भोपाल की गपशप
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(१)
भोपाल इसके पहले कई बार जा चुका था लेकिन इस बार की बात कुछ और थी। इस लेखक को बहुत बड़े 'केनवास' पर अपनी बात कहने का अवसर मिल रहा था, लेखक से 'साहित्यकार' बनने के लिए ललचायमान हृदय को संतोष का अनुभव हो रहा था।
जब से टीवी देखना शुरू किया था, लगभग तीस वर्ष पूर्व से, तब से कई बार दिल खुद से पूछता था कि इस खिड़की से क्या कभी मैं झाकूंगा ? मेरे मित्र शिवशंकर गहलोत ने मेरी चिरप्रतीक्षित अभिलाषा को साकार कर दिया और उनके सहयोग से मैं भोपाल के दूरदर्शन केंद्र में उड़ते-लहराते पहुँच गया। दोपहर के साढ़े बारह बजे थे, शूटिंग का समय हो चुका था। कार्यक्रम संयोजक सुश्री नीलेश रघुवंशी ने मुझे एक सहायक के साथ 'मेक-अप-रूम' में भेजा।
कमरे में दो शृंगार बालाएँ, दो कुर्सियाँ, दो दर्पण थे। एक कुर्सी पर मैं अपनी आँखें बन्द करके बैठ गया। चेहरे पर 'पफ' के खुशबूदार पावडर का स्पर्श मनमोहक था। चूंकि किसी 'ब्यूटी पार्लर' में सजने-सँवरने का मेरा पूर्व-अनुभव न था, यह अल्पकालिक सुख अलौकिक लग रहा था। मैंने जब अपनी आँखें खोली तो दो मिनट के उस लीपापोती में मेरा कृष्णमुख दमकने लगा। इस प्रक्रिया में सुंदरता-प्रस्फुटन के नए रहस्य उद्घाटित हुए। मुझे उस दिन मालूम पड़ा कि सड़कों पर बिखरी हुई खूबसूरती के पीछे 'टेल्कम पावडर' का बेहद महत्वपूर्ण योगदान है।
मेकअप रूम से मैं बाहर निकला कि मेरे साक्षातकर्ता श्री सोमदत्त शास्त्री आ गए, कुछ क्षणों की मुलाक़ात के बाद वे भी ब्यूटीशियन की शरण में भेज दिए गए। सज-सँवरकर हम दोनों स्टुडियो पहुंचे। वृहदाकार हाल के कोने में स्टेज था, दो सोफा रखे हुए थे, सेंटर टेबल पर प्लास्टिक के फूल सजे हुए थे। स्टेज पर तेज रोशनी बिखरी हुई थी। तीन बड़े कैमरे अलग-अलग कोणों से घूर रहे थे। टेकनीशियन सक्रिय हो गए, किसी ने चित्र उभरने की जांच की, किसी ने हमारी आवाज की। उस समय मेरी हालत उस विवाह योग्य कन्या की तरह हो रही थी जिसे कई लड़के वाले 'रिजेक्ट' करके चले गए हों, अब कोई नया देखइया आया हो। एक टेकनीशियन ने कहा- 'रिलेक्स रहिए, आराम से टिक कर बैठिये।' थोड़ी देर की चहलपहल के बाद हमें इशारा मिला- 'स्टार्ट'।
मुझे याद आया, कई वर्ष पूर्व इलाहाबाद के एक कोचिंग सेंटर में 'साक्षात्कार की तैयारी और सामना कैसे करें ?' विषय पर आई॰ए॰एस॰ की प्रतिस्पर्धा की तैयारी कर रहे 58 युवाओं को मैंने दो-दिनी प्रशिक्षण दिया था। उन्हें बहुत से गुर बताए, समझाए और प्रायोगिक प्रशिक्षण भी दिया था लेकिन अब, जब मेरी साक्षात्कार देने की बारी आई, तब सारी चतुराई घास चरने चली गई। सबक यह मिला कि उपदेश देना सहज है लेकिन अमल करना बेहद कठिन। माफ करना मेरे इलाहाबादी दोस्तों।
मुझे बिलासपुर के एक दोस्त ने सलाह दी थी- 'प्रश्नकर्ता आपके पुराने मित्र हैं, आप फोन करके उनसे पूछ लीजिए कि वे क्या पूछेंगे ?'
'यह तो गलत बात है.' मैंने प्रतिवाद किया.
'क्या गलत है ? यह तो प्रबन्धन है, सब करते हैं.'
'सब ?'
'हाँ, प्रधानमंत्री तक 'होमवर्क' करते हैं.'
'मैं नहीं मानता.'
'अखबारों और पत्रिकाओं में यह ज़ाहिर हो चुका है कि उनकी टीम प्रश्नों का चुनाव करती है, फिर उसके उत्तर तैयार करके उन्हें बताए जाते हैं.'
'मैं नहीं मानता.'
'मत मानो लेकिन इस तरह 'होमवर्क' कर लेने में आपका नुकसान क्या है ?'
'यह तो 'पेपर आउट' जैसा हो गया ?'
'हाँ, वही समझा रहा हूँ आपको. दर्शक को क्या पता चलेगा कि आपने पूर्व तैयारी कर ली है, वे तो आपका 'प्रेजेंटेशन' देखेंगे. आपको मौके की नजाकत देखनी चाहिए और हर जगह अपनी जिद चस्पा नहीं करनी चाहिए.' मित्र ने मुझे समझाया, उसने मेरे भले की बात बताई लेकिन मैं ठहरा अड़ियल घोडा, अड़ गया सो अड़ गया.
साक्षात्कार के पश्चात दूरदर्शन की अधिकारी ने पंद्रह सौ रुपए की प्राप्ति के कागज पर हस्ताक्षर करवाए, अच्छा लगा और अच्छा नहीं भी लगा। अच्छा इसलिए लगा क्योंकि मुझे मालूम न था कि इसके पैसे मिलते हैं। अच्छा इसलिए नहीं लगा क्योंकि पंद्रह सौ मिले जबकि मेरा यात्राव्यय सोलह सौ रुपए हो चुका था! सोलह सौ मिल जाता तो मुझ बनिया की आत्मा को शांति मिलती। खैर, सौ रुपये का नुकसान सही, मेरी शक्ल तो टीवी की स्क्रीन पर दिखेगी, उसे देखकर दिल को समझाऊँगा।
(२)
भोपाल में मेरे साढ़ू रहते हैं, डा॰ के॰के॰अग्रवाल, नाक-कान-गला रोग विशेषज्ञ हैं। उन्होंने मुझे बताया कि उनके कोई मित्र दूरदर्शन में थे जिन्होंने उन्हें भी कई बार दूरदर्शन में चिकित्सकीय चर्चा के लिए आमंत्रित किया लेकिन वे नहीं गए। मैंने पूछा- 'क्यों नहीं गए ?'
'ये सब बेवकूफ़ी मुझे पसंद नहीं।' वे बोले। मेरी जान सूख गई कि मैं कैसी बेवकूफी में फंस गया, बिलासपुर से
रात भर की यात्रा करते हुए भोपाल आया और वापस जाऊंगा। कुछ देर में याद आया कि लोग शादी को भी बेवकूफी कहते हैं; कहते रहें, मैंने तो शादी भी की और दूरदर्शन में चर्चा भी। मुझे दोनों मन भाए।
डा॰ अग्रवाल का घर का नाम है, बुगदर। बुगदर का अर्थ मैं नहीं जानता लेकिन पुराने जमाने में ऐसे ही रोचक नाम बच्चों के रखे जाते थे। जैसे मेरे बड़े भाई साहब का नाम था- 'धुन्नर'। मुझे बचपन में पड़ोसिन चाचियाँ 'बब्बू' कहकर पुकारती थी। मेरी युवावस्था में एक कन्या-मित्र मुझे 'दिवी' कहकर पुकारती थी। 'द्वारिका'- मोटे-फटे बांस जैसे नाम की तुलना में 'दिवी' जैसा नाम मेरे हृदय में बांसुरी जैसी ध्वनि उत्पन्न करता था।
डा॰ के॰के॰अग्रवाल केवल डाक्टर नहीं हैं, गज़ब के फोटोग्राफर हैं, पुराने फिल्मी गानों के रसिया हैं और प्रचंड पढ़ाकू। उनकी आलमारी किताबों से भरी पड़ी है। मैंने उनके संग्रह में विविध विषयी पुस्तकें देखी, हिन्दी और अंग्रेजी- दोनों भाषाओं की। गीत और गज़लों की पुस्तकें, आडियो टेप, प्लेइंग रेकार्ड का अनूठा संग्रह है उनके पास। हरिवंशराय बच्चन के गीतों की पुस्तकों के 1944 और 1946 में प्रकाशित प्राचीन संस्करण उनके पास हैं जिनकी कीमत उस समय थी- डेढ़ रुपया याने एक रुपया आठ आने।
(३)
भोपाल में तीन लोगों की बहुत याद आती है, शकीला बानो भोपाली, कैफ भोपाली और मंसूर अली खाँ पटौदी। इनके अतीत की यादों को अपनी आँखों से देखने की हसरत पूरी न हो सकी क्योंकि मेरे पास समय कम था, मैं केवल तीस घंटे तक ही भोपाल में रुका।
सुश्री निशा शुक्ला भोपाल के पासपोर्ट सेवा केंद्र में अधिकारी हैं। ग्वालियर की रहने वाली हैं, ससुराल भोपाल में है, पतिदेव वकालत करते हैं। पासपोर्ट सेवा केंद्र खचाखच भरा हुआ था, भीड़ को देखकर ऐसा लग रहा था कि सब के सब भारत छोडने के लिए बहुत व्याकुल हैं। निशाजी मेरी फेसबुक मित्र हैं. जब मैं उनसे मिलने पहुंचा, वे बहुत व्यस्त थी, फिर भी, वे घर-परिवार की बातें और अपने जीवन संघर्ष की कहानियाँ बताती रही। दस मिनट की वह छोटी सी मुलाक़ात यादगार बन गई।
मैंने प्रख्यात व्यंग्य लेखक डा॰ ज्ञान चतुर्वेदी को फोन लगाया और मिलने का समय मांगा। वे व्यस्त चिकित्सक हैं, भेषज विशेषज्ञ हैं तथापि उन्होंने मुझसे मिलने की उत्सुकता दिखाई और 11 बजे का समय मिल गया, पाँच मिनट का ! शहर से दस किलोमीटर दूर नोबल हास्पिटल में डा॰ ज्ञान चतुर्वेदी मरीजों में व्यस्त थे, मुझे देखकर उन्होंने चिकित्सकीय कार्य स्थगित किया और साहित्यिक वार्तालाप में लग गए। मैं उनके लेखन से लगभग बीस वर्ष पूर्व प्रभावित हुआ था जब मैंने उनके प्रथम उपन्यास 'नरक यात्रा' का सुख भोगा था। किसी अन्य व्यंग्य लेखक से उनकी तुलना करना न्यायोचित नहीं होगा लेकिन 'नरक यात्रा' को पढ़कर मुझे ऐसा लगा था कि हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ल जैसे व्यंग्य-लेखकों की अधूरी तपस्या को पूरी करने के लिए एक समर्थ व्यंग्य-ऋषि का हिन्दी जगत में आविर्भाव हो गया है।
डा॰ज्ञान चतुर्वेदी से मिलने का अवसर भले ही छोटा सा बना लेकिन वह छोटी सी मुलाक़ात यादगार बन गई। पहले-पहल किसी से मिलो और उससे मिलकर ऐसा लगे जैसे जान-पहचान पुरानी है तो ज़रूर कोई बात होगी उस इंसान में। सन 1995 में मैंने उनकी प्रथम कृति 'नरक यात्रा' पढ़ी थी, तब से मैं उनकी लेखन शैली का आशिक बन गया। उपन्यास 'नरक यात्रा' का आरंभ उन्होंने इन शब्दों से किया है : "इस मेडिकल कालेज अस्पताल में सुबह इसी तरह बीमारों की भांति दाखिल होती है। अस्पताल के बरामदे से देखो तो सुबह मानो मेडिकल की किताब का एक चैप्टर-सा खुल गया लगता है। सूरज मानो पका हुआ लाल फोड़ा, धूप जैसे गाढ़ी मवाद, हवा मानो कृत्रिम श्वास और उसमें हिलते वृक्ष मानो बड़े डाक्टर की गलत डायग्नोसिस पर सिर हिलाते जूनियर डाक्टर। न कलरव करते पक्षी, न बादे-सबा, न सूर्योदय का वह उदत्त अनुभव; बस कूलती, कराहती सी सुबह। रात का ही एक्सटेंशन सा। मेडिकल कालेज की एक ऐसी ही सुबह से हमारी कथा शुरू होती है। बात मुरदों से शुरू करने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ पर अस्पताल ऐसी शै है कि मुर्दे के ज़िक्र के बिना 'अस्पताल' नाम अधूरा-सा लगता है। मुझे तो यह हमेशा मुर्दे के कई पर्यायवाची शब्दों में से एक लगा।"
किसी नाटक के सुविज्ञ सूत्रधार की तरह डा॰ज्ञान चतुर्वेदी उपन्यास के कथासागर को अपनी एक अंजुरी में भरकर कहानी सुनाने के पहले ही चखा देते हैं, शेष उपन्यास तो इन शब्द-मंत्रों की व्याख्या मात्र है।
मैंने उनसे चर्चा शुरू की- 'आपका उपन्यास 'हम न मरब' मैंने हाल में ही पढ़ा है, 'एक मनुष्य मरने वाला है और वह मर गया' के बीच बीते समय की कथा आपने बहुत अच्छी लिखी है, ये पात्र आपको कहाँ से मिलते हैं ?'
'यहीं, अस्पताल में। कोई मरीज बन कर आता है, कोई मरीज के साथ आता है।' डा॰ज्ञान चतुर्वेदी ने बताया।
'और वह गों-गों करती लकवाग्रस्त बूढ़ी औरत ?'
'वह मेरी माँ की अनुकृति थी। माँ अनेक वर्षों तक लकवे से पीड़ित रही, मैंने उनकी मनोदशा और व्यथा को उस कहानी में पिरोया है।'
'ऐसा लगता है कि सभी पात्र आपके परिचित हैं।'
'कुछ काल्पनिक भी हैं।'
'अपशब्दों का प्रयोग ज़्यादा नहीं लगा आपको ?'
'हाँ, इस बात पर बहस भी बहुत चली हुई है। लिखने के बाद मुझे भी ऐसा लगा कि गालियां अधिक हो रही हैं। पुस्तक के छपने के पहले संशोधन के लिए बहुत मेहनत की गई। लंबे समय तक मैं और मेरे सहयोगी जूझते रहे। अनेक अपशब्दों को हटाकर जब मैंने कथा पढ़ी तो वह कहानी निर्वस्त्र जैसी लगी, अशोभित।'
'मैं समझा नहीं।'
'बुन्देलखंड में, जहाँ की पृष्ठभूमि पर यह उपन्यास लिखा गया है, वहाँ वाक्यों के साथ गालियों को जोड़ना उनका सहज स्वभाव है। उन गालियों को गालियां मानना गलत है, वह उनकी व्यंजना है, विशेषण है, बोलचाल का सांस्कृतिक तरीका है।'
'इसका अर्थ यह हुआ कि अपशब्दों का प्रयोग उनकी भाषा का सौन्दर्य है ?'
'हाँ, यदि एक पिता अपने पुत्र को बहन की गाली देता है तो उसका आशय उसकी बहन से नहीं होता। वहाँ बात करने की शैली और उनका बोलने का अभ्यास वैसा ही है।'
'आपने उपन्यास 'हम न मरब' का अन्त चौंकाने वाला कर दिया, बांग्ला कथाकार बिमल मित्र की शैली में ?' मैंने पूछा।
'कथा के अन्त को लेकर बहुत माथापच्ची हुई। मेरे मित्र प्रभु जोशी और मैं अनेक विकल्पों पर बहस करते रहे। अंततः हम दोनों इसी अन्त पर सहमत हुए। अम्मा अपने स्थगित जीवन और स्थगित मृत्यु से जूझते हुए थक चुकी है। अम्मा के जीवन में कुछ बचा नहीं था, मौत भी नहीं आ रही थी। वे जीने को तरस गई, अब मरने के लिए तरस रही हैं। उन्हें लगा कि उनके प्राण लेने यदि यमदूत आए भी तो अंधेरे में उन्हें ढूंढ न पाएंगे इसलिए वे बब्बा के कमरे पर अपना हक़ जताती है क्योंकि उस कमरे में रोशनी है। वे अपने लिए नहीं, यमदूत की सुविधा के लिए कमरा चाहती हैं, ताकि यमदूत उनके प्राण लिए बिना खाली हाथ लौट न जाए।'
'क्या बुढ़ापा इतना दुखदाई होता है ?'
'उसी दुख की कथा है, हम न मरब।' डा॰ज्ञान ने बताया।
उनकी बात पूरी होते ही मैंने उठने का उपक्रम किया और कहा- 'आपके मरीज बैठे हैं, आप उन्हें देखिए।'
'आउटडोर पेशेंट' देखे जा चुके, अभी एक 'इको' करना है, आप बैठिए, चाय पीकर जाइयेगा।' वे बोले। उन्होंने 'टेक्नीशियन' को फोन किया- 'पेशेंट को इको के लिए तैयार करो, मैं पाँच मिनट में आ रहा हूँ।' एक और फोन किया- 'जल्दी तीन चाय भेजो।'
फोन करने के बाद मेरी आत्मकथा 'कहाँ शुरू कहाँ खत्म' और 'पल पल ये पल' को देखते हुए मुझसे आश्चर्य मिश्रित भाव में प्रश्न किया- 'आपने इस उम्र में लिखना शुरू किया ?'
'ऐसा नहीं है, मैंने 21 वर्ष की उम्र में लिखना शुरू किया था, 'धर्मयुग' और 'दिनमान' में लेख छपे। उसके बाद पारिवारिक व्यापार से जुड़ गया और लिखना छूट गया। संयुक्त परिवार के दलदल से मुक्त होने के बाद बहुत सारा समय अतीत में चिपका कीचड़ साफ करने में लग गया। अब मुक्त हो गया हूँ।'
'आत्मकथा लिखने की क्यों सूझी ?'
'सन 2004 में हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा पढ़ने के बाद मुझे इसे लिखने की प्रेरणा मिली।'
'यह तो बच्चन जी के लेखन की सफलता है कि उनकी आत्मकथा ने आपको इसे लिखने के लिए प्रेरित किया।'
'जी, वे 'सेलिब्रिटी' थे, जबकि मैं एक असफल व्यक्ति। असफल लोगों की भी कहानी होती है, मैंने अपनी असफलता को इस कथा में उकेरा है।'
'असफलता का मुख्य कारण ?'
'संयुक्त परिवार की व्यवस्था। यह आत्मकथा संयुक्त परिवार की प्रचलित अवधारणा के विरुद्ध मेरा दस्तावेजी विद्रोह है। मैं अगली पीढ़ी को इसकी विसंगतियों से आगाह करना चाहता हूँ।' मैंने बताया।
इतने में चाय आ गई। मैंने उनसे साथ में 'फोटो' खिंचवाने का आग्रह किया तो वे उठे, गले से अपना 'स्टेथो' और 'फेस मास्क' यह कहते हुए अलग किया- 'इस डाक्टरी रूप में नहीं, साहित्यकार जैसी वेषभूषा में आपके साथ 'फोटो' होगी।' हम दोनों दीवार से सटकर खड़े हो गए और मेरे दामाद राजेश खंडेलवाल ने मोबाइल क्लिक कर उस यादगार पल को सुरक्षित कर लिया।
(४)
भोपाल से लगभग 25 किलोमीटर दूर भोजपुर में एक दर्शनीय भव्य मंदिर है जिसमें शिवलिंग स्थापित है। इस अनूठे और अपूर्ण मंदिर का निर्माण परमारवंशीय राजा भोजदेव प्रथम (ईस्वी 1010-1055) द्वारा किया गया था। पश्चिमाभिमुखी इस शिव मंदिर के गर्भ गृह में विशालकाय शिवलिंग स्थापित है। उसका गौरीपीठ 18 फीट से भी अधिक बड़ा है।
मंदिर के गर्भगृह का द्वार पत्रसज्जा तथा कुबेर शैव द्वारपाल, परिचारिकाओं तथा गंगा-यमुना की मूर्तियों से अलंकृत है। पत्थर की नक्कासी की अद्भुत है, देखने और प्रशंसा करने योग्य है। मंदिर के पूर्व और उत्तर में चट्टानी सतहों पर विभिन्न मंदिर शैलियों के भू-विन्यास, ऊर्ध्व-विन्यास, स्तम्भ, उपरिभाग, शिखर तथा शीर्षकों के उत्कीर्ण रेखांकन यह बताते हैं कि इस स्थान पर और भी मंदिरों के निर्माण की योजना थी लेकिन उसे क्रियान्वित नहीं किया जा सका।
मंदिर में निर्मित पाषाण लिंग विशालकाय है किन्तु अधूरा है इसलिए उसकी कोई भी पूजा नहीं की जाती। लोग केवल फूल और नारियल चढ़ाते हैं। मंदिर में न दिए जलाए जाते और न ही नारियल फोड़े जाते ! आखिर क्यों ?
सद्गुरु जग्गी वासुदेव, जिन्होंने कोयंबत्तुर के वेलियंगिरी पर्वत की तलहटी पर 'ध्यान लिंग' की स्थापना की है, उन्होंने भोजपुर के मंदिर के विषय में कुछ ऐसे तथ्य बताए हैं जो कौतूहल उत्पन्न करते हैं।
सद्गुरु जग्गी वासुदेव के अनुसार - 'एक हजार साल के पहले की बात है, भोजपुर में 'ध्यान लिंग' को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया गया था। यह पूरा होने के कगार पर था लेकिन अंततः असफल रहा। मंदिर बनाने का काम बहुत कुछ पूरा हो गया था लेकिन फिर उसे छोड़ दिया गया। यहाँ तक कि प्रतिष्ठा का काम भी नब्बे प्रतिशत हो चुका था। एक विशिष्ट योगी, जो एक सिद्ध प्राणी थे, ने चौदह लोगों को तैयार किया था। इड़ा और पिंगला को प्रस्तुत करने के लिए सात पुरुषों और सात स्त्रियों को तैयार किया गया। उन्होंने कई वर्षों तक उन लोगों के साथ काम किया और उन्हें ऊर्जा के एक खास स्तर तक लाया गया। उन्हें तात्कालीन राजा का सहयोग प्राप्त था जिसने आभूषण के रूप में ध्यानलिंग के लिए एक सुंदर मंदिर बनवाया। यह अभी भी अधूरा है और बहुत सुंदर ढांचे वाला है।
स्थानीय लोकचर्चा के अनुसार ऐसा लगता है कि उस योगी ने प्रतिष्ठा का अंतिम चरण संध्याकाल में आरंभ किया जिसे प्रातः होने के पूर्व संपन्न कर लेना था लेकिन प्रातः तक प्रक्रिया पूरी नहीं हुई क्योंकि जब प्रतिष्ठा पूरी होने के समीप थी, उनमें से एक औरत जो उस प्रतिष्ठा प्रक्रिया में सम्मिलित थी, ने अपना शरीर छोड़ दिया और प्रक्रिया संकट में पड़ गई। उस स्त्री के शरीर छोड़ने के बाद योगी ने अपनी इड़ा और पिंगला का इस्तेमाल करके परूष और स्त्री दोनों की भूमिका निभाने का निर्णय लिया। इससे प्रणाली के ऊपर बहुत अधिक दबाव पड़ता है फिर भी उसने यह कार्य आरंभ किया। थोड़ा सा कार्य बचा था कि उसी समय कोई आक्रमण सा हुआ और योगी का बायाँ पैर कट गया। जैसे ही बायाँ पैर कटा, इड़ा ने काम करना बंद कर दिया, केवल पिंगला काम कर सकती थी इसलिए अब वह दोहरी भूमिका नहीं निभाने योग्य नहीं रह गया, पूरी प्रक्रिया पुनः अटक गई। तब योगी ने यह निर्णय लिया कि वह और एक दूसरी औरत अपना शरीर त्यागकर लिंग में विलय कर जाएंगे और प्रतिष्ठा पूर्ण करेंगे। चूंकि वे जीवित नहीं रहेंगे इसलिए उन्होंने एक अन्य योगी को प्रशिक्षित किया ताकि ऊर्जाकरण की प्रक्रिया पूर्ण हो जाने पर वह नव-प्रशिक्षित योगी समस्त ऊर्जाओं को बंद कर सके। प्रतिष्ठा प्रक्रिया में दो पहलू निहित होते हैं, पहला कि उसे ऊर्जा के चरम तक ले जाना और दूसरा उसे बंद करना। उसके पश्चात वे दोनों लोग विलय कर गए। लिंग की ऊर्जाकरण की प्रक्रिया पूर्ण हो गई लेकिन दूसरा नवप्रशिक्षित योगी उसे बंद न कर सका। स्थिति अति प्रबल थी, हिला देने वाली थी। गुरु ने अपना शरीर छोड़ दिया और योगी सब देखता बैठा रह गया। उसे उस प्रक्रिया को उचित ढंग से करना चाहिए था लेकिन उस समय स्थिति अति प्रबल थी, वह उस क्रिया को न कर सका। तुरंत लिंग में एक लम्बवत चार इंच की दरार पड़ गई। सम्पूर्ण योजना ध्वस्त हो गई। आकृति 95% पूरी हो चुकी थी किन्तु आज यह दुखद आकृति है। दो लोगों ने ध्यान लिंग की प्रतिष्ठा के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी। उन लोगों ने उस प्रक्रिया पर बहुत सारा काम किया लेकिन उसे पूरा नहीं किया जा सका। लिंग उसी तरह से स्थापित है, बहुत शक्तिशाली है किन्तु थोड़ा सा विकृत। ऊर्जा का क्षय नहीं हो रहा है। अगर इसकी मंत्र प्रतिष्ठा पूर्ण हो गई होती तो अब तक उसका क्षय हो चुका होता। एक हजार वर्ष बहुत अधिक समय होता है लेकिन इसका क्षय नहीं हुआ। लिंग अभी भी वहाँ खड़ा है- अधूरा, टूटा हुआ। वह लगभग पूरा होने को था, नहीं हो पाया लेकिन वह मृत नहीं है। वह अभी भी जीवित है। अगर मृत हो जाता तो वह सिर्फ एक पत्थर बन कर रह जाता लेकिन वह जीवित है, विकृत अवस्था में है।'
भोपाल में और भी बहुत कुछ है। यहाँ बार-बार आना पड़ेगा। विदा भोपाल।
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