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म्हारो प्यारो राजस्थान

 ञ से खूब सारी बातें करने का सुख मिला.

वहां से निवृत्त होकर हम तीनों सफारी के लिए निकले. वहां पहुंचकर एक जिप्सी मिली, उसमे बैठकर रेगिस्तान के छोटे से स्वरूप में प्रवेश कर गए. रेशम जैसी बारीक रेत का स्पर्श बेहद सुहावना लगा. सूर्यास्त होने वाला था, पहाड़ियों के पीछे से झांकती सूर्य की किरणें मन मोह रही थी. ऊंचे-नीचे रास्ते से होते हुए हम लोग एक काटेज में पहुंचे जहाँ हमारे लिए चाय आई. कुछ देर में एक सजा-धजा ऊंट सामने आकर खड़ा हो गया. अब उस पर सवार होकर घूमने जाना था. माधुरी जी ने उस पर पैर फैला कर चढ़ने का प्रयास किया, असफल रही. उनके बाद मैंने प्रयास किया, बन गया और थोड़ी दूर तक जाकर लौट आए.

इस प्रकार रंग-रंगीले राजस्थान के एक छोटे से हिस्से का दौरा संपन्न हुआ. इस 'देस' का आतिथ्य सत्कार, खान-पान और मेहमान की आवभगत करने की कला बाकी देश को भी सीखना चाहिए. शेष बचे राजस्थान को देखने के लिए फिर आएंगे, अवश्य आएंगे.

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