वाराणसी : बना रहे बनारस :
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(१)
बनारस कभी गया नहीं था, मुज़फ़्फ़रनगर से लौटते में लखनऊ होते हुए मैं और अपनी सहचरी माधुरी के साथ ८ सितम्बर २०१४ को वाराणसी पहुँच गया. बनारस जाने के पहले फोन करके 'जैपुरिया' में आरक्षण करवा लिया था, सोचा था कि धर्मशाला में रुकेंगे तो हॉटल के खर्च की बचत से माधुरीजी और दोनों बेटियों के लिए बनारसी साड़ियाँ ख़रीद लेंगे। धर्मशाला के मैनेजर जी ने मुझसे पूछा- 'कितने वाला रूम चाहिए ?'
'कितने वाले हैं ?' मैंने पूछा.
'२५००/- वाला डीलक्स रूम खाली है, दें क्या ?' उन्होंने मेरी ओर देखा और प्रश्नवाचक मुखाकृति बनाई.
मैं घबरा गया और सोच में पड़ गया- 'यह धर्मशाला है या हॉटल?' स्टेशन से साढ़े तीन किलोमीटर तक पचास खूबसूरत हॉटलों को छोड़कर पैसा बचाने के चक्कर में यहाँ तक आया और यहाँ का जुर्माना २५००/- प्रतिदिन! हमारा 'हनीमून ट्रिप' होता तो एकबारगी हिम्मत कर लेता लेकिन सवा उन्तालीस साल पुरानी शादी की तीर्थयात्रा में इतना खर्च मुझे गैरवाज़िब लगा. मैनेजर मुझे और मेरे कपड़ों को घूरे जा रहा था. मैंने संकोच के साथ कहा- 'मेरा इतना `बजट' नहीं है कोई कम वाला बताइए.'
'कम वाला ९००/- का है, 'जनरल टॉयलेट' में जाना होगा.' उसने मुझे उपेक्षापूर्ण उत्तर दिया और लिखा-पढ़ी में लग गया. मैंने माधुरीजी से पूछा- 'कैसा करें, ढाई हज़ार या नौ सौ ?'
'नौ सौ वाला ले लो. दो दिन रुकना है, कौन सा यहाँ घर बसाना है !'
'वही दे दीजिए, ९००/- वाला.' मैंने मैनेजर से कहा.
'आधा घंटा बैठ जाइए, कमरा साफ़ करने में समय लगेगा.'
'जी'. मैंने कहा.
'कितने वाले हैं ?' मैंने पूछा.
'२५००/- वाला डीलक्स रूम खाली है, दें क्या ?' उन्होंने मेरी ओर देखा और प्रश्नवाचक मुखाकृति बनाई.
मैं घबरा गया और सोच में पड़ गया- 'यह धर्मशाला है या हॉटल?' स्टेशन से साढ़े तीन किलोमीटर तक पचास खूबसूरत हॉटलों को छोड़कर पैसा बचाने के चक्कर में यहाँ तक आया और यहाँ का जुर्माना २५००/- प्रतिदिन! हमारा 'हनीमून ट्रिप' होता तो एकबारगी हिम्मत कर लेता लेकिन सवा उन्तालीस साल पुरानी शादी की तीर्थयात्रा में इतना खर्च मुझे गैरवाज़िब लगा. मैनेजर मुझे और मेरे कपड़ों को घूरे जा रहा था. मैंने संकोच के साथ कहा- 'मेरा इतना `बजट' नहीं है कोई कम वाला बताइए.'
'कम वाला ९००/- का है, 'जनरल टॉयलेट' में जाना होगा.' उसने मुझे उपेक्षापूर्ण उत्तर दिया और लिखा-पढ़ी में लग गया. मैंने माधुरीजी से पूछा- 'कैसा करें, ढाई हज़ार या नौ सौ ?'
'नौ सौ वाला ले लो. दो दिन रुकना है, कौन सा यहाँ घर बसाना है !'
'वही दे दीजिए, ९००/- वाला.' मैंने मैनेजर से कहा.
'आधा घंटा बैठ जाइए, कमरा साफ़ करने में समय लगेगा.'
'जी'. मैंने कहा.
(२)
शाम को ५ बजे हम दोनों बाबा विश्वनाथ के दर्शन हेतु निकल पड़े. रास्ते में एक छोटी सी दूकान में स्वादिष्ट लस्सी पी॰ मुझे पान खाये इक्कीस वर्ष हो गए थे, इतने अरसे के बाद मघई पान का स्वाद लेने से स्वयं को नहीं रोक पाया. पान खाया, तनिक तीखा लगा पर अच्छा लगा. उम्मीद थी कि बहुत अच्छा लगेगा लेकिन पान अकेला कितना जोर मारता, उसमें तम्बाखू मैंने डलवाई नहीं क्योंकि मुख-कैन्सर का बारह वर्ष पुराना मरीज़ तम्बाखू खाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया फिर भी पान दिल से खाया.
बनारस में मुँह में पान दबाए गोल-गोल बातें करते बनारसी लोग देखे, उनकी बेख़ौफ़ बातचीत सुनी, लंबतरानी सुनी, गालियों से भरपूर सम्भाषण सुने. खोजते-ढूँढते 'गेट नंबर 4' में प्रविष्ट हो गए. घुसते साथ वहाँ तैनात नज़रों ने हमें घूरा, तीन तलाशियां हुई तब कहीं जाकर मंदिर में घुस पाए. दर्शनार्थियों की भीड़ में कतारबद्ध बढ़ते हुए बाबा विश्वनाथ के दर्शन की चिरप्रतीक्षित अभिलाषा पूर्ण हो गयी. 'आगे बढ़ो, जल्दी बढ़ो' की आवाज़ से जूझते हुए वहाँ हो रही धक्का-मुक्की में दुग्ध अर्पित करते समय मेरा 'पेपर कप' हाथ से फिसलकर गर्भगृह में गिर पड़ा. मैं आगे बढ़कर निकल गया लेकिन पीछे खड़े 'पुलिसमैन' ने मुझे तबियत से गरियाया. बाबा मेरे भक्तिभाव से परिचित होकर संभवतः मेरी भूल पर मुस्कुरा देते लेकिन बाबा का भक्त तो मेरी आंतरिक भावना से अपरिचित था, उसका क्रुद्ध होना स्वाभाविक था. मैं भी पछताया लेकिन जो हुआ उसे 'अन डू' करने का कोई उपाय मेरे पास नहीं था. माधुरी भी मुझ पर नाराज़ हुई लेकिन मैं अभ्यस्त पति की तरह उन्हें अनसुना कर गया.
बाबा की आरती संध्या सात बजे होनी थी, हम प्रतीक्षा कर रहे थे और वहाँ चल रहे कर्मकाण्ड और भक्तों की गतिविधियाँ निहार रहे थे. मैंने देखा कि जो भक्त सिर झुकाए आ जा रहे थे उनकी कोई इज़्ज़त नहीं थी, बल्कि उनकी बेइज़्ज़ती हो रही थी. बहुत बड़ी संख्या में तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना,गुजरात और पश्चिम बंगाल से कई दिनों की यात्रा करके श्रद्धालु दर्शन करने वहां आए थे लेकिन सभी समुचित दर्शन न मिल पाने से क्षुब्ध थे. वहीँ पर 'स्टेनगन' धारियों की सुरक्षा में सीना तानकर पहुँच रहे 'वी.आई.पी.' जब गर्भगृह में प्रवेश करते तो सम्पूर्ण व्यवस्था चाक-चौबंद हो जाती. उन्हें देखकर मेरा दिल मचल रहा था- 'हाय, हुसैन हम न हुए.'
किसी ने बताया कि १२५/- प्रति व्यक्ति दान देने पर 'सप्तर्षि आरती' के समय पर गर्भगृह के द्वार पर सामने बैठकर दर्शन करने का प्रावधान है, मैं दानपत्र लेने सम्बंधित व्यक्ति के पास गया, दो सौ पचास रूपए दिए तब ही एक 'पुलिसमैन' उनके पास दौड़ता आया और कहा- 'साहब लोगों के लिए 'कोल्डड्रिंक' मंगवाओ.'
'क्या मँगवाऊँ, कोक या मिनरल वाटर?' उन्होंने पूछा.
'दोनों मंगवा लो.' पुलिसमेन ने कहा॰
'ए फलाने, जल्दी इधर आओ, ये सौ रूपए लेकर जाओ, दो लीटर वाली 'कोल्डड्रिंक' और 'मिनरल वाटर' लेकर आओ और दौड़ के जाओ-आओ, समझे?' उनका दौड़ू दौड़ पड़ा. मैंने उनसे धीरे से पूछा- 'साहब लोगों का ऐसा स्वागत-सत्कार मंदिर की तरफ़ से करना पड़ता है क्या?'
'क्या करोगे, 'हाईकोर्ट' के जज साहब और उनका परिवार है, करना पड़ता है.' उसने लाचार मुखमुद्रा बनाई.
'मंदिर के चढ़ावे से?'
'अब ज़्यादा मत पूछिए.' उसने मुझे रोका और तड़-फड़ मेरी रसीद बनाकर दी और विदा कर दिया.
संध्या ६ बजे के आसपास गर्भगृह में श्रद्धालुओं की आवाजाही रोक दी गई ताकि सप्तर्षि-आरती की प्रारम्भिक तैयारी की जा सके. हम सब १२५/- भुगतान करने वाले 'लायसेंसधारी' गर्भगृह के दरवाजे के बाहर बैठ गए और झांक-झांक कर अंदर हो रही पुजारियों की उन गतिविधियों को देखने का असफल प्रयास कर रहे थे जो हमें नहीं दिख रही थी. मंदिर के एक इंतज़ामअली- 'किनारे हटो', 'पीछे हटो', 'चुप रहो', 'आगे बैठो', 'पीछे चले जाओ', 'कूपन दिखाओ' आदि चिल्लाते चारों ओर फिर रहे थे और भक्तजन उन्हें अनसुना कर उचक-उचक कर देख रहे थे. गर्भगृह में सात-आठ पुजारी शिवलिंग को घेर कर बैठ गए और उसकी सफाई, स्नान, चन्दनलेपन और पुष्पार्पण करने लगे. वे समवेत मंत्रोच्चारण कर रहे थे जिसे सुनकर समझना कठिन था क्योंकि बाहर बैठी भक्तनियों में किच-किच मची हुई थी. आधे घंटे बाद मुख्य-पुजारी पधारे और हमारे सामने द्वार के बीचोबीच आसान लगाकर बैठ गए, परिणामस्वरुप दृष्टिबाधा और बढ़ गई, कुछ जिज्ञासु भक्तनियाँ खड़ी हो गई और भयंकर वाक्युद्ध आरम्भ हो गया. माधुरीजी को भी ताव आ गया, मैं उन्हें समझाबुझाकर शान्त करने का प्रयास करता रहा, शेष स्त्रियों को समझाने का अधिकार मुझे प्राप्त न था जबकि उनके पतिगण अज्ञात कारणों से तटस्थभाव अपनाए हुए थे. वातावरण से भक्तिभाव गायब और अतिउत्सुकताभाव स्थापित हो गया. कुछ ही क्षणों में तीन पुजारी और प्रकट हुए जिसमें से दो द्वार के किनारे खड़े हो गए और एक द्वार पर ही खड़े हो गए जो अन्य नवप्रवेशी भक्त उनके पास आते और देवदर्शन की इच्छा व्यक्त करते वे उन्हें दक्षिणा के मूल्य पर झाँककर देखने का सुअवसर देते. इतने में अर्धसैनिक बल के एक सुरक्षाकर्मी किसी वी.आइ.पी. महिला को अपने साथ लाए और द्वार पर खड़े पुजारी को उन्हें देवदर्शन करवाने के लिए कहा. उन दोनों के बीच न जाने क्या बात हुई, पुजारी सुरक्षाकर्मी पर भड़क उठे और बोले- 'ए, तमीज़ से बात कर.'
'मेरे को तमीज़ सिखाता है ?' सुरक्षाकर्मी ने कहा.
'वर्दी पहन लिया इसलिए मेरे से ऊँची आवाज़ में बात करता है.'
'बताऊँ क्या ?'
'क्या बताएगा रे? यहां तेरा क़ानून चलेगा या हमारा, ये मंदिर है, यहाँ हमारा नियम चलता है.' पुजारी जोर से चीखा, न वर्दी का भय और न बन्दूक का डर. मैं सीधा-सादा छत्तीसगढ़िया उस बनारसी पंडित के दुस्साहस को देखकर चकित हो गया. हम लोग तो वर्दीवालों को देखते ही बिछ जाते हैं ताकि वे हमें कुचलकर चुपचाप निकल जाएँ॰ बात बिगड़ती देखकर उत्तरप्रदेश पुलिस के एक वरिष्ठ सिपाही दौड़ते आए और सुरक्षाकर्मी को अपनी बाहों में समेटकर वहां से दूर ले गए. पुजारी बड़बड़ाते रहे- 'साला अपने आपको समझता क्या है, हमको रुआब बताता है.' कुछ ही क्षणों में वे शान्त हो गए और उनका दक्षिणा-वसूली-अभियान फिर शुरू हो गया. उसी समय आरती आरम्भ हो गई, भक्तजन अधीर हो उठे और वहां अफरा-तफरी मच गई. हम दोनों गीली-मटमैली जमीन पर बैठे थे, भयभीत होकर उठ खड़े हुए ताकि भीड़ हम पर न चढ़ बैठे और एक ऐसे कोण पर जाकर खड़े हो गए जहां से आरती-कार्यक्रम थोड़ा बेहतर ढंग से दिख रहा था. आरती का अनुष्ठान आकर्षक और मनमोहक था लेकिन जिस ऊर्जा को महसूस करने के लिए हम दोनों दो घंटे से अड़े-खड़े थे, उसका सर्वथा अभाव था.
बनारस में मुँह में पान दबाए गोल-गोल बातें करते बनारसी लोग देखे, उनकी बेख़ौफ़ बातचीत सुनी, लंबतरानी सुनी, गालियों से भरपूर सम्भाषण सुने. खोजते-ढूँढते 'गेट नंबर 4' में प्रविष्ट हो गए. घुसते साथ वहाँ तैनात नज़रों ने हमें घूरा, तीन तलाशियां हुई तब कहीं जाकर मंदिर में घुस पाए. दर्शनार्थियों की भीड़ में कतारबद्ध बढ़ते हुए बाबा विश्वनाथ के दर्शन की चिरप्रतीक्षित अभिलाषा पूर्ण हो गयी. 'आगे बढ़ो, जल्दी बढ़ो' की आवाज़ से जूझते हुए वहाँ हो रही धक्का-मुक्की में दुग्ध अर्पित करते समय मेरा 'पेपर कप' हाथ से फिसलकर गर्भगृह में गिर पड़ा. मैं आगे बढ़कर निकल गया लेकिन पीछे खड़े 'पुलिसमैन' ने मुझे तबियत से गरियाया. बाबा मेरे भक्तिभाव से परिचित होकर संभवतः मेरी भूल पर मुस्कुरा देते लेकिन बाबा का भक्त तो मेरी आंतरिक भावना से अपरिचित था, उसका क्रुद्ध होना स्वाभाविक था. मैं भी पछताया लेकिन जो हुआ उसे 'अन डू' करने का कोई उपाय मेरे पास नहीं था. माधुरी भी मुझ पर नाराज़ हुई लेकिन मैं अभ्यस्त पति की तरह उन्हें अनसुना कर गया.
बाबा की आरती संध्या सात बजे होनी थी, हम प्रतीक्षा कर रहे थे और वहाँ चल रहे कर्मकाण्ड और भक्तों की गतिविधियाँ निहार रहे थे. मैंने देखा कि जो भक्त सिर झुकाए आ जा रहे थे उनकी कोई इज़्ज़त नहीं थी, बल्कि उनकी बेइज़्ज़ती हो रही थी. बहुत बड़ी संख्या में तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना,गुजरात और पश्चिम बंगाल से कई दिनों की यात्रा करके श्रद्धालु दर्शन करने वहां आए थे लेकिन सभी समुचित दर्शन न मिल पाने से क्षुब्ध थे. वहीँ पर 'स्टेनगन' धारियों की सुरक्षा में सीना तानकर पहुँच रहे 'वी.आई.पी.' जब गर्भगृह में प्रवेश करते तो सम्पूर्ण व्यवस्था चाक-चौबंद हो जाती. उन्हें देखकर मेरा दिल मचल रहा था- 'हाय, हुसैन हम न हुए.'
किसी ने बताया कि १२५/- प्रति व्यक्ति दान देने पर 'सप्तर्षि आरती' के समय पर गर्भगृह के द्वार पर सामने बैठकर दर्शन करने का प्रावधान है, मैं दानपत्र लेने सम्बंधित व्यक्ति के पास गया, दो सौ पचास रूपए दिए तब ही एक 'पुलिसमैन' उनके पास दौड़ता आया और कहा- 'साहब लोगों के लिए 'कोल्डड्रिंक' मंगवाओ.'
'क्या मँगवाऊँ, कोक या मिनरल वाटर?' उन्होंने पूछा.
'दोनों मंगवा लो.' पुलिसमेन ने कहा॰
'ए फलाने, जल्दी इधर आओ, ये सौ रूपए लेकर जाओ, दो लीटर वाली 'कोल्डड्रिंक' और 'मिनरल वाटर' लेकर आओ और दौड़ के जाओ-आओ, समझे?' उनका दौड़ू दौड़ पड़ा. मैंने उनसे धीरे से पूछा- 'साहब लोगों का ऐसा स्वागत-सत्कार मंदिर की तरफ़ से करना पड़ता है क्या?'
'क्या करोगे, 'हाईकोर्ट' के जज साहब और उनका परिवार है, करना पड़ता है.' उसने लाचार मुखमुद्रा बनाई.
'मंदिर के चढ़ावे से?'
'अब ज़्यादा मत पूछिए.' उसने मुझे रोका और तड़-फड़ मेरी रसीद बनाकर दी और विदा कर दिया.
संध्या ६ बजे के आसपास गर्भगृह में श्रद्धालुओं की आवाजाही रोक दी गई ताकि सप्तर्षि-आरती की प्रारम्भिक तैयारी की जा सके. हम सब १२५/- भुगतान करने वाले 'लायसेंसधारी' गर्भगृह के दरवाजे के बाहर बैठ गए और झांक-झांक कर अंदर हो रही पुजारियों की उन गतिविधियों को देखने का असफल प्रयास कर रहे थे जो हमें नहीं दिख रही थी. मंदिर के एक इंतज़ामअली- 'किनारे हटो', 'पीछे हटो', 'चुप रहो', 'आगे बैठो', 'पीछे चले जाओ', 'कूपन दिखाओ' आदि चिल्लाते चारों ओर फिर रहे थे और भक्तजन उन्हें अनसुना कर उचक-उचक कर देख रहे थे. गर्भगृह में सात-आठ पुजारी शिवलिंग को घेर कर बैठ गए और उसकी सफाई, स्नान, चन्दनलेपन और पुष्पार्पण करने लगे. वे समवेत मंत्रोच्चारण कर रहे थे जिसे सुनकर समझना कठिन था क्योंकि बाहर बैठी भक्तनियों में किच-किच मची हुई थी. आधे घंटे बाद मुख्य-पुजारी पधारे और हमारे सामने द्वार के बीचोबीच आसान लगाकर बैठ गए, परिणामस्वरुप दृष्टिबाधा और बढ़ गई, कुछ जिज्ञासु भक्तनियाँ खड़ी हो गई और भयंकर वाक्युद्ध आरम्भ हो गया. माधुरीजी को भी ताव आ गया, मैं उन्हें समझाबुझाकर शान्त करने का प्रयास करता रहा, शेष स्त्रियों को समझाने का अधिकार मुझे प्राप्त न था जबकि उनके पतिगण अज्ञात कारणों से तटस्थभाव अपनाए हुए थे. वातावरण से भक्तिभाव गायब और अतिउत्सुकताभाव स्थापित हो गया. कुछ ही क्षणों में तीन पुजारी और प्रकट हुए जिसमें से दो द्वार के किनारे खड़े हो गए और एक द्वार पर ही खड़े हो गए जो अन्य नवप्रवेशी भक्त उनके पास आते और देवदर्शन की इच्छा व्यक्त करते वे उन्हें दक्षिणा के मूल्य पर झाँककर देखने का सुअवसर देते. इतने में अर्धसैनिक बल के एक सुरक्षाकर्मी किसी वी.आइ.पी. महिला को अपने साथ लाए और द्वार पर खड़े पुजारी को उन्हें देवदर्शन करवाने के लिए कहा. उन दोनों के बीच न जाने क्या बात हुई, पुजारी सुरक्षाकर्मी पर भड़क उठे और बोले- 'ए, तमीज़ से बात कर.'
'मेरे को तमीज़ सिखाता है ?' सुरक्षाकर्मी ने कहा.
'वर्दी पहन लिया इसलिए मेरे से ऊँची आवाज़ में बात करता है.'
'बताऊँ क्या ?'
'क्या बताएगा रे? यहां तेरा क़ानून चलेगा या हमारा, ये मंदिर है, यहाँ हमारा नियम चलता है.' पुजारी जोर से चीखा, न वर्दी का भय और न बन्दूक का डर. मैं सीधा-सादा छत्तीसगढ़िया उस बनारसी पंडित के दुस्साहस को देखकर चकित हो गया. हम लोग तो वर्दीवालों को देखते ही बिछ जाते हैं ताकि वे हमें कुचलकर चुपचाप निकल जाएँ॰ बात बिगड़ती देखकर उत्तरप्रदेश पुलिस के एक वरिष्ठ सिपाही दौड़ते आए और सुरक्षाकर्मी को अपनी बाहों में समेटकर वहां से दूर ले गए. पुजारी बड़बड़ाते रहे- 'साला अपने आपको समझता क्या है, हमको रुआब बताता है.' कुछ ही क्षणों में वे शान्त हो गए और उनका दक्षिणा-वसूली-अभियान फिर शुरू हो गया. उसी समय आरती आरम्भ हो गई, भक्तजन अधीर हो उठे और वहां अफरा-तफरी मच गई. हम दोनों गीली-मटमैली जमीन पर बैठे थे, भयभीत होकर उठ खड़े हुए ताकि भीड़ हम पर न चढ़ बैठे और एक ऐसे कोण पर जाकर खड़े हो गए जहां से आरती-कार्यक्रम थोड़ा बेहतर ढंग से दिख रहा था. आरती का अनुष्ठान आकर्षक और मनमोहक था लेकिन जिस ऊर्जा को महसूस करने के लिए हम दोनों दो घंटे से अड़े-खड़े थे, उसका सर्वथा अभाव था.
(३)
बाबा विश्वनाथ के मंदिर से हम दोनों लौटकर अपने डेरे में वापस आए॰ मैंने माधुरीजी से कहा- तुम कमरे में पहुँचो, मैं उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ का घर ढूँढ कर वापस आता हूँ, कल सुबह अपन दोनों वहाँ चलेंगे॰'
'हाँ ठीक है, अभी देख आओ तो अच्छा है, सुबह उनके घर का रास्ता कौन बताएगा! मुझे भी अभी ध्यान और प्राणायाम करना है, एक घंटा लग जाएगा॰' माधुरीजी ने कहा॰
मंदिर जाने के पूर्व हमने जिस दूकान में लस्सी पी थी उनसे मैंने बिस्मिल्लाह खाँ के घर का पता पूछा तो मालूम पड़ा कि बगल से दाल मंडी को रास्ता जाता है, कुछ दूर पर उनका घर है॰ बनारस की गलियों में पूछते-ढूँढते पंद्रह मिनट में मैं सराय हरहा के एक पुराने से मकान के सामने जा पहुंचा जहाँ एक छोटी सी नामपट्टिका में अंग्रेजी में लिखा हुआ था- 'भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां'. घर के अन्दर से शहनाई वादन की मीठी आवाज़ आ रही थी॰ सिर झुकाकर मैंने घर के अंदर प्रवेश किया॰ एक वयोवृद्ध सज्जन क़ुरान पढ़ रहे थे, कुछ देर में उन्होंने पुस्तक बन्द की, मेरी ओर देखा और पूछा- 'फरमाइए जनाब॰'
'मैं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से आया हूँ.' मैंने अपना परिचय दिया.
'कैसे तकलीफ़ की आपने?'
'खां साहब तो रहे नहीं, उनके घर को सलाम करने आया हूँ.'
'वाह, क्या बात है, मैं उनका बेटा नय्यर हुसैन खां हूँ. आप आए, बहुत अच्छा लगा. मेरे अब्बाहुज़ूर गज़ब के फनकार थे और वादा निभाने वाले इंसान थे. एक क़िस्सा बताऊँ आपको?'
'जी, ज़रूर.'
'सायराबानो की माँ नसीमबानो को एक बार अब्बा ने वादा किया था कि सायरा की शादी में वे ज़रूर शहनाई बजाएँगे. बात आई-गई हो गई. कई साल बाद की बात है, एक दिन दिलीपकुमार अब्बा के पास आए और अपने घुटनों के बल उनके सामने बैठ गए. अब्बा ने पूछा- ''बोलो यूसुफ, कैसे आए?''
''सायरा के साथ मेरा निकाह होने वाला है, आपको शहनाई बजानी है॰'' दिलीपकुमार ने गुजारिश की॰
''वाह, कमाल है अल्लाह का, सायरा की माँ को किया गया वादा निभाने का मौका अपने-आप मेरे पास आ गया! मैं आऊँगा, ज़रूर आऊँगा.'' अब्बा ने कहा और दिलीप-सायरा की शादी के जश्न में उन्होंने खूब शहनाई बजाई'.
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के बेटे नय्यर हुसैन खां अब पचहत्तर साल के हैं॰ अकेले हो गए हैं, दिन भर उसी घर में अपना समय कुरान पढ़कर बिताते हैं॰ रोज़ाना शाम ५ बजे अब्बा की मज़ार पर जाते हैं, दो-ढाई घंटे चुपचाप वहीं बैठते हैं, उसी चुप्पी में शायद अब्बा से बातें करते हैं और ८ बजे रात को सीधे घर वापस आ जाते हैं. उनकी बहू जो देती है, चुचाप खा लेते हैं और खुदा की याद करते हुए सुबह तीन बजे जागने के लिए सो जाते हैं. मैंने उनसे पूछा- 'शहनाई बजाने में जो महारत आपके अब्बा को हासिल थी, क्या आपने कोशिश की?'
'बहुत कोशिश की, उनकी सोहबत में बहुत रहा और देश-विदेश जाकर उनके साथ संगत भी की. शहनाई तो कोई भी बजा सकता है लेकिन अब्बा की शहनाई जैसा दर्द पैदा करना सबके बूते की बात नहीं. मैं उतना समय नहीं दे पाता था क्योंकि अब्बा बीस-पच्चीस साल बम्बई में रहे तो घर-गृहस्थी देखने की ज़िम्मेदारी मुझपर थी, हम लोग पाँच भाई थे. बम्बई से जब वे वापस आए तब भी घर में नहीं रहते थे, पास में बालाजी मंदिर है, वहीं रहते और संगीत साधना करते. सच्ची बात यह है कि वे बम्बई की फिल्मी दुनियाँ में शहनाई बजाया करते थे, उनकी वहाँ बहुत इज्ज़त थी लेकिन 'उस्ताद' वे तब बने जब उस दुनियाँ को छोड़कर बनारस वापस आए और सुरों की साधना की. बालाजी मंदिर में एक रात उनको लगा कि जैसे खुशबू का एक झोंका आया, कोई उनके सामने खड़ा हुआ दिखा और कहा- "जा, मज़ा कर." तुरन्त वह छाया गायब हो गई, अब्बा उसे खोजने कमरे के बाहर दौड़े, बहुत खोजे लेकिन रात के सन्नाटे के सिवाय वहाँ कुछ न था.' उन्होंने बताया.
'और किसी दूसरे भाई ने शहनाई में कोशिश नहीं की ?'
'की, तीसरे नंबर के भाई में वह कशिश थी, वो मक़बूल भी हुआ. उसका चेहरा बिलकुल अब्बा जैसा था लेकिन खुदा को कुछ और मंजूर था, सन २००९ में उसका इंतकाल हो गया. अब हमारा एक भतीजा है, अब्बा के बड़े भाई का पोता- नासिर अब्बास, आपको शहनाई की जो आवाज़ सुनाई पड़ रही है, अभी उसी का रियाज़ चल रहा है. अब्बा की शहनाई का दस-बीस परसेंट दर्द इसकी शहनाई में है.'
'मैं उसका रियाज़ देखना-सुनना चाहता हूँ.'
'बिलकुल॰' नैयर हुसैन खाँ ने मुझे अंदर जाने की इज़ाज़त दे दी.
अन्दर एक बड़ा कमरा जिसे घिरा हुआ दालान भी कहा सकता है, वहां पीली मद्धिम रौशनी थी, एक ओर कोने में लकड़ी का तख़्त रखा था जिस पर लगभग ८० वर्षीय वृद्ध बैठे हुए खाना खा रहे थे. उनके सामने जमीन पर बिछी चटाई में एक युवक शहनाई बजा रहे थे, मुझे आता देख उनकी शहनाई चुप हो गई, वे खड़े हो गए. बड़े अदब से मुझे आदाब किया और तख़्त पर वयोवृद्ध के बगल में बैठने का इशारा किया. बुजुर्ग ने मुझे देखा नहीं लेकिन जैसे ही उन्हें मेरे बैठने की आहट मिली, वे चौंके और मेरे बारे में पूछताछ की. मैंने अपने बारे में बताया और उनसे कुछ देर तक रियाज़ देखने-सुनने की दरख्वास्त की. बुजुर्ग ने शहनाईवादक को रियाज़ जारी रखने के लिए कहा और मुझसे बोले- 'आप जरा रुकिए, मैं रोटी खा लूँ.'
'जी हाँ, खा लीजिए.' मैंने कहा.
'बिलासपुर हम जा चुके है, रायपुर गए हैं, रायगढ़ गए हैं, दुर्ग गए हैं, ये छत्तीसगढ़ में ही है न ?'
'जी.'
'आप क्या बजाते हैं ?'
'मैं कुछ नहीं बजाता, मुझे कुछ नहीं आता. मैं तो केवल सुनने वाला हूँ.' मैंने जवाब दिया.
खुला बदन, लुंगी को घुटने तक समेटे- 'लाफिंग बुद्धा' जैसी हू-ब-हू काया और चेहरा लेकिन एक फर्क के साथ- चेहरे पर सफ़ेद छिटपुट दाढ़ी; बेदान्ती, दृष्टिहीन बुज़ुर्ग- ये हाजी मेहताब हुसैन थे, उस्ताद बिस्मिल्लाहखां के भतीजे, उन्होंने रोटी के बड़े टुकड़े को लौकी की रसीली सब्जी में डुबाकर एक कौर बनाकर खाया और खाते-खाते बोले- 'अभी जो आप सुन रहे हैं, यह मालकौंस है, गज़ब का राग है. सुनिए- "मन तड़पत हरि दरसन को आज", फिलिम बैजू बावरा में था ये. अब हम आपको अपने उस्ताद की बंदिश सुनाते हैं, "कोयलिया बोले अमवा डाल पर ..." वे खाना भूल गए और गायकी के असली रंग में आ गए, शागिर्द उनकी बंदिश को शहनाई पर उतारने लगे. पांच मिनट बीता होगा कि मेरा मोबाइल घनघनाया, उस ओर माधुरीजी थी- 'कहाँ अटक गए तुम, खाना नहीं खाओगे ?'
'बस, पंद्रह मिनट में आया.' मैंने कहा. उस्ताद से रुख़सती की इजाज़त ली. उनके शागिर्द नासिर अब्बास मुझे बाहर छोड़ने आए, मैंने पूछा- 'क्या चचा देख नहीं पाते ?'
'अब नहीं दिखाई पड़ता.'
'डाक्टर को दिखाया ?'
'हाँ, पर डाक्टर कहते हैं कि दोनों आँखों में अब बिलकुल रौशनी नहीं है, अब कुछ नहीं हो सकता.'
'इनको बिलासपुर ले आओ, वहां आँख के अच्छे डाक्टर हैं, शायद वहाँ बात बन जाए, मेरा पता रखिए, आने के पहले फोन करना.' मैंने अपना 'विजिटिंग कार्ड' देते हुए कहा.
'ठीक है.' नासिर ने हाथ जोड़कर कहा. बाहर आकर नैय्यर हुसैनजी से मैंने विदा मांगी तो उन्होंने पूछा- 'आप बनारस अकेले आए हैं क्या ?'
'पत्नी भी आई हुई हैं.'
'तो उनको साथ क्यों नहीं लाए ?'
'अभी तो मैं यह घर देखने आया था, कल सुबह हम दोनों आएंगे. मैं चलता हूँ, आदाब.' मैंने कहा.
'आइए, ज़रूर आइए, अल्लाह खैर करे. कल हम आपकी राह देखेंगे.' उन्होंने कहा.
अगले दिन हम दोनों भोर होने के पहने जग गए, योग साधना करके जब बाहर निकले तो सात बज चुके थे॰ एक रिक्शा लिया और खाँ साहब के घर की ओर चल पड़े॰ रिक्शावाले ने किसी नए रास्ते से हमें उनके घर के पास छोड़ दिया॰ पूछते हुए हम लोग उनके घर पहुंचे और नैयर हुसैन जी से बातचीत का दूसरा दौर शुरू हुआ॰
'मैंने खाँ साहब को बिलासपुर में सन 1965 में सुना था, मुझे अच्छी तौर से याद है, उस दिन शहनाईवादन में वे बहुत देर बिना रुके लगातार बजाते रहे, बजाते ही रहे॰ अचानक उनकी नज़रें मुझसे मिली, हम दोनों की नज़रें एक दूसरे पर टिकी रह गई॰ मुझे ऐसा लगा जैसे उस 'हाल' में केवल हम दोनों रह गए हैं॰ उस घटना को मैं कभी नहीं भूल सकता॰ मुझे यह समझ नहीं आया कि बिना साँस तोड़े उतनी देर तक वे कैसे बजा लेते थे?' मैंने पूछा.
'अब्बा रोजाना साँस का अभ्यास करते थे, प्राणायाम॰ वे घड़ी देखकर ढाई मिनट के लिए अपनी साँस रोक लिया करते थे॰' उन्होंने बताया.
'एक बात मैंने गौर की, आपका घर खोजते समय मैंने जिससे भी घर का पता पूछा, सबने बड़ी मुहब्बत से मुझे रास्ता बताया॰'
'लोग बिस्मिल्लाहखां को इस शहर की पहचान मानते हैं॰ उनके इंतकाल के बाद उनकी इज्ज़त में और इजाफा हुआ है॰ वे जब तक जिन्दा थे, चाहे जहां भी रहे हों, मोहर्रम के जुलूस में शामिल होने के लिए बनारस ज़रूर आ जाते और जुलूस के सामने शहनाई बजाते हुए निकलते थे॰ बनारस के लोग उन्हें सड़क पर शहनाई बजाते देख ठिठककर खड़े हो जाते और बड़ी अक़ीदत से उन्हें देखते॰ गंगाजी के सामने बैठकर शहनाई बजाना उनके लिए इबादत करने जैसा था॰'
'क्या उनकी शहनाई आप मुझे दिखा सकते हैं ?'
'नहीं, वह मँझले भाई की बीमारी के दौरान किसी ने चुरा ली॰ मँझले भाई अब्बा की शहनाई के सही वारिस थे॰ उन्होंने हमसे कहा- "मुझे अपने हिस्से का कुछ और नहीं चाहिए, शहनाई दे दी जाए", इसलिए उन्हें दी गई और वे उसी को बजाया करते थे॰' नय्यर हुसैन जी ने बताया॰
'उनके बारे में कुछ और बताइये॰' माधुरी जी ने पूछा॰
'उनका जनम बिहार के डुमराव में 21 मार्च 1916 को हुआ था॰ उनका बचपन का नाम कमरुद्दीन था॰ उन्होंने अपने चाचा अलीबख्श 'विलायती' से शहनाई सीखी थी॰ हमारे खानदान में शहनाई बजाने का काम कई पीढ़ियों से चला आ रहा है॰ राजे-रजवाड़े खत्म होने के बाद बनारस आए तब से यहीं घर बना लिया और एक शानदार ज़िंदगी जीने के बाद वे 21 अगस्त 2006 को इस दुनियाँ से कूच कर गए॰ उन्हें 1968 में 'पद्मभूषण' मिला और 2001 में 'भारत रत्न'॰ वे कभी पैसे के पीछे नहीं भागे॰ कहते थे- "सरस्वती की साधना करो, लक्ष्मी पीछे-पीछे चली आती है॰''
'यहाँ कई 'फोटोग्राफ' लगे हैं लेकिन 'भारत रत्न' की सनद नहीं दिख रही है !'
'वह है, है हमारे पास लेकिन उसमें दीमक लगनी शुरू हो गई थी इसलिए उसे सुधारने के लिए दिया है, अभी बनकर आई नहीं है॰' हाजी नैयर हुसैन खाँ ने बताया॰ हमारी मुलाक़ात ख़त्म हुई लेकिन यह ऐसी मुलाक़ात थी जिसकी याद दिल में हमेशा बनी रहेगी॰
बनारस केवल वाराणसी नहीं है या रिहायशी घरों में रहने वाले इन्सानों का घर नहीं है बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का एक नायाब नमूना है, उम्दा साहित्यकारों और कलाकारों की कर्मस्थली है॰ उस्ताद बिस्मिल्लाहखां की शहनाई उनके जाने के बाद सदा के लिए चुप हो गई लेकिन उसकी सदा अभी भी बनारस की फिज़ा में गूंज रही है॰ उस आवाज को अब कान नहीं सुन सकते, हाँ, दिल से सुना जा सकता है॰
'हाँ ठीक है, अभी देख आओ तो अच्छा है, सुबह उनके घर का रास्ता कौन बताएगा! मुझे भी अभी ध्यान और प्राणायाम करना है, एक घंटा लग जाएगा॰' माधुरीजी ने कहा॰
मंदिर जाने के पूर्व हमने जिस दूकान में लस्सी पी थी उनसे मैंने बिस्मिल्लाह खाँ के घर का पता पूछा तो मालूम पड़ा कि बगल से दाल मंडी को रास्ता जाता है, कुछ दूर पर उनका घर है॰ बनारस की गलियों में पूछते-ढूँढते पंद्रह मिनट में मैं सराय हरहा के एक पुराने से मकान के सामने जा पहुंचा जहाँ एक छोटी सी नामपट्टिका में अंग्रेजी में लिखा हुआ था- 'भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां'. घर के अन्दर से शहनाई वादन की मीठी आवाज़ आ रही थी॰ सिर झुकाकर मैंने घर के अंदर प्रवेश किया॰ एक वयोवृद्ध सज्जन क़ुरान पढ़ रहे थे, कुछ देर में उन्होंने पुस्तक बन्द की, मेरी ओर देखा और पूछा- 'फरमाइए जनाब॰'
'मैं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से आया हूँ.' मैंने अपना परिचय दिया.
'कैसे तकलीफ़ की आपने?'
'खां साहब तो रहे नहीं, उनके घर को सलाम करने आया हूँ.'
'वाह, क्या बात है, मैं उनका बेटा नय्यर हुसैन खां हूँ. आप आए, बहुत अच्छा लगा. मेरे अब्बाहुज़ूर गज़ब के फनकार थे और वादा निभाने वाले इंसान थे. एक क़िस्सा बताऊँ आपको?'
'जी, ज़रूर.'
'सायराबानो की माँ नसीमबानो को एक बार अब्बा ने वादा किया था कि सायरा की शादी में वे ज़रूर शहनाई बजाएँगे. बात आई-गई हो गई. कई साल बाद की बात है, एक दिन दिलीपकुमार अब्बा के पास आए और अपने घुटनों के बल उनके सामने बैठ गए. अब्बा ने पूछा- ''बोलो यूसुफ, कैसे आए?''
''सायरा के साथ मेरा निकाह होने वाला है, आपको शहनाई बजानी है॰'' दिलीपकुमार ने गुजारिश की॰
''वाह, कमाल है अल्लाह का, सायरा की माँ को किया गया वादा निभाने का मौका अपने-आप मेरे पास आ गया! मैं आऊँगा, ज़रूर आऊँगा.'' अब्बा ने कहा और दिलीप-सायरा की शादी के जश्न में उन्होंने खूब शहनाई बजाई'.
उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के बेटे नय्यर हुसैन खां अब पचहत्तर साल के हैं॰ अकेले हो गए हैं, दिन भर उसी घर में अपना समय कुरान पढ़कर बिताते हैं॰ रोज़ाना शाम ५ बजे अब्बा की मज़ार पर जाते हैं, दो-ढाई घंटे चुपचाप वहीं बैठते हैं, उसी चुप्पी में शायद अब्बा से बातें करते हैं और ८ बजे रात को सीधे घर वापस आ जाते हैं. उनकी बहू जो देती है, चुचाप खा लेते हैं और खुदा की याद करते हुए सुबह तीन बजे जागने के लिए सो जाते हैं. मैंने उनसे पूछा- 'शहनाई बजाने में जो महारत आपके अब्बा को हासिल थी, क्या आपने कोशिश की?'
'बहुत कोशिश की, उनकी सोहबत में बहुत रहा और देश-विदेश जाकर उनके साथ संगत भी की. शहनाई तो कोई भी बजा सकता है लेकिन अब्बा की शहनाई जैसा दर्द पैदा करना सबके बूते की बात नहीं. मैं उतना समय नहीं दे पाता था क्योंकि अब्बा बीस-पच्चीस साल बम्बई में रहे तो घर-गृहस्थी देखने की ज़िम्मेदारी मुझपर थी, हम लोग पाँच भाई थे. बम्बई से जब वे वापस आए तब भी घर में नहीं रहते थे, पास में बालाजी मंदिर है, वहीं रहते और संगीत साधना करते. सच्ची बात यह है कि वे बम्बई की फिल्मी दुनियाँ में शहनाई बजाया करते थे, उनकी वहाँ बहुत इज्ज़त थी लेकिन 'उस्ताद' वे तब बने जब उस दुनियाँ को छोड़कर बनारस वापस आए और सुरों की साधना की. बालाजी मंदिर में एक रात उनको लगा कि जैसे खुशबू का एक झोंका आया, कोई उनके सामने खड़ा हुआ दिखा और कहा- "जा, मज़ा कर." तुरन्त वह छाया गायब हो गई, अब्बा उसे खोजने कमरे के बाहर दौड़े, बहुत खोजे लेकिन रात के सन्नाटे के सिवाय वहाँ कुछ न था.' उन्होंने बताया.
'और किसी दूसरे भाई ने शहनाई में कोशिश नहीं की ?'
'की, तीसरे नंबर के भाई में वह कशिश थी, वो मक़बूल भी हुआ. उसका चेहरा बिलकुल अब्बा जैसा था लेकिन खुदा को कुछ और मंजूर था, सन २००९ में उसका इंतकाल हो गया. अब हमारा एक भतीजा है, अब्बा के बड़े भाई का पोता- नासिर अब्बास, आपको शहनाई की जो आवाज़ सुनाई पड़ रही है, अभी उसी का रियाज़ चल रहा है. अब्बा की शहनाई का दस-बीस परसेंट दर्द इसकी शहनाई में है.'
'मैं उसका रियाज़ देखना-सुनना चाहता हूँ.'
'बिलकुल॰' नैयर हुसैन खाँ ने मुझे अंदर जाने की इज़ाज़त दे दी.
अन्दर एक बड़ा कमरा जिसे घिरा हुआ दालान भी कहा सकता है, वहां पीली मद्धिम रौशनी थी, एक ओर कोने में लकड़ी का तख़्त रखा था जिस पर लगभग ८० वर्षीय वृद्ध बैठे हुए खाना खा रहे थे. उनके सामने जमीन पर बिछी चटाई में एक युवक शहनाई बजा रहे थे, मुझे आता देख उनकी शहनाई चुप हो गई, वे खड़े हो गए. बड़े अदब से मुझे आदाब किया और तख़्त पर वयोवृद्ध के बगल में बैठने का इशारा किया. बुजुर्ग ने मुझे देखा नहीं लेकिन जैसे ही उन्हें मेरे बैठने की आहट मिली, वे चौंके और मेरे बारे में पूछताछ की. मैंने अपने बारे में बताया और उनसे कुछ देर तक रियाज़ देखने-सुनने की दरख्वास्त की. बुजुर्ग ने शहनाईवादक को रियाज़ जारी रखने के लिए कहा और मुझसे बोले- 'आप जरा रुकिए, मैं रोटी खा लूँ.'
'जी हाँ, खा लीजिए.' मैंने कहा.
'बिलासपुर हम जा चुके है, रायपुर गए हैं, रायगढ़ गए हैं, दुर्ग गए हैं, ये छत्तीसगढ़ में ही है न ?'
'जी.'
'आप क्या बजाते हैं ?'
'मैं कुछ नहीं बजाता, मुझे कुछ नहीं आता. मैं तो केवल सुनने वाला हूँ.' मैंने जवाब दिया.
खुला बदन, लुंगी को घुटने तक समेटे- 'लाफिंग बुद्धा' जैसी हू-ब-हू काया और चेहरा लेकिन एक फर्क के साथ- चेहरे पर सफ़ेद छिटपुट दाढ़ी; बेदान्ती, दृष्टिहीन बुज़ुर्ग- ये हाजी मेहताब हुसैन थे, उस्ताद बिस्मिल्लाहखां के भतीजे, उन्होंने रोटी के बड़े टुकड़े को लौकी की रसीली सब्जी में डुबाकर एक कौर बनाकर खाया और खाते-खाते बोले- 'अभी जो आप सुन रहे हैं, यह मालकौंस है, गज़ब का राग है. सुनिए- "मन तड़पत हरि दरसन को आज", फिलिम बैजू बावरा में था ये. अब हम आपको अपने उस्ताद की बंदिश सुनाते हैं, "कोयलिया बोले अमवा डाल पर ..." वे खाना भूल गए और गायकी के असली रंग में आ गए, शागिर्द उनकी बंदिश को शहनाई पर उतारने लगे. पांच मिनट बीता होगा कि मेरा मोबाइल घनघनाया, उस ओर माधुरीजी थी- 'कहाँ अटक गए तुम, खाना नहीं खाओगे ?'
'बस, पंद्रह मिनट में आया.' मैंने कहा. उस्ताद से रुख़सती की इजाज़त ली. उनके शागिर्द नासिर अब्बास मुझे बाहर छोड़ने आए, मैंने पूछा- 'क्या चचा देख नहीं पाते ?'
'अब नहीं दिखाई पड़ता.'
'डाक्टर को दिखाया ?'
'हाँ, पर डाक्टर कहते हैं कि दोनों आँखों में अब बिलकुल रौशनी नहीं है, अब कुछ नहीं हो सकता.'
'इनको बिलासपुर ले आओ, वहां आँख के अच्छे डाक्टर हैं, शायद वहाँ बात बन जाए, मेरा पता रखिए, आने के पहले फोन करना.' मैंने अपना 'विजिटिंग कार्ड' देते हुए कहा.
'ठीक है.' नासिर ने हाथ जोड़कर कहा. बाहर आकर नैय्यर हुसैनजी से मैंने विदा मांगी तो उन्होंने पूछा- 'आप बनारस अकेले आए हैं क्या ?'
'पत्नी भी आई हुई हैं.'
'तो उनको साथ क्यों नहीं लाए ?'
'अभी तो मैं यह घर देखने आया था, कल सुबह हम दोनों आएंगे. मैं चलता हूँ, आदाब.' मैंने कहा.
'आइए, ज़रूर आइए, अल्लाह खैर करे. कल हम आपकी राह देखेंगे.' उन्होंने कहा.
अगले दिन हम दोनों भोर होने के पहने जग गए, योग साधना करके जब बाहर निकले तो सात बज चुके थे॰ एक रिक्शा लिया और खाँ साहब के घर की ओर चल पड़े॰ रिक्शावाले ने किसी नए रास्ते से हमें उनके घर के पास छोड़ दिया॰ पूछते हुए हम लोग उनके घर पहुंचे और नैयर हुसैन जी से बातचीत का दूसरा दौर शुरू हुआ॰
'मैंने खाँ साहब को बिलासपुर में सन 1965 में सुना था, मुझे अच्छी तौर से याद है, उस दिन शहनाईवादन में वे बहुत देर बिना रुके लगातार बजाते रहे, बजाते ही रहे॰ अचानक उनकी नज़रें मुझसे मिली, हम दोनों की नज़रें एक दूसरे पर टिकी रह गई॰ मुझे ऐसा लगा जैसे उस 'हाल' में केवल हम दोनों रह गए हैं॰ उस घटना को मैं कभी नहीं भूल सकता॰ मुझे यह समझ नहीं आया कि बिना साँस तोड़े उतनी देर तक वे कैसे बजा लेते थे?' मैंने पूछा.
'अब्बा रोजाना साँस का अभ्यास करते थे, प्राणायाम॰ वे घड़ी देखकर ढाई मिनट के लिए अपनी साँस रोक लिया करते थे॰' उन्होंने बताया.
'एक बात मैंने गौर की, आपका घर खोजते समय मैंने जिससे भी घर का पता पूछा, सबने बड़ी मुहब्बत से मुझे रास्ता बताया॰'
'लोग बिस्मिल्लाहखां को इस शहर की पहचान मानते हैं॰ उनके इंतकाल के बाद उनकी इज्ज़त में और इजाफा हुआ है॰ वे जब तक जिन्दा थे, चाहे जहां भी रहे हों, मोहर्रम के जुलूस में शामिल होने के लिए बनारस ज़रूर आ जाते और जुलूस के सामने शहनाई बजाते हुए निकलते थे॰ बनारस के लोग उन्हें सड़क पर शहनाई बजाते देख ठिठककर खड़े हो जाते और बड़ी अक़ीदत से उन्हें देखते॰ गंगाजी के सामने बैठकर शहनाई बजाना उनके लिए इबादत करने जैसा था॰'
'क्या उनकी शहनाई आप मुझे दिखा सकते हैं ?'
'नहीं, वह मँझले भाई की बीमारी के दौरान किसी ने चुरा ली॰ मँझले भाई अब्बा की शहनाई के सही वारिस थे॰ उन्होंने हमसे कहा- "मुझे अपने हिस्से का कुछ और नहीं चाहिए, शहनाई दे दी जाए", इसलिए उन्हें दी गई और वे उसी को बजाया करते थे॰' नय्यर हुसैन जी ने बताया॰
'उनके बारे में कुछ और बताइये॰' माधुरी जी ने पूछा॰
'उनका जनम बिहार के डुमराव में 21 मार्च 1916 को हुआ था॰ उनका बचपन का नाम कमरुद्दीन था॰ उन्होंने अपने चाचा अलीबख्श 'विलायती' से शहनाई सीखी थी॰ हमारे खानदान में शहनाई बजाने का काम कई पीढ़ियों से चला आ रहा है॰ राजे-रजवाड़े खत्म होने के बाद बनारस आए तब से यहीं घर बना लिया और एक शानदार ज़िंदगी जीने के बाद वे 21 अगस्त 2006 को इस दुनियाँ से कूच कर गए॰ उन्हें 1968 में 'पद्मभूषण' मिला और 2001 में 'भारत रत्न'॰ वे कभी पैसे के पीछे नहीं भागे॰ कहते थे- "सरस्वती की साधना करो, लक्ष्मी पीछे-पीछे चली आती है॰''
'यहाँ कई 'फोटोग्राफ' लगे हैं लेकिन 'भारत रत्न' की सनद नहीं दिख रही है !'
'वह है, है हमारे पास लेकिन उसमें दीमक लगनी शुरू हो गई थी इसलिए उसे सुधारने के लिए दिया है, अभी बनकर आई नहीं है॰' हाजी नैयर हुसैन खाँ ने बताया॰ हमारी मुलाक़ात ख़त्म हुई लेकिन यह ऐसी मुलाक़ात थी जिसकी याद दिल में हमेशा बनी रहेगी॰
बनारस केवल वाराणसी नहीं है या रिहायशी घरों में रहने वाले इन्सानों का घर नहीं है बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का एक नायाब नमूना है, उम्दा साहित्यकारों और कलाकारों की कर्मस्थली है॰ उस्ताद बिस्मिल्लाहखां की शहनाई उनके जाने के बाद सदा के लिए चुप हो गई लेकिन उसकी सदा अभी भी बनारस की फिज़ा में गूंज रही है॰ उस आवाज को अब कान नहीं सुन सकते, हाँ, दिल से सुना जा सकता है॰
(४)
बनारस में सुबह के वक्त कचौड़ीगली की बन्द दूकानों के बाहर पूड़ी-कचौड़ी और चाय की दूकानें सज जाती हैं। ऐसी ही एक दूकान में मैंने चार पूड़ी-कचौड़ी, साथ में आलू-कुम्हड़े की साग और जलेबी ली। बहती हुई नाली के ऊपर रखे तख्त पर दोने में मिले उस नाश्ते को बनारस की खासियत मानकर किसी प्रकार बेमन से खाना शुरू किया लेकिन वाह जनाब वाह, मज़ा आ गया। अब समझिए, मैं तारीफ़ कर रहा हूँ- एक हलवाई तारीफ़ कर रहा है। कभी बनारस जाएँ तो इसका आनंद अवश्य लें और मुझे याद करें। जियो बनारस।
वहाँ से निकलकर मैं चाय की एक सड़कछाप दूकान में रुका, चाय का आदेश दिया। चाय गरम होने के कारण 'पेपर कप' पकड़ते न बने इसलिए कप को मैंने पास बने 'लेटर बॉक्स' के ऊपर रख दिया। लेटरबॉक्स का मतलब है- वह डिब्बा जिसमें डाक विभाग के ज़रिए भेजे जानेवाले पत्रों को डाला जाता है- ( पाठक मुझ पर नाराज़ न हों, नई पीढ़ी के लोग बेचारे इस डिब्बे को क्या जानें ! उनकी जानकारी के लिए विस्तार से लिखना पड़ा )। डिब्बे के बगल में एक चबूतरे पर तीन बनारसी युवक चाय सुड़क रहे थे। मैंने उनकी ओर देखा और सहज मुस्कान से सरोबार एक प्रश्न फेंका- 'आपका बनारस तो अब जापान के जैसा हो जाएगा ?' तीनों ने मुझे घूरा, दो लोग मुझे देखकर रहस्यपूर्ण ढंग से मुस्कुराए और पुनः चाय पीने में व्यस्त हो गए। एक की चाय खत्म हो चुकी थी तो उसने अपने मुंह में पान डाला और बोला- 'क्या कहा आपने, बनारस जापान जैसा हो जाएगा ? चाचा, ये नेपाल जैसा तक नहीं हो सकता।'
'क्यों भाई ?' मैंने पूछा।'
'मोदी जी नए हैं, बनारस को क्या जानें ! न यहाँ का आदमी बदलेगा और न ये शहर।'
'इतने निराश क्यों हो ?'
'बात आशा-निराशा की नहीं है, असल में यहाँ का आदमी अड़भंग है।'
'ये 'अड़भंग' क्या होता है ?'
'यहाँ का आदमी मनमौजी है, नियम-कायदा नहीं मानता। उसका अपना कानून होता है, जहां मन आएगा कचरा फेंकेगा, जहां चाहे खड़े होकर मूतेगा, हर काम मनमाना। शहर में कितने 'ट्रेफिक सिग्नल' लगे थे, लालबत्ती जलती थी लेकिन लेकिन कोई बनारसी लालबत्ती को नहीं मानता, उसे जाना है तो जाना है, कोई नहीं रोक सकता। यदि कोई लालबत्ती देखकर रुक जाता था तो हम समझ जाते थे कि 'आउटसाइडर' है। सब 'ट्रेफिक सिग्नल' बन्द कर दिए गए, कई तो जमीन की धूल चाट रहे हैं।'
'अब मोदी जी आपके सांसद बन गए हैं सब सुधार देंगे।' मैंने कहा और अपनी चाय उठाकर पीने लगा।
'बिजली और साफ-सफाई ठीक करवा दें, वही बहुत है।'
'यह प्रधानमंत्री का काम तो है नहीं, राज्य सरकार और निगम का काम है।'
'ठीक है आपकी बात लेकिन मोदी सांसद हैं कि नहीं हैं, उनको करवाना चाहिए। इतना करवा दें तो जानें, जापान की बात बाद में मानेंगे।' उसने कहा। तब तक मेरी चाय खत्म हो गई, चायवाले को मैंने पाँच रुपए दिए और वहाँ से आगे बढ़ गया, मुझे बनारस को और भी देखना और समझना जो था !
वहाँ से निकलकर मैं चाय की एक सड़कछाप दूकान में रुका, चाय का आदेश दिया। चाय गरम होने के कारण 'पेपर कप' पकड़ते न बने इसलिए कप को मैंने पास बने 'लेटर बॉक्स' के ऊपर रख दिया। लेटरबॉक्स का मतलब है- वह डिब्बा जिसमें डाक विभाग के ज़रिए भेजे जानेवाले पत्रों को डाला जाता है- ( पाठक मुझ पर नाराज़ न हों, नई पीढ़ी के लोग बेचारे इस डिब्बे को क्या जानें ! उनकी जानकारी के लिए विस्तार से लिखना पड़ा )। डिब्बे के बगल में एक चबूतरे पर तीन बनारसी युवक चाय सुड़क रहे थे। मैंने उनकी ओर देखा और सहज मुस्कान से सरोबार एक प्रश्न फेंका- 'आपका बनारस तो अब जापान के जैसा हो जाएगा ?' तीनों ने मुझे घूरा, दो लोग मुझे देखकर रहस्यपूर्ण ढंग से मुस्कुराए और पुनः चाय पीने में व्यस्त हो गए। एक की चाय खत्म हो चुकी थी तो उसने अपने मुंह में पान डाला और बोला- 'क्या कहा आपने, बनारस जापान जैसा हो जाएगा ? चाचा, ये नेपाल जैसा तक नहीं हो सकता।'
'क्यों भाई ?' मैंने पूछा।'
'मोदी जी नए हैं, बनारस को क्या जानें ! न यहाँ का आदमी बदलेगा और न ये शहर।'
'इतने निराश क्यों हो ?'
'बात आशा-निराशा की नहीं है, असल में यहाँ का आदमी अड़भंग है।'
'ये 'अड़भंग' क्या होता है ?'
'यहाँ का आदमी मनमौजी है, नियम-कायदा नहीं मानता। उसका अपना कानून होता है, जहां मन आएगा कचरा फेंकेगा, जहां चाहे खड़े होकर मूतेगा, हर काम मनमाना। शहर में कितने 'ट्रेफिक सिग्नल' लगे थे, लालबत्ती जलती थी लेकिन लेकिन कोई बनारसी लालबत्ती को नहीं मानता, उसे जाना है तो जाना है, कोई नहीं रोक सकता। यदि कोई लालबत्ती देखकर रुक जाता था तो हम समझ जाते थे कि 'आउटसाइडर' है। सब 'ट्रेफिक सिग्नल' बन्द कर दिए गए, कई तो जमीन की धूल चाट रहे हैं।'
'अब मोदी जी आपके सांसद बन गए हैं सब सुधार देंगे।' मैंने कहा और अपनी चाय उठाकर पीने लगा।
'बिजली और साफ-सफाई ठीक करवा दें, वही बहुत है।'
'यह प्रधानमंत्री का काम तो है नहीं, राज्य सरकार और निगम का काम है।'
'ठीक है आपकी बात लेकिन मोदी सांसद हैं कि नहीं हैं, उनको करवाना चाहिए। इतना करवा दें तो जानें, जापान की बात बाद में मानेंगे।' उसने कहा। तब तक मेरी चाय खत्म हो गई, चायवाले को मैंने पाँच रुपए दिए और वहाँ से आगे बढ़ गया, मुझे बनारस को और भी देखना और समझना जो था !
(५)
दिन में साढ़े दस बजे हम लोग वाराणसी से 11 किलोमीटर दूर स्थित सारनाथ के लिए एक तिपहिया 'आटो' में गए। रास्ता बेढब था, बीच में लगभग दो किलोमीटर तक मिट्टी की पकी ईंटों को बिछाकर सड़क बनी हुई थी जिस पर आटो का उचक-उचक कर चलना गुदगुदी का आभास दे रहा था। गुदगुदी के साथ क्षोभ भी हो रहा था कि जिस महत्व के पर्यटन तीर्थ क्षेत्र में असंख्य देशी-विदेशी पर्यटक प्रतिदिन आते-जाते हों, उस रास्ते का कितना बुरा हाल है ! सड़क की दुर्दशा और चारों ओर पसरी गंदगी को देखकर ऐसा लगे- 'ये कहाँ आ गए हम ?'
बनारस शहर के अंदर एक सड़क पर कोलतार बिछाया जा रहा था, आवागमन बंद कर दिया गया था, दूकानदार हाथ में हाथ धरे बैठे थे। आटोचालक से मैंने पूछा- 'सड़क-सुधार का काम दिन में क्यों हो रहा है, इसे तो रात में होना चाहिए !'
'अंकल, ये बनारस है, यहाँ सब काम उल्टा ही होता है।'
'अब सब सीधा होगा देखना, मोदी जी आ गए हैं।'
'फिर साल दो साल बाद आ जाइएगा और देख लीजिएगा, बनारस जस का तस मिलेगा।'
'अरे ऐसा क्या ? अच्छा ये तो बताओ, ये 'अड़भंग' का मतलब क्या है ?'
'अड़भंग का मतलब है, अड़ने और भिड़ने वाला। यहाँ का आदमी लड़ने-झगड़ने में उस्ताद है। बात बिना बात लड़ लेगा, बहस कर लेगा, गाली दे देगा।'
'मारपीट भी हो जाती होगी ?'
'हाँ, बिलकुल, 'पुलिस केस' हो जाता है, सब अंदर हो जाते हैं।'
'फिर ?'
'फिर क्या, जिसकी पहुँच होती है वह बाहर हो जाता है और जिसकी नहीं है वह जेल के अंदर।'
'क्या मतलब ?'
'साहब, यहाँ न्याय-अन्याय नहीं चलता, जिसकी पहुँच है, जिसका राज है, उसी का दबदबा चलता है। आजकल यादव लोगों का चलता है, मायावती के जमाने में भंगियों का था।'
'अब तो भाजपा का राज आ गया है, अब किसका चलेगा ?'
'आप तो सब जानते हैं, मेरा मुँह क्यों खुलवाते हैं ?' आटो चालक ने चालाकी बताई, मैं समझ गया, मैंने पूछा- 'तुम्हारा नाम क्या है ?'
'वाहिद।' उसने बताया।
सवा ग्यारह बजे हम लोग सारनाथ पहुँच गए। बीस रुपए में एक 'गाइड' लिया और अंदर पहुंचे। अंदर पहुँचते ही मालूम हुआ कि साढ़े ग्यारह बजे मंदिर के पट बंद हो जाते हैं इसलिए दौड़ते-भागते बोधि वृक्ष के पास पहुंचे फिर वहाँ से महात्मा बुद्ध के मंदिर गए। उनकी एक झलक देखी और प्रणाम करके बाहर आ गए, उनके समक्ष बैठकर ध्यान करने की अभिलाषा उनके पास जाकर भी अधूरी रह गई।
डेढ़ वर्ष पूर्व मैं श्रीलंका गया था, वहाँ मैंने महात्मा बुद्ध के अद्भुत मंदिर देखे, बौद्ध अनुयायियों की अपूर्व श्रद्धा देखी लेकिन भारत के इस तीर्थ में मुझे उनका वह मान-सम्मान नहीं दिखा। कहावत है न, 'घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध।' काश भारतवासी महात्मा बुद्ध को पढ़ते, समझने की कोशिश करते, उनकी सीख को अपनाते तो हमारा देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाता!
बनारस शहर के अंदर एक सड़क पर कोलतार बिछाया जा रहा था, आवागमन बंद कर दिया गया था, दूकानदार हाथ में हाथ धरे बैठे थे। आटोचालक से मैंने पूछा- 'सड़क-सुधार का काम दिन में क्यों हो रहा है, इसे तो रात में होना चाहिए !'
'अंकल, ये बनारस है, यहाँ सब काम उल्टा ही होता है।'
'अब सब सीधा होगा देखना, मोदी जी आ गए हैं।'
'फिर साल दो साल बाद आ जाइएगा और देख लीजिएगा, बनारस जस का तस मिलेगा।'
'अरे ऐसा क्या ? अच्छा ये तो बताओ, ये 'अड़भंग' का मतलब क्या है ?'
'अड़भंग का मतलब है, अड़ने और भिड़ने वाला। यहाँ का आदमी लड़ने-झगड़ने में उस्ताद है। बात बिना बात लड़ लेगा, बहस कर लेगा, गाली दे देगा।'
'मारपीट भी हो जाती होगी ?'
'हाँ, बिलकुल, 'पुलिस केस' हो जाता है, सब अंदर हो जाते हैं।'
'फिर ?'
'फिर क्या, जिसकी पहुँच होती है वह बाहर हो जाता है और जिसकी नहीं है वह जेल के अंदर।'
'क्या मतलब ?'
'साहब, यहाँ न्याय-अन्याय नहीं चलता, जिसकी पहुँच है, जिसका राज है, उसी का दबदबा चलता है। आजकल यादव लोगों का चलता है, मायावती के जमाने में भंगियों का था।'
'अब तो भाजपा का राज आ गया है, अब किसका चलेगा ?'
'आप तो सब जानते हैं, मेरा मुँह क्यों खुलवाते हैं ?' आटो चालक ने चालाकी बताई, मैं समझ गया, मैंने पूछा- 'तुम्हारा नाम क्या है ?'
'वाहिद।' उसने बताया।
सवा ग्यारह बजे हम लोग सारनाथ पहुँच गए। बीस रुपए में एक 'गाइड' लिया और अंदर पहुंचे। अंदर पहुँचते ही मालूम हुआ कि साढ़े ग्यारह बजे मंदिर के पट बंद हो जाते हैं इसलिए दौड़ते-भागते बोधि वृक्ष के पास पहुंचे फिर वहाँ से महात्मा बुद्ध के मंदिर गए। उनकी एक झलक देखी और प्रणाम करके बाहर आ गए, उनके समक्ष बैठकर ध्यान करने की अभिलाषा उनके पास जाकर भी अधूरी रह गई।
डेढ़ वर्ष पूर्व मैं श्रीलंका गया था, वहाँ मैंने महात्मा बुद्ध के अद्भुत मंदिर देखे, बौद्ध अनुयायियों की अपूर्व श्रद्धा देखी लेकिन भारत के इस तीर्थ में मुझे उनका वह मान-सम्मान नहीं दिखा। कहावत है न, 'घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध।' काश भारतवासी महात्मा बुद्ध को पढ़ते, समझने की कोशिश करते, उनकी सीख को अपनाते तो हमारा देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाता!
(६)
बनारस गए और गंगाजी की आरती न देखी तो क्या देखा ! बनारस गए और गंगाजी में स्नान न क्या तो क्या किया ! ये दोनों कार्यक्रम हमारी सूची में थे, ९ सितंबर की शाम आरती और १० सितंबर की सुबह स्नान के लिए। आरती संध्याकाल के पश्चात सात बजे आरंभ होती है इसलिए हम दोनों भी अन्य असंख्य श्रद्धालुओं के साथ दशाश्वमेध घाट पर एक घंटा पहले पहुँच गए, एक 'बोट' पर बैठ गए ताकि नदी की ओर से देखकर उस कार्यक्रम का आनन्द लिया जा सके। वह अत्यंत मनोहारी कार्यक्रम था, मैंने उसके पूर्व जितनी भी आरती देखी थी, उन सब से अधिक आकर्षक और सुनियोजित, मन मुदित हुआ।
हमारी बोट में हमारे साथ अन्य श्रद्धालुओं में एक पिता-पुत्री भी थे। आरती के पूर्व से लेकर समाप्ति तक, लगभग डेढ़ घंटे, अनुमानित सत्रह वर्षीय पुत्री ने बोट में खड़े होकर या बैठकर कोई चालीस-पचास अदाएं-मुद्राएँ बनाई जिनका 'मोबाइल फोटो शूट' उसके पिता करते रहे। न पुत्री रुकी न पिता रुके। इस प्रकार हमें आरती के धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ पूरे समय तक 'माडलिंग' देखने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ। 'सिंगल पेमेंट, डबल शो'। ली जा रही हर एक 'फोटो' को वह बाला मुस्कुराकर देखती, उसे 'व्हाट्स-अप' में चिपकाती, फिर 'कमेंट्स' देखती, अधिक मुस्कुराती और पुनः नया 'पोज़' देकर अगला 'व्हाट्स-अप फोटो' निकलवाती। पिताजी ने तो बीच-बीच में आरती को देखा लेकिन पुत्री? ॐ व्हाट्स-अपाय नमः!
आरती होने के पश्चात समस्त देवी-देवताओं के जयकारे लगवाए गए, उनमें एक जयकारा साईंबाबा के नाम का भी था- साईंभक्तों के लिए अच्छी खबर। कार्यक्रम समाप्त होते-होते अंधेरा हो गया, फिर 'बोटिंग' शुरू हुई। अंधेरा अवश्य था लेकिन पूर्ण चन्द्रमा का प्रकाश गंगाजी पर बिखरकर अतिशोभित हो रहा था। बोट के नाविक राहुल ( मोदी भक्त प्रसन्न न हों!) थे जो घाटों के नाम और उसकी विशेषता बताते जा रहे थे। कुल ८४ घाटों में से एक था- नारद घाट। उन्होंने बताया- 'इस घाट में यदि पति-पत्नी साथ में स्नान कर लें तो उनमें झगड़ा होता है।'
'हमें नहाना है, इस घाट में।' मैंने उसकी बात सुनकर हँसते हुए कहा।
'कल सुबह आ जाइए, आप दोनों को नहलवाए देते हैं।' नाविक राहुल ने कहा।
अगली सुबह गंगाजी के स्नान का मुहूर्त बना। हम दोनों दशाश्वमेध घाट पहुँच गए। घाट में बहुत गंदगी थी इसलिए पानी में उतरने की हिम्मत न पड़ी इसलिए उस पार जाकर नहाने का निर्णय लिया। बोट वाले से जुर्माना पूछा, उसने १२०/- प्रति व्यक्ति बताया, मैंने २०/- कम करवा लिया और बोट पर सवार हो गए। उसने आश्वासन दिया कि जल्दी ही उस पार ले चलेगा लेकिन उसका 'सवारी भरो' अभियान बहुत अधिक समय ले रहा था जबकि हम लोग बैठे-बैठे धूप में तप रहे थे, फिर स्नान करके वापस भी जल्दी लौटना था क्योंकि बारह बजे हमारी वापसी ट्रेन थी। कुछ देर बाद माधुरीजी का धैर्य समाप्त हो गया, बोट वाले से उन्होंने कहा- 'कितनी देर लगाओगे, यहाँ बैठने के लिए आए हैं क्या ?'
'बस, चलते हैं।' बोट वाले ने कहा।
'क्या चलते हैं ? जब से हम लोगों को यहाँ अटका दिया.' बोट में बैठे अन्य लोगों ने भी माधुरीजी का साथ दिया क्योंकि सभी परेशान हो गए थे। मैंने माधुरी से कहा-'उसका धंधा है, जब बोट भरेगी तब तो ले जाएगा।'
'तुम्हारी आदत है, तुम हमेशा गलत समय पर टोकते हो। मैंने उसको डांटा उसका सारा असर तुमने बर्बाद कर दिया। चुप रहा करो।' मैंने अपना मुंह मोड़ लिया और गंगा के पानी की ओर देखने लगा। किसी प्रकार उसकी नाव भरी और कुछ ही समय में हम लोग गंगा के उस पार पहुँच गए। उस पार भी उतना ही मटमैला जल था। हिम्मत करके जल में घुसे और संयुक्त स्नान किया- 'हर हर गंगे' का घोष किया। नहाते समय माधुरीजी ने मुझसे पूछा- 'तुम बता सकते हो कि पानी किस ओर बह रहा है ?'
'इसमें तो कोई धार नहीं है, कोई 'करेंट' नहीं, यह तो ठहरा हुआ पानी है !'
'हम गंगा जी में नहाने आए थे, ये तो तालाब निकला !'
'कोई बात नहीं, बनारस में जो भी होगा, अज़ब ही होगा, हर गंगे।' मैंने कहा।
बनारस को देखने-समझने के लिए तीन दिन बहुत कम होते हैं। उस चाय की दूकान तक पहुँचने की मेरी तमन्ना अधूरी रह गई जहाँ काशीनाथ सिंह और बनारस के अन्य साहित्यकार प्रतिदिन साहित्य-चर्चा करते हैं। मघई पान और जलेबी की मशहूर दूकानों तक भी नहीं पहुँच पाया। वहां और भी बहुत कुछ होगा जिसे मैं नहीं जानता। फिर कभी ज़रूर आऊंगा, बनारस।
बना रहे बनारस।
हमारी बोट में हमारे साथ अन्य श्रद्धालुओं में एक पिता-पुत्री भी थे। आरती के पूर्व से लेकर समाप्ति तक, लगभग डेढ़ घंटे, अनुमानित सत्रह वर्षीय पुत्री ने बोट में खड़े होकर या बैठकर कोई चालीस-पचास अदाएं-मुद्राएँ बनाई जिनका 'मोबाइल फोटो शूट' उसके पिता करते रहे। न पुत्री रुकी न पिता रुके। इस प्रकार हमें आरती के धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ पूरे समय तक 'माडलिंग' देखने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ। 'सिंगल पेमेंट, डबल शो'। ली जा रही हर एक 'फोटो' को वह बाला मुस्कुराकर देखती, उसे 'व्हाट्स-अप' में चिपकाती, फिर 'कमेंट्स' देखती, अधिक मुस्कुराती और पुनः नया 'पोज़' देकर अगला 'व्हाट्स-अप फोटो' निकलवाती। पिताजी ने तो बीच-बीच में आरती को देखा लेकिन पुत्री? ॐ व्हाट्स-अपाय नमः!
आरती होने के पश्चात समस्त देवी-देवताओं के जयकारे लगवाए गए, उनमें एक जयकारा साईंबाबा के नाम का भी था- साईंभक्तों के लिए अच्छी खबर। कार्यक्रम समाप्त होते-होते अंधेरा हो गया, फिर 'बोटिंग' शुरू हुई। अंधेरा अवश्य था लेकिन पूर्ण चन्द्रमा का प्रकाश गंगाजी पर बिखरकर अतिशोभित हो रहा था। बोट के नाविक राहुल ( मोदी भक्त प्रसन्न न हों!) थे जो घाटों के नाम और उसकी विशेषता बताते जा रहे थे। कुल ८४ घाटों में से एक था- नारद घाट। उन्होंने बताया- 'इस घाट में यदि पति-पत्नी साथ में स्नान कर लें तो उनमें झगड़ा होता है।'
'हमें नहाना है, इस घाट में।' मैंने उसकी बात सुनकर हँसते हुए कहा।
'कल सुबह आ जाइए, आप दोनों को नहलवाए देते हैं।' नाविक राहुल ने कहा।
अगली सुबह गंगाजी के स्नान का मुहूर्त बना। हम दोनों दशाश्वमेध घाट पहुँच गए। घाट में बहुत गंदगी थी इसलिए पानी में उतरने की हिम्मत न पड़ी इसलिए उस पार जाकर नहाने का निर्णय लिया। बोट वाले से जुर्माना पूछा, उसने १२०/- प्रति व्यक्ति बताया, मैंने २०/- कम करवा लिया और बोट पर सवार हो गए। उसने आश्वासन दिया कि जल्दी ही उस पार ले चलेगा लेकिन उसका 'सवारी भरो' अभियान बहुत अधिक समय ले रहा था जबकि हम लोग बैठे-बैठे धूप में तप रहे थे, फिर स्नान करके वापस भी जल्दी लौटना था क्योंकि बारह बजे हमारी वापसी ट्रेन थी। कुछ देर बाद माधुरीजी का धैर्य समाप्त हो गया, बोट वाले से उन्होंने कहा- 'कितनी देर लगाओगे, यहाँ बैठने के लिए आए हैं क्या ?'
'बस, चलते हैं।' बोट वाले ने कहा।
'क्या चलते हैं ? जब से हम लोगों को यहाँ अटका दिया.' बोट में बैठे अन्य लोगों ने भी माधुरीजी का साथ दिया क्योंकि सभी परेशान हो गए थे। मैंने माधुरी से कहा-'उसका धंधा है, जब बोट भरेगी तब तो ले जाएगा।'
'तुम्हारी आदत है, तुम हमेशा गलत समय पर टोकते हो। मैंने उसको डांटा उसका सारा असर तुमने बर्बाद कर दिया। चुप रहा करो।' मैंने अपना मुंह मोड़ लिया और गंगा के पानी की ओर देखने लगा। किसी प्रकार उसकी नाव भरी और कुछ ही समय में हम लोग गंगा के उस पार पहुँच गए। उस पार भी उतना ही मटमैला जल था। हिम्मत करके जल में घुसे और संयुक्त स्नान किया- 'हर हर गंगे' का घोष किया। नहाते समय माधुरीजी ने मुझसे पूछा- 'तुम बता सकते हो कि पानी किस ओर बह रहा है ?'
'इसमें तो कोई धार नहीं है, कोई 'करेंट' नहीं, यह तो ठहरा हुआ पानी है !'
'हम गंगा जी में नहाने आए थे, ये तो तालाब निकला !'
'कोई बात नहीं, बनारस में जो भी होगा, अज़ब ही होगा, हर गंगे।' मैंने कहा।
बनारस को देखने-समझने के लिए तीन दिन बहुत कम होते हैं। उस चाय की दूकान तक पहुँचने की मेरी तमन्ना अधूरी रह गई जहाँ काशीनाथ सिंह और बनारस के अन्य साहित्यकार प्रतिदिन साहित्य-चर्चा करते हैं। मघई पान और जलेबी की मशहूर दूकानों तक भी नहीं पहुँच पाया। वहां और भी बहुत कुछ होगा जिसे मैं नहीं जानता। फिर कभी ज़रूर आऊंगा, बनारस।
बना रहे बनारस।
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