मंडला में मन डोला :
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हिन्दू मान्यता के अनुसार चार युगों में एक त्रेता युग है। यह मानवकाल का द्वितीय युग था जिसमें भगवान विष्णु के पांचवें, छठवें और सातवें अवतार क्रमशः वामन, परशुराम और राम के रूप में प्रगट हुए। त्रेता युग 12,96,000 वर्ष का था। इसी युग में महर्षि बाल्मीकि ने अपनी अंतर्दृष्टि से राम जन्म से लेकर रावण वध तक की घटनाओं को घटने के पूर्व ही देख लिया था और रामायण महाकाव्य की रचना की। बाल्मीकि के पिता का नाम वरुण और माँ का नाम चार्ष्णी था। वे अपने माता-पिता की दसवीं संतान थे। महर्षि बाल्मीकि राम के समकालीन थे।
रामकथा के अनुसार जब लोकनिन्दा के डर से राम ने अपनी गर्भवती पत्नी सीता को त्याग दिया तो लक्ष्मण उन्हें तमसा नदी के किनारे छोड़ आए। जब यह सूचना वाल्मीकि तक पहुंची तो वे स्वयं नदी के तट पर पहुंचे। दुख से विकल सीता को देखकर उनका पितृत्व जागा और उन्होंने वात्सल्य से सीता के सिर पर हाथ फेर कर आश्वासन दिया कि वह पुत्रीवत् उनके आश्रम में रहे। सीता उनके साथ आश्रम पहुंची और वहाँ रहने लगी। समय आने पर सीता ने राम के दो पु़त्रों लव और कुश को जन्म दिया। इन्हें वाल्मीकि ने शिक्षा प्रदान की और उन्हें न केवल शस्त्र और शास्त्र विद्याओं में निपुण बनाया बल्कि राम-रावण युद्ध और बाद में सीता के साथ अयोध्या वापसी, सीता के वनवास और उनके जन्म तक पूरी रामायण कंठस्थ करा दी। इतना ही नहीं, उन्होंने सीता के आश्रम आगमन के बाद रामायण को और आगे लिखना शुरू कर दिया जिसे उत्तरकाण्ड नाम दिया।
भारतवर्ष का प्रत्येक हिन्दू रामायण को प्रमाणिक और सत्य पर आधारित कथा और उसके नायक राम को पूजनीय श्रद्धा से मानता है, अपने ह्रदय-मंदिर में संजो कर रखता है। गोस्वामी तुलसीदास के ग्रन्थ रामचरितमानस ने बाल्मीकि रामायण को जन-मन में इस तरलता से प्रविष्ट किया कि वह भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय और विश्वसनीय ग्रन्थ बन गया। इस अद्भुत रामकथा को प्रमाणिक सिद्ध करने के प्रतीक पूरे देश में बिखरे हुए हैं, यहाँ तक कि श्री लंका में भी। ये प्रतीक सामान्यतया मंदिरों के रूप में हैं और सबके अपने-अपने मज़बूत तर्क हैं जो धार्मिक आस्था के समक्ष नतमस्तक हैं।
ग्रन्थों में उल्लेखित संदर्भ बताते हैं कि महर्षि बाल्मीकि का आश्रम गंगा नदी के निकट बहने वाली तमसा नदी के किनारे था लेकिन मंडला में यह जानकारी मिली कि महर्षि बाल्मीकि का आश्रम मंडला से 20 किलोमीटर दूर मटियारी और सुरपन नदी के संगम पर स्थित सीतारपटन में था। यह स्थान प्रसिद्ध अभयारण्य कान्हा से 5 किलोमीटर दक्षिण में है। सीतारपटन से 7 किलोमीटर दक्षिण में स्थित मधुपुरी में राम के अश्वमेध यज्ञ के अश्व को लव और कुश ने बांध लिया था जहां उनका और राम की सेना के साथ भीषण युद्ध हुआ था।
हर शहर का इतिहास होता है लेकिन यदि किसी स्थान का इतिहास त्रेता युग से ज्ञात हो तो अचंभा होता है। जहाँ ऐतिहासिक प्रमाण नहीं होते, वहां किवदंतियां अपने पग स्थापित कर लेती हैं, जैसी कि मुझे मंडला में सुनने को मिली।
मंडला मध्य प्रदेश में सतपुड़ा पहाड़ियों में स्थित एक जिला है। यहाँ की लगभग 60% आबादी गोंड जनजाति की है। यह शहर नर्मदा नदी से तीन ओर से घिरा हुआ है। नर्मदा की सहायक बंजार नदी की घाटी में जिले का सबसे अधिक उपजाऊ भाग पड़ता है, जिसे 'हवेली' कहा जाता है। हवेली के दक्षिण में बंजार की घाटी जंगलों से आच्छादित है। इन जंगलों में साल, बाँस, टीक और हरड़ के वृक्ष पाये जाते हैं। नदियों के आसपास धान, गेहूँ और तिलहन की उपज होती है। यहाँ के निवासी पशुपालन, लाख के उत्पादन, पान उगाने, चटाई और रस्सियों का निर्माण करने में प्रवीण हैं। यहाँ पर मैगनीज और धातु की अनेक समृद्ध खदानें हैं।
रानी दुर्गावती की वीरता के किस्से कौन नहीं जानता? मुगल बादशाह अकबर की 32,000 सैनिकों की सुसज्जित सेना से भिड़ने वाली रानी दुर्गावती ने सिर्फ 500 सैनिकों के बल पर युद्ध किया और तीर-कमान के भीषण आक्रमण से युद्ध का पहला दिन जीता था। यह बात 24 जून 1564 की है। उसके बाद आसफ खाँ के नेतृत्व में जब तोपखाना युद्धक्षेत्र में आ पहुंचा तब तोप के आक्रमण से रानी दुर्गावती की सेना छिन्न-भिन्न हो गई। रानी दुर्गावती आँख में एक तीर लग गया और दूसरा कनपटी में, फिर भी रक्त बहता रहा और वह युद्ध करती रही। रानी दुर्गावती की सेना अंततः तीसरे दिन हार गई और रानी दुर्गावती ने मुग़लों के हाथ जाने से स्वयं को बचाने के लिए अपने सीने में कटार घोंपकर आत्मबलिदान कर दिया।
'काली को रूप बनाये के, दुर्गा झपटत जाय
रकत लोहू के नदिया हो, तुरते दइस है बहाय
जीत के डंका बजाय के, माता मन मुसकाय
अड़े रहो सब मग में हो, या सबै ला सिखाय।
नाम आसफ दुश्मन के, गईस धरी-धरी हार
सजधज के आवै तिसरइया, फौजी धरे हथियार
ताक निशाना महारानी के हो, नहीं कोई उपचार
जखमी चोट लगी तन मां, बहे रकतन के धार।
जो फिरंगी माया मां, मोरे नहिं आवै आँच
नारी के तन आय बचाहू, ये हबै मोला साँच
क़हत-क़हत माता गिरगै, पावै गति निर्वान
अमरित चोला ला करके, हो परलौके सिधार।'
राजा संग्रामसाहि के राज्य गढ़ामंडला में 52 गढ़ थे। उनका साम्राज्य भोपाल से सम्बलपुर और उत्तर पन्ना से चांदा तक फैला हुआ था। मंडला से 20 किलोमीटर दूर रामनगर में गढ़ा मंडला की राजधानी थी। संग्रामसाहि राजाओं की वंशावली में 48वे राजा थे। उनके बाद दलपतसाहि गढ़ामंडला के राजा बने जिनका विवाह सन 1540 में कलिंजर के राजा कीरतसिंह की पुत्री दुर्गावती से हुआ। विवाह के सात वर्ष बाद सन 1547 में जब दलपतसाहि की मृत्यु हुई तब उनका एक मात्र पुत्र वीरनारायन केवल तीन वर्ष का था। बालक वीरनारायन के राज्याभिषेक के बाद शासन व्यवस्था का कार्य उसकी माँ दुर्गावती ने संभाला। दुर्गावती अत्यंत सुंदर और राजकाज में दक्ष थी। उसने 16 वर्षों के कार्यकाल में अपने राज्य में सिंचाई और जलसंरक्षण के लिए व्यापक पैमाने पर कार्य किए इसलिए वह बहुत लोकप्रिय थी।
मंडला की धरती आज भी रानी दुर्गावती के शौर्य और शासन प्रबंधन के गीत गाती है। जनश्रुति है कि नर्रई नाले के आसपास रात्रि के अंधकार में नगाड़ों की आवाज़, हाथियों की चिंघाड़ और घोड़ों की टाप अब भी साफ-साफ सुनाई पड़ती है। वहाँ युद्ध में शहीद हुए वीरों की माताओं, पत्नियों और बच्चों का रुदन भी सुनाई पड़ता है। शौर्य की प्रतीक रानी दुर्गावती की यशोगाथा आज भी वहाँ के लोकगीतों के रूप में गुंजायमान हैं।
'चलो चली गढ़ा मां, मितवा करबो तन निसार
माता दुर्गा रन चंडी के, लेवी चरन पखार
हाथ ज़ोर बिनती करें, जय जय होवे तुम्हार
अमर रहे माता प्रिथिवी में, जस रहे रे तुम्हार।'
मंडला की सबसे बड़ी खूबसूरती नर्मदा नदी है जिसे वहाँ के निवासी 'नर्बदा मैया' कहकर सम्मान से पुकारते हैं। लंबा-चौड़ा पाट, चांदी की तरह चमचमाती जलधारा और मदमस्त पवन की तरह बहती नर्मदा नदी सहज ही मन मोह लेती है। पर्यावरण प्रेमी अमृतलाल वेगड़ अपने यात्रा वृतांत "सौन्दर्य की नदी नर्मदा" में लिखते हैं, 'नर्मदा सौन्दर्य की नदी है. यह वनों, पहाड़ों और घाटियों में से बहती है. यह चलती है इतराती, बलखाती, वन-प्रांतरों में लुकती-छिपती, चट्टानों को तरासती, डग-डग पर सौन्दर्य की सृष्टि करती, पग-पग पर सुषमा बिखेरती है!
हिन्दू मान्यता के अनुसार चार युगों में एक त्रेता युग है। यह मानवकाल का द्वितीय युग था जिसमें भगवान विष्णु के पांचवें, छठवें और सातवें अवतार क्रमशः वामन, परशुराम और राम के रूप में प्रगट हुए। त्रेता युग 12,96,000 वर्ष का था। इसी युग में महर्षि बाल्मीकि ने अपनी अंतर्दृष्टि से राम जन्म से लेकर रावण वध तक की घटनाओं को घटने के पूर्व ही देख लिया था और रामायण महाकाव्य की रचना की। बाल्मीकि के पिता का नाम वरुण और माँ का नाम चार्ष्णी था। वे अपने माता-पिता की दसवीं संतान थे। महर्षि बाल्मीकि राम के समकालीन थे।
रामकथा के अनुसार जब लोकनिन्दा के डर से राम ने अपनी गर्भवती पत्नी सीता को त्याग दिया तो लक्ष्मण उन्हें तमसा नदी के किनारे छोड़ आए। जब यह सूचना वाल्मीकि तक पहुंची तो वे स्वयं नदी के तट पर पहुंचे। दुख से विकल सीता को देखकर उनका पितृत्व जागा और उन्होंने वात्सल्य से सीता के सिर पर हाथ फेर कर आश्वासन दिया कि वह पुत्रीवत् उनके आश्रम में रहे। सीता उनके साथ आश्रम पहुंची और वहाँ रहने लगी। समय आने पर सीता ने राम के दो पु़त्रों लव और कुश को जन्म दिया। इन्हें वाल्मीकि ने शिक्षा प्रदान की और उन्हें न केवल शस्त्र और शास्त्र विद्याओं में निपुण बनाया बल्कि राम-रावण युद्ध और बाद में सीता के साथ अयोध्या वापसी, सीता के वनवास और उनके जन्म तक पूरी रामायण कंठस्थ करा दी। इतना ही नहीं, उन्होंने सीता के आश्रम आगमन के बाद रामायण को और आगे लिखना शुरू कर दिया जिसे उत्तरकाण्ड नाम दिया।
भारतवर्ष का प्रत्येक हिन्दू रामायण को प्रमाणिक और सत्य पर आधारित कथा और उसके नायक राम को पूजनीय श्रद्धा से मानता है, अपने ह्रदय-मंदिर में संजो कर रखता है। गोस्वामी तुलसीदास के ग्रन्थ रामचरितमानस ने बाल्मीकि रामायण को जन-मन में इस तरलता से प्रविष्ट किया कि वह भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय और विश्वसनीय ग्रन्थ बन गया। इस अद्भुत रामकथा को प्रमाणिक सिद्ध करने के प्रतीक पूरे देश में बिखरे हुए हैं, यहाँ तक कि श्री लंका में भी। ये प्रतीक सामान्यतया मंदिरों के रूप में हैं और सबके अपने-अपने मज़बूत तर्क हैं जो धार्मिक आस्था के समक्ष नतमस्तक हैं।
ग्रन्थों में उल्लेखित संदर्भ बताते हैं कि महर्षि बाल्मीकि का आश्रम गंगा नदी के निकट बहने वाली तमसा नदी के किनारे था लेकिन मंडला में यह जानकारी मिली कि महर्षि बाल्मीकि का आश्रम मंडला से 20 किलोमीटर दूर मटियारी और सुरपन नदी के संगम पर स्थित सीतारपटन में था। यह स्थान प्रसिद्ध अभयारण्य कान्हा से 5 किलोमीटर दक्षिण में है। सीतारपटन से 7 किलोमीटर दक्षिण में स्थित मधुपुरी में राम के अश्वमेध यज्ञ के अश्व को लव और कुश ने बांध लिया था जहां उनका और राम की सेना के साथ भीषण युद्ध हुआ था।
हर शहर का इतिहास होता है लेकिन यदि किसी स्थान का इतिहास त्रेता युग से ज्ञात हो तो अचंभा होता है। जहाँ ऐतिहासिक प्रमाण नहीं होते, वहां किवदंतियां अपने पग स्थापित कर लेती हैं, जैसी कि मुझे मंडला में सुनने को मिली।
मंडला मध्य प्रदेश में सतपुड़ा पहाड़ियों में स्थित एक जिला है। यहाँ की लगभग 60% आबादी गोंड जनजाति की है। यह शहर नर्मदा नदी से तीन ओर से घिरा हुआ है। नर्मदा की सहायक बंजार नदी की घाटी में जिले का सबसे अधिक उपजाऊ भाग पड़ता है, जिसे 'हवेली' कहा जाता है। हवेली के दक्षिण में बंजार की घाटी जंगलों से आच्छादित है। इन जंगलों में साल, बाँस, टीक और हरड़ के वृक्ष पाये जाते हैं। नदियों के आसपास धान, गेहूँ और तिलहन की उपज होती है। यहाँ के निवासी पशुपालन, लाख के उत्पादन, पान उगाने, चटाई और रस्सियों का निर्माण करने में प्रवीण हैं। यहाँ पर मैगनीज और धातु की अनेक समृद्ध खदानें हैं।
रानी दुर्गावती की वीरता के किस्से कौन नहीं जानता? मुगल बादशाह अकबर की 32,000 सैनिकों की सुसज्जित सेना से भिड़ने वाली रानी दुर्गावती ने सिर्फ 500 सैनिकों के बल पर युद्ध किया और तीर-कमान के भीषण आक्रमण से युद्ध का पहला दिन जीता था। यह बात 24 जून 1564 की है। उसके बाद आसफ खाँ के नेतृत्व में जब तोपखाना युद्धक्षेत्र में आ पहुंचा तब तोप के आक्रमण से रानी दुर्गावती की सेना छिन्न-भिन्न हो गई। रानी दुर्गावती आँख में एक तीर लग गया और दूसरा कनपटी में, फिर भी रक्त बहता रहा और वह युद्ध करती रही। रानी दुर्गावती की सेना अंततः तीसरे दिन हार गई और रानी दुर्गावती ने मुग़लों के हाथ जाने से स्वयं को बचाने के लिए अपने सीने में कटार घोंपकर आत्मबलिदान कर दिया।
'काली को रूप बनाये के, दुर्गा झपटत जाय
रकत लोहू के नदिया हो, तुरते दइस है बहाय
जीत के डंका बजाय के, माता मन मुसकाय
अड़े रहो सब मग में हो, या सबै ला सिखाय।
नाम आसफ दुश्मन के, गईस धरी-धरी हार
सजधज के आवै तिसरइया, फौजी धरे हथियार
ताक निशाना महारानी के हो, नहीं कोई उपचार
जखमी चोट लगी तन मां, बहे रकतन के धार।
जो फिरंगी माया मां, मोरे नहिं आवै आँच
नारी के तन आय बचाहू, ये हबै मोला साँच
क़हत-क़हत माता गिरगै, पावै गति निर्वान
अमरित चोला ला करके, हो परलौके सिधार।'
राजा संग्रामसाहि के राज्य गढ़ामंडला में 52 गढ़ थे। उनका साम्राज्य भोपाल से सम्बलपुर और उत्तर पन्ना से चांदा तक फैला हुआ था। मंडला से 20 किलोमीटर दूर रामनगर में गढ़ा मंडला की राजधानी थी। संग्रामसाहि राजाओं की वंशावली में 48वे राजा थे। उनके बाद दलपतसाहि गढ़ामंडला के राजा बने जिनका विवाह सन 1540 में कलिंजर के राजा कीरतसिंह की पुत्री दुर्गावती से हुआ। विवाह के सात वर्ष बाद सन 1547 में जब दलपतसाहि की मृत्यु हुई तब उनका एक मात्र पुत्र वीरनारायन केवल तीन वर्ष का था। बालक वीरनारायन के राज्याभिषेक के बाद शासन व्यवस्था का कार्य उसकी माँ दुर्गावती ने संभाला। दुर्गावती अत्यंत सुंदर और राजकाज में दक्ष थी। उसने 16 वर्षों के कार्यकाल में अपने राज्य में सिंचाई और जलसंरक्षण के लिए व्यापक पैमाने पर कार्य किए इसलिए वह बहुत लोकप्रिय थी।
मंडला की धरती आज भी रानी दुर्गावती के शौर्य और शासन प्रबंधन के गीत गाती है। जनश्रुति है कि नर्रई नाले के आसपास रात्रि के अंधकार में नगाड़ों की आवाज़, हाथियों की चिंघाड़ और घोड़ों की टाप अब भी साफ-साफ सुनाई पड़ती है। वहाँ युद्ध में शहीद हुए वीरों की माताओं, पत्नियों और बच्चों का रुदन भी सुनाई पड़ता है। शौर्य की प्रतीक रानी दुर्गावती की यशोगाथा आज भी वहाँ के लोकगीतों के रूप में गुंजायमान हैं।
'चलो चली गढ़ा मां, मितवा करबो तन निसार
माता दुर्गा रन चंडी के, लेवी चरन पखार
हाथ ज़ोर बिनती करें, जय जय होवे तुम्हार
अमर रहे माता प्रिथिवी में, जस रहे रे तुम्हार।'
मंडला की सबसे बड़ी खूबसूरती नर्मदा नदी है जिसे वहाँ के निवासी 'नर्बदा मैया' कहकर सम्मान से पुकारते हैं। लंबा-चौड़ा पाट, चांदी की तरह चमचमाती जलधारा और मदमस्त पवन की तरह बहती नर्मदा नदी सहज ही मन मोह लेती है। पर्यावरण प्रेमी अमृतलाल वेगड़ अपने यात्रा वृतांत "सौन्दर्य की नदी नर्मदा" में लिखते हैं, 'नर्मदा सौन्दर्य की नदी है. यह वनों, पहाड़ों और घाटियों में से बहती है. यह चलती है इतराती, बलखाती, वन-प्रांतरों में लुकती-छिपती, चट्टानों को तरासती, डग-डग पर सौन्दर्य की सृष्टि करती, पग-पग पर सुषमा बिखेरती है!
नर्मदा पहाड़ी नदी है पर आरम्भ वह मैदान से करती है. अमरकंटक का पहाड़ वह आधे दिन में उतर जाती है, फिर शुरू होता है प्रायः पचहत्तर किलोमीटर लंबा डिंडौरी तक का मैदान. नर्मदा को मानो पहाड़ों से कोई सरोकार ही न हो. यह तो किसी शैतान बालक का थोड़ी देर के लिए किसी मेहमान के आगे भोला-भाला बन कर बैठने जैसा है. डिंडौरी से पहाड़ों की भूलभुलैयाँ शुरू होती है. अनेक छोटे-बड़े पहाड़ गति-अवरोधक बन कर नर्मदा को कभी दाएं तो कभी बाएं मुड़ने को मजबूर करते हैं. इसीलिए डिंडौरी और मंडला के बीच जितने घुमाव-फिराव हैं, उतने शूलपाण की झाड़ी को छोड़कर और कहीं नहीं. डिंडौरी से मंडला तक का मार्ग अत्यंत दुर्गम है तो अत्यंत सुन्दर भी है. नर्मदा का यहाँ मानो बालकाण्ड पूरा होता है और सुन्दर काण्ड शुरू होता है.'
इस यात्रा में घर से निकलने के पहले पिछली बार का नर्मदा स्नान याद आया जब मैं घाट पर फैली काई पर फिसल कर बाल-बाल बचा था इसलिए मन ही मन अपना कान पकड़कर संकल्प लिया था कि इस बार नर्मदा के जल में प्रवेश नहीं करूंगा। मेरे संकल्प की मजबूती कायम रही, मैं नर्मदा में नहीं उतरा लेकिन मंडला से कुछ दूरी पर गरम पानी का एक कुंड बना हुआ है जहां मैं सुबह-सुबह अपने संबंधी-समूह के साथ पहुँच गया। डरते-डरते मैं लोहे से बनी सीढ़ियों से उतर कर कुंड के पानी में घुस गया।
आपने रेखा-विनोद मेहरा-अशोक कुमार अभिनीत फिल्म देखी है,'खूबसूरत'। उसमें रेखा हर खुशी के मौके को कहती है, 'निर्मल आनंद।' वही आनंद मुझे उस कुंड में डूबकर मिला। पानी का तापमान शरीर के तापमान के ठीक बराबर। ऐसा लग रहा था कि उसी कुंड में डूबा रहूँ, बाहर न निकलूँ। सच में, निर्मल आनंद।
आपने रेखा-विनोद मेहरा-अशोक कुमार अभिनीत फिल्म देखी है,'खूबसूरत'। उसमें रेखा हर खुशी के मौके को कहती है, 'निर्मल आनंद।' वही आनंद मुझे उस कुंड में डूबकर मिला। पानी का तापमान शरीर के तापमान के ठीक बराबर। ऐसा लग रहा था कि उसी कुंड में डूबा रहूँ, बाहर न निकलूँ। सच में, निर्मल आनंद।
बचपन से हलवाई के धंधे से जुड़ा हुआ रहा हूँ इसलिए मुझे मिठाई की दुकानें बेहद आकर्षित करती हैं. मैं जहाँ भी जाता हूँ, इन दुकानों के काउन्टर पर रखी मिठाइयों को गौर से देखता हूँ, भले ही कुछ खाऊँ या खरीदूं न. इतने सालों से जुड़े होने के कारण मिठाई की गुणवत्ता के बारे में इतना अनुभवी हो गया हूँ कि केवल मिठाई को देखकर उसके स्वाद व अच्छी या अच्छी न होने के बारे में अनुमान लगा लेता हूँ. कभी-कभी कोई अच्छी मिठाई दिख जाती है तो उसे चख लेता हूँ और फिर पैक करवाकर अपने घर ले जाता हूँ ताकि परिवार के साथ मिल-बैठकर खाया जा सके.
मंडला में मेरी सबसे बड़ी बहन कस्तूरी दीदी की नातिन रेणु का विवाह राकेश अग्रवाल के साथ हुआ है जो मधुरम स्वीट्स के मालिक हैं. मैं उनके घर 'कर्टसी विजिट' में गया था. नाश्ते के पश्चात् उन्होंने मुझसे अपनी दुकान चलने का आग्रह किया. मैं राजी हो गया. अपनी कार में बिठाकर वे मुझे शहर से बाहर स्थित अपने कारखाने में ले गये जहाँ उनकी दुकान के लिए मीठा व नमकीन तैयार होता है. मैंने उस कारखाने को देखा तो मैं विस्मित रह गया. एक अच्छी-खासी फैक्ट्री का दृश्य था वहां. मीठा बनाने के अनेक कारखाने मैंने देखे हैं, सभी जगह ऐसी भट्टियां देखी जहाँ लकड़ी, कोयला या गैस की आग से सामान तैयार किया जाता है, परन्तु यहाँ मैंने देखा कि एक बड़ा बायलर लगा हुआ है जिसमें से प्रसारित वाष्प को पाइप से भट्टियों तक भेजा जा रहा था जिससे सामान तैयार हो रहा था, अर्थात आग का कोई काम नहीं! एक बड़ा वाटर प्योरीफायर लगा हुआ था जिससे निकला शुद्ध पानी मिलाकर मीठा या नमकीन तैयार किया जाता है. एक कमरा कच्चे माल से भरा हुआ था, एक कमरा तैयार माल रखा हुआ था, एक कमरे में कारीगर बैठकर हाथों में दस्ताने पहने लड्डू बाँध रहे थे, कुछ कारीगर मिठाई की कटिंग कर रहे थे तो कुछ सजावट. एक कमरे में नमकीन की विभिन्न किस्में तैयार रखी हुई थी जिसमें कुछ कामगार नमकीन तौल कर पोलीथिन में पैक कर रहे थे. इतना व्यवस्थित और साफ़-सुथरा कारखाना मैंने इसके पहले कहीं नहीं देखा था.
वहां से निकल कर हम मधुरम स्वीट्स की दुकान में पहुंचे. दूकान क्या थी, एक सुसज्जित शोरूम था जिसमें मिठाइयों की विभिन्न किस्में कांच से निर्मित आधुनिकतम शोकेस में रखी हुई थी, पीछे आलमारी में नमकीन के पैकेट सजे हुए थे और काउंटर के सामने बेकरी के अनेक आइटम व्यवस्थित ढंग से रखे थे. मैंने पूछा, 'बेकरी भी खुद बनाते हो?'
'जी, ऊपर की मंजिल में इसका कारखाना है.' राकेश ने बताया और मुझे दिखाने ले गया.
नीचे उतर कर राकेश और उसके पिताजी ने बहुत आग्रह करके कुछ मिठाइयाँ मुझे चखाई. मैं पुराना हलवाई हूँ, मैं सच कह रहा हूँ, बेहद स्वादिष्ट थी. इस बीच उन्होंने स्टाफ को कुछ इशारा किया, तीन बड़े-बड़े बैग में मीठा, नमकीन और बेकरी मुझे घर ले जाने के लिए दी. मैंने भुगतान करना चाहा तो राकेश बोला, 'नाना जी, आपके बच्चे की तरफ से यह छोटी सी भेंट है, इसे स्वीकार करिए, प्लीज.'
मंडला जैसी छोटी सी बस्ती की इस दुकान में दिवाली के समय ग्राहकों की भीड़ सँभालने के लिए ट्रैफिक पुलिस की मदद लेनी पड़ती है. यह आश्चर्य की बात है लेकिन है सोलह आने सच्ची.
मंडला के प्रवास में मैंने जो देखा, उससे मन प्रसन्न हो गया बल्कि यह कहूं कि मेरा मन डोल गया तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी.
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