ने एक प्लेट अलग खिसका दी और दोनों जन एक प्लेट में साथ-साथ खाने लगे. कुछ देर मैं उन्हें प्यार से खाते और एक-दूसरे को खिलाते देखता रहा. अचानक मैं बाला से पूछ बैठा- 'हाल की शादी है तुम लोगों की.'
'जी.' उसने उत्तर दिया.
'कहाँ से आये हो?'
'दिल्ली से.'
'कब आये?'
'कल से आये हैं अंकल लेकिन बारिश ने परेशान कर रखा है.'
'बारिश ने परेशान कर रखा है? बारिश से तो हम लोग परेशान हैं क्योंकि यहाँ हम अकेले-अकेले आएं हैं.'
'अरे हाँ, ये बात तो मेरे दिमाग में आयी नहीं. आप सही कह रहे हैं अंकल. थोड़ा सा पुलाव आप भी लीजिए और यह पनीर की सब्जी तो गज़ब है.' उसने खाली रखी प्लेट में पुलाव और पनीर डाला और मुस्कुराते हुए आत्मीयता से लेने का आग्रह करने लगी. मैंने मना किया तो वह बोली- 'जब तक आपका खाना नहीं आता, आप इसे लीजिए, प्लीज़, बहुत अच्छा बना है.' उसका आग्रह टालना संभव न था. मैंने खाना शुरू किया.
खाते-खाते मैंने कहा- 'नयी-नयी शादी के समय खाने का 'टेस्ट' बढ़िया रहता है क्योंकि उसमें प्यार 'मिक्स' रहता है.'
'और जब पुरानी हो जाती है तब?' उसने फ़िक्र करते हुए पूछा. उसकी आँखें बड़ी हो गयी थी.
'स्वाद बदल जाता है क्योंकि उसमें 'डांट' का तड़का लग जाता है.' मैंने उसे समझाया.
वह जोर से हंसी. भोजनकण उसकी श्वास नली में फंस गया, वह खांसती रही और हंसती भी रही.

कुल्लू की व्यग्य यात्रा में साहित्यकारों का मेल-मिलाप अच्छा हुआ. उसी श्रृंखला में मेरी मुलाकात रणविजय राव से हुई जो दिल्ली में रहते हैं और लोकसभा के प्रकाशन विभाग में सह-सम्पादक हैं. मैंने उनसे कहा- 'संसद देखनी है भाई जी, मदद करेंगे?'
'अवश्य, आप दिल्ली आइये, आपको दिखा देंगे.'
'हम तीन हैं.'
'ठीक है, अपना प्रोग्राम बताइये, मैं आप लोगों का 'गेट पास' तैयार रखूंगा.' वे बोले.

(३)

मनाली में दो दिन घूमने के पश्चात हम लोग शाम को दिल्ली के लिये रवाना हुए और पंद्रह घंटे की थकाऊ यात्रा के बाद अगली सुबह नौ बजे दिल्ली पहुँच गए और सीधे रणविजय राव के घर पहुंचे. 'राजा भैया' बनकर हम सब ने उनकी धर्मपत्नी अंजू जी के सौजन्य से स्वादिष्ट नास्ता किया. नास्ता क्या था, पूरा भोजन था. फूली हुई गरम पूरी, सत्तू की कचौड़ी, छोले, आलू की सब्जी, दही, सलाद, चटनी, खीर और चाय. यह सब उन्होंने अपने हाथों से बनाया था और अकेले! नास्ता करने के पश्चात मैंने अंजू जी को जी भर के आशीर्वाद दिया और मन ही मन प्रार्थना की कि संसार के सभी पतियों को ऐसी पत्नी मिले.
हम जब घर से निकल रहे थे तो अंजू जी ने मुझे अपना बैग नहीं उठाने दिया और बोली- 'आप रहने दीजिये, मैं इसे कार में रखती हूँ.'
'मैं उठा सकता हूँ, उठाने दीजिये.'
'आपने मुझे बहूरानी कहा और बैग उठाएँगे?' अंजू ने प्रश्न किया, मैं निरुत्तर था. मेरी आँखें गीली हो गयी थी, उस समय. विदा के समय अंजू ने मेरे पैर छुए, घुटना नहीं, पैर छुए.
साढ़े दस बजे हम सब रणविजय जी की कार में लद कर संसद भवन पहुंचे. हमारी जांच-पड़ताल के बाद हम एक गोलाकार कक्ष में पहुंचे जहाँ भीतरी मध्य में आगुन्तकों के बैठने की व्यवस्था थी और बाहरी गोलार्द्ध में स्वागत कक्ष और केन्टीन थी, पूर्णतः वातानुकूलित. संसद में हमारे प्रवेश हेतु संयुक्त संचालक (सुरक्षा) की ओर से अनुमति-पत्र तैयार था. आधे घंटे की प्रतीक्षा के पश्चात एक गाइड हमें उपलब्ध कराया गया जो हमें पंद्रह अन्य आगंतुकों के साथ लोकसभा की ओर ले चले.
अंग्रेजों द्वारा निर्मित जिस ऐतिहासिक इमारत को हम टीवी में देखा करते थे, उसे इस तरह साक्षात देखने का अवसर मिलेगा, मैंने कभी सोचा भी न था. मुख्य द्वार पर सबसे पहले हमें वह जगह दिखाई गयी जहाँ आतंकवादियों ने गोलियां बरसाई थी. उस हमले के निशान आज भी वहां कायम हैं. भव्यता और खूबसूरती के साथ पूरे परिसर में सुरक्षा का तगड़ा बंदोबस्त था.
गोल-गोल घूमते हुए हम लोग लोकसभा में प्रवेश कर गए. लोकसभा की दर्शक गैलरी में हमें बैठा दिया गया और हमारे गाइड ने, जो एक सुरक्षाकर्मी थे, हमें वहां की बैठक व्यवस्था के बारे में विस्तार से बताया. गाइड ने बताया- 'देखिये, सामने लोकसभा अध्यक्ष का आसन है. उनके ठीक सामने अध्यक्ष के मुख्य सचिव व अन्य सहयोगी के बैठने की व्यवस्था है. हमारी बायीं ओर सरकार और दायीं ओर विरोधी दल से जुड़े लोग बैठते हैं. सबसे पहली सीट प्रधानमंत्री की है जिस पर श्री नरेन्द्र मोदी बैठते हैं. उनसे जुडी हुई दीर्घा में मंत्रालय के सचिव बैठते हैं जो लोकसभा में उठाए गए प्रश्नों के उत्तर देने में सरकार की मदद करते हैं. अध्यक्ष की दायीं ओर की बैठक विदेशी राजनयिकों के लिये आरक्षित है.
ऊपर की मंजिल में जो दर्शक दीर्घाएं बनी हुई हैं उनमें एक राज्यसभा सदस्यों के लिये है, एक मीडिया के लिये है, एक विशिष्ट जनों के लिये है और शेष जन सामान्य के लिये. राज्यसभा के सदस्य लोकसभा सदस्यों की बैठक में प्रवेश नहीं कर सकते और इसी प्रकार लोकसभा के सदस्य राज्यसभा में नहीं आ सकते. दोनों सदनों में इनके लिए अलग से दीर्घ बनी हुई है जिसमें वे बैठकर सभा की गतिविधियों का अवलोकन किया करते हैं.'
'जब राज्यसभा के सदस्य लोकसभा में प्रवेश नहीं कर सकते तो श्री अरुण जेटली यहाँ कैसे बैठते हैं?' एक जिज्ञासु ने सवाल दागा.
'वे मिनिस्टर हैं इसलिए उनको अनुमति है.' गाइड ने बताया.'
'यहाँ 'ट्रेजरी बेंच' किसको कहते हैं?' मैंने गाइड के सामान्य ज्ञान को जानने की गरज़ से पूछा.
'नीचे सांसदों के लिये कुर्सियां लगी हैं और ऊपर गैलरी में दर्शकों के लिये, यहाँ कोई बेंच नहीं है.' उसने बताया.
'सत्ता पक्ष जिस तरफ बैठता है, उसे 'ट्रेजरी बेंच' कहते है.' हमारे साथ बैठे एक पढ़े-लिखे सज्जन ने बताया.
'अच्छा-अच्छा.' गाइड ने झिझकते हुए कहा. 'और कोई प्रश्न करना है आप लोगों को या हम लोग राज्यसभा चलें?'
'मेरा सवाल है एक.' मैंने अपना हाथ उठाया.
'हाँ, पूछिए.'
'नीचे वाली कुर्सी पर बैठने के लिए क्या करना पड़ता है?'
'इलेक्शन लड़ना पड़ता है, दस लाख लोगों से वोट मांगना पड़ता है.'
'बस?'
'आप बुजुर्ग हैं, आप ज्यादा जानते हैं. वहां बैठने के लिए तकदीर भी चाहिए.' गाइड ने अपने माथे पर अपनी उँगलियाँ चिपकाते हुए कहा. गाइड ने बताया.
कुछ क्षणों में मेरे सामने मेरा अतीत ने मुझ पर जैसे हमला सा कर दिया. मेरा सपना था कि मैं सांसद बनूँ. मुझे संसद में जनता का पक्ष रखते सांसद बेहद आकर्षित करते थे. जवाहर लाल नेहरु, राममनोहर लोहिया, श्रीपाद अमृत डांगे, आचार्य कृपलानी, अटल बिहारी बाजपेयी, मधु लिमये जैसे और न जाने कितने वक्ता थे जिनके भाषणों को मैं गौर से पढ़ा करता था. 'लोकसभा में लोहिया' पुस्तक के तेरह संस्करण पढ़े, उन्हें अपने सीने से लगाकर रखता था. इन सबका मुझ पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि मैंने 'सांसद बनना' अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया. मुझे अच्छी तरह याद है, इन्डियन जूनियर चेंबर के हैदराबाद में आयोजित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में हमसे कहा गया था- 'आप जो बनना चाहते हैं, उसे के कार्डबोर्ड में लिखकर अपने गले में लटकाएं.' मैंने उस कार्डबोर्ड पर लिखा था- 'I wish to be a Member of Parliament.'
इसके बाद मैंने हौले से राजनीति में अपने कदम बढ़ाए. राजनीति का टुच्चापन मुझसे नहीं सध रहा था फिर भी मैं लगा रहा. उसके बाद अपने पारिवारिक दायित्वों और वित्तीय संकट में ऐसा घिरा कि मुझे राजनीति और परिवार में से किसी एक का चयन करना ज़रूरी हो गया. घर में मेरी पत्नी थी, तीन संतानें इस धरा पर आ चुकी थी, उन्हें मझधार में छोड़कर अपने पारिवारिक दायित्व से दूर होना मुझे अच्छा नहीं लगा. मैं छोटे से केनवास में फंस गया, बड़ा केनवास मेरे हाथ से फिसल गया और मैं उस दिन लोकसभा की गैलरी में बैठकर नीचे बिछी कुर्सियों को देख कर सोच रहा था कि क्या मेरा संकल्प कमजोर था? या, फिर सांसद बनना मेरे भाग्य में नहीं था?
लोकसभा से निकलने के पहले हमारे गाइड ने बताया- 'आप लोगों ने ध्यान दिया? लोकसभा की पूरी कार्पेट हरे रंग की है, यहाँ से लेकर वहां तक. अब हम राज्यसभा चलेंगे, जहाँ पर लाल रंग की कार्पेट बिछी हुई है.'
फिर से गोल-गोल घूमते हुए हम लोग एक बंद दरवाजे के सामने खड़े थे जिसे गाइड ने खटखटाया. दरवाज़ा खुला, हम अन्दर गए जहाँ साफ़-सफाई चल रही थी. हमारे पहुंचते ही सफाई का कार्य स्थगित हो गया और हमारे गाइड हमें राज्यसभा के विषय में विस्तार से जानकारी देने लगे. राज्यसभा देखने के बाद हम उस सभागार को देखने पहुंचे जहाँ संसद का संयुक्त अधिवेशन होता है. यहाँ राष्ट्रपति अपना अभिभाषण पढ़ा करते हैं. इस वृहद सभागार में दोनों सदनों के सदस्य के अतिरिक्त अन्य विशेष आमंत्रितों के भी बैठने की व्यवस्था है. मैंने सभागार की उस कुर्सी को देखकर मन भीग गया जहाँ से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने १५ अगस्त १९४७ को भारतवर्ष की स्वाधीनता की घोषणा की थी.
एक घंटे के संसद भ्रमण के बाद हम लोग स्वागतकक्ष में पहुंचे जहाँ से हमें संसद के स्मृति-चिन्ह खरीदने थे. वहां के शो-केस में टीशर्ट, दीवार घड़ी, की-रिंग, मेमेंटो, तिरंगे-ध्वज वाली पिन आदि सजी हुई थी और सबमें कीमत लिखी हुई थी. वहां पर तैनात अधिकारी अधिकांश सरकारी दूकानों के सेल्समेन जैसा ढीला-पोला इंसान था जिसकी सामान बेचने में कोई रूचि नहीं थी लेकिन हम लोग टीशर्ट और दीवार घड़ी लेने के लिए कृतसंकल्प थे. हमारी दृढ़ता के चलते उसे टी-शर्ट निकालकर देनी पड़ी लेकिन घड़ी के लिए उसे मजबूर न कर सके क्योंकि उसने 'आउट ऑफ़ स्टाक' घोषित कर दिया. मेरे सामने दो महिलाएं भी 'विंडो शापिंग' कर रही थी, एक आधुनिक युवती और दूसरी प्रौढ़ा. युवती ने पूछा- 'यह तिरंगा झंडा पिन कितने की है?'
'तीस रुपये की.' जवाब मिला.
'फुटपाथ में दस रुपये की मिलती है, यहाँ तीस की बेच रहे हो.' अधिकारी ने उसे घूर कर देखा लेकिन कोई जवाब नहीं दिया. साथ वाली प्रौढ़ा ने युवती से कहा- 'यहाँ मोलभाव मत करो, लेना हो तो चुपचाप ले लो.'
'गलत बात है न? गलत बात में क्यों चुप रहें?' युवती ने वापसी सवाल दागा. बगल में खड़े एक सुरक्षाकर्मी से सहन नहीं हुआ, उसने कहा- 'मेडम, मैं आपको यह पिन गिफ्ट कर सकता हूँ बशर्ते आप इसे पहनें.' मेडम ने अजीब ढंग से अपना मुंह बिदकाया और आगे बढ़ गयी. वह युवती अपने देश की ही थी, भारतीय थी!
मेरा दिल हुआ कि उस बे-शऊर की फोटो खींच लूं लेकिन मेरा मोबाईल तो सिक्योरिटी में जमा था! ओह!

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जब तब अब जबलपुर

तब जब अब जबलपुर ============== ( १)           अपनी ससुराल होने के कारण मुझे शहर जबलपुर अत्यंत प्रिय है क्योंकि वहाँ दामाद होने के कारण मेरे मान-सम्मान की स्थायी व्यवस्था बनी हुई है यद्यपि सास-श्वसुर अब न रहे लेकिन तीन में से दो भाई , मदन जी और कैलाश जी , मुझे अभी भी अपना जीजा मानते हुए अपने माता-पिता की कोमल भावनाओं का प्रसन्नतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं। मैं पहली बार जबलपुर विवाह में बाराती बन कर दस वर्ष की उम्र (सन 1957) में गया था। मोहल्ला हनुमानताल , सेठ गोविंद दास की ' बखरी ' के कुछ आगे , जैन मंदिर के पास , सेठ परसराम अग्रवाल के घर , जहां से उनकी भतीजी मंदो का ब्याह मेरे बड़े भाई रूपनारायण जी के साथ हुआ था। उन्हीं दिनों सेठ गोविंद दास की ' बखरी ' के बाजू में स्थित एक घर में एक वर्ष की एक नहीं सी लड़की जिसका नाम माधुरी था , वह घुटनों के बल पूरे घर में घूमती और खड़े होने का अभ्यास करती हुई बार-बार गिर जाती थी। इसी घर में 8 मई 1975 में मैं दूल्हा बनकर आया था तब माधुरी 19 वर्ष की हो चुकी थी , वे मेरी अर्धांगिनी बनी।      ...

रंगीला राजस्थान

राजस्थान अंग्रेजों के ज़माने में राजपूताना कहलाता था क्योंकि इस क्षेत्र में अजमेर-मेरवाड़ा और भरतपुर को छोड़कर अन्य भूभाग पर राजपूतों की रियासतें थी. बारहवीं सदी के पूर्व यहाँ गुर्जरों का राज्य था इसलिए इस क्षेत्र को गुर्जरत्रा कहा जाता था. अजमेर-मेरवाड़ा अंग्रेजों के अधीन था जबकि भरतपुर में जाटों के. कुल मिलाकर छोटी-बड़ी 21 रियासतें थी जिन्हें स्वाधीन भारत में शामिल करना बेहद कठिन था क्योंकि अधिकतर राजा एकीकरण के पक्ष में नहीं थे, कुछ खुद-मुख्त्यारी चाहते थे तो कुछ पाकिस्तान में विलय चाहते थे. स्वाधीन भारत के तात्कालीन गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल और उनके सचिव वी. के. मेनन ने इस असंभव को संभव कर दिखाया और उसकी परिणिति बनी, भारतवर्ष का नूतन राज्य, राजस्थान, जो 30 मार्च 1949 को संवैधानिक रूप से गठित हुआ. राजस्थान की आकृति पतंगाकार है. इसके उत्तर में पाकिस्तान , पंजाब और हरियाणा , दक्षिण में मध्यप्रदेश और गुजरात , पूर्व में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश एवं पश्चिम में पाकिस्तान हैं. सिरोही से अलवर जाती हुई अरावली-पर्वत-श्रृंखला राज्य  को दो भागों में विभाजित करती है.  राजस्थान का...

म्हारो प्यारो राजस्थान

 ञ से खूब सारी बातें करने का सुख मिला. वहां से निवृत्त होकर हम तीनों सफारी के लिए निकले. वहां पहुंचकर एक जिप्सी मिली, उसमे बैठकर रेगिस्तान के छोटे से स्वरूप में प्रवेश कर गए. रेशम जैसी बारीक रेत का स्पर्श बेहद सुहावना लगा. सूर्यास्त होने वाला था, पहाड़ियों के पीछे से झांकती सूर्य की किरणें मन मोह रही थी. ऊंचे-नीचे रास्ते से होते हुए हम लोग एक काटेज में पहुंचे जहाँ हमारे लिए चाय आई. कुछ देर में एक सजा-धजा ऊंट सामने आकर खड़ा हो गया. अब उस पर सवार होकर घूमने जाना था. माधुरी जी ने उस पर पैर फैला कर चढ़ने का प्रयास किया, असफल रही. उनके बाद मैंने प्रयास किया, बन गया और थोड़ी दूर तक जाकर लौट आए. इस प्रकार रंग-रंगीले राजस्थान के एक छोटे से हिस्से का दौरा संपन्न हुआ. इस 'देस' का आतिथ्य सत्कार, खान-पान और मेहमान की आवभगत करने की कला बाकी देश को भी सीखना चाहिए. शेष बचे राजस्थान को देखने के लिए फिर आएंगे, अवश्य आएंगे. ==========