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अथ बीकानेर गाथा

अथ बीकानेर गाथा :
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(1) मेरा नाम है चमेली :
   
          सन 1968 में एक बचकानी फिल्म आई थी- 'राजा और रंक' जिसमें लता मंगेशकर का गाया एक गीत था : 'मेरा नाम है चमेली, मैं हूँ मालन अलबेली, चली आई मैं अकेली बीकानेर से.' उस अलबेली मालन की प्रतीक्षा में मेरे बाल सफ़ेद हो गए लेकिन उसके दर्शन नहीं हुए. बीकानेर के श्री अशोक गुप्ता ने जब कला एवं साहित्य उत्सव के आयोजन का निमंत्रण दिया तो मन प्रसन्न हो गया, कल्पना बनी कि देश भर के 'फेसबुक' मित्रों से मुलाक़ात होगी और उस 'अलबेली मालन' से भी. 
        बीकानेर के रसगुल्ले, भुजिया और पापड़ विश्व में प्रसिद्ध हैं, बचपन से मैंने हलवाई का धंधा किया है इसलिए ये दूकानें मुझे बरबस आकर्षित करती हैं. बीकानेर जाते समय ट्रेन में एक सहयात्री ने बताया- 'भाई जी, आपने बीकानेर के हल्दीराम और बीकाजी का नाम बहुत सुना होगा लेकिन यदि 'बेस्ट क्वालिटी' भुजिया, पापड़ लेना हो तो भुजिया गली में 'बिसनलाल बाबूलाल' की दूकान से लेना.

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          समारोह स्थल पर कला एवं साहित्य उत्सव चल रहा था. उस समय कवितापाठ चल रहा था, मैंने अपने मित्र टी.के.मारवाह (दिल्ली) को पटाया और हम दोनों चुपचाप वहां से खिसके और बीकानेर की गलियों में समा गए. बहुत तलाशे मगर कहीं कोई 'मालन' नहीं मिली, हाँ, रंगीन पत्थरों से बनी नक्कासीदार अटारियों ने हमें मुग्ध कर दिया. कोई परिचय-सूत्र होता तो अन्दर जाकर भी देखते लेकिन क्या करते, बाहर की छटा देखकर ही मन को मनाना पड़ा. सकरी-घुमावदार गलियाँ, उन गलियों से गुजरते नगरवासी, हर मोड़ पर 'ट्रेफिक जाम', हँसते मुस्कुराते लोग. वहां की बात ही कुछ निराली थी.
          पता करते-करते हम लोग सट्टाबाजार पहुंचे जहाँ पराठा-सब्जी की एक मशहूर दूकान थी. उस दूकान को बाहर से देखकर हम दोनों एकबारगी झिझक गए लेकिन उसकी बहुत तारीफ़ सुनी थी इसलिए हिम्मत करके घुस गए. साढ़े तीन फुट के एक गलियारे में मुंहाने पर एक भट्टी पर रखे तवा पर पराठे सेंके जा रहे थे. किसी प्रकार कढ़ाई की कालिख से बचते हुए जब हम अन्दर घुसे तो गली और सकरी हो गई जिसमें एक दीवार से सटी दो 'बेंच' रखी थी जिस पर मनुष्य किसी प्रकार अपना पृष्ठभाग टिकाकर बैठ सके और उसके सामने एक बित्ते की 'टेबल' भी रखी गई थी ताकि जब अखबार के टुकड़े में रखकर पराठा परोसा जाए तो कागज़ टिका रहे. गली में दो फुट की जगह बची थी जिसमें नाली थी और चूँकि वह नाली भरी-पूरी थी इसलिए उसमें से दुर्गन्ध उठ रही थी. उस दूकान में रखा हर सामान प्रागैतिहासिक 'टच' लिए हुए दिख रहा था अतएव हमसे इतिहास का उपहास न हो, उस घिनौने माहौल के बावज़ूद हमने वहां का मशहूर पराठा खाने का निश्चय किया और आलू तथा मूंगदाल के पराठे मंगवाए, केवल पराठे पर ध्यान केन्द्रित कर उसके स्वाद का आनंद लिया. बेशक, पराठे स्वादिष्ट थे और सस्ते भी. चार पराठे के चालीस रूपए दूकानदार ने अपनी छोटी सी लकड़ी की संदूक में जब रख लिए तब मैंने उनसे कहा- 'आपकी शोहरत सुनकर आपकी दूकान आए थे, पराठे तो अच्छे थे लेकिन आपने अपनी दूकान की यह क्या हालत बना रखी है ?' उत्तर में उन्होंने अपने दांत निपोर दिए. मैंने बात आगे बढ़ाई- 'मैंने जैसा आपका नाम सुना था, मेरे दिमाग में आपकी दूकान की जो कल्पना थी, वह कुछ और थी लेकिन यहाँ का हाल देखकर मुझे दुःख हो रहा है.' उत्तर में उन्होंने फिर अपने दांत निपोर दिए. मैंने फिर बात आगे बढ़ाई- 'अगली बार मैं जब बीकानेर आऊंगा तो अपनी 'मेमसाहब' को लेकर पराठा खाने आऊंगा, तब तक इसे ठीक-ठाक करवा लीजिएगा.' उत्तर में उन्होंने पुनः अपने दांत निपोर दिए.
          हम उस गली से बाहर निकले, दो बार दाहिने मुड़ने के बाद भुजिया गली पहुँच गए, तनिक खोजने के बाद बिसनलाल बाबूलाल की दूकान दिख गई। वह साढ़े चार फुटी गली में स्थित दूकान थी जिसके प्रवेशद्वार पर एक सज्जन 'काउंटर' के अंदर विराजमान थे। मुझे उनका चेहरा बाद में दिखा और पेट पहले क्योंकि उनका पेट उनके चेहरे से एक बित्ता बाहर था। दूकान की गहराई केवल आठ फुट थी। मैं दूकान का क्षेत्रफल देखकर अचंभित हो रहा था और सशंकित भी कि किसी गलत दूकान में तो नहीं घुस गया ! उनसे नाम 'कंफर्म' करने के बाद हम दोनों ने अपने घर ले जाने के लिए भुजिया खरीदी। बाहर निकलते हुए मैंने उनसे पूछा- 'आपका कारख़ाना यहीं आस-पास है क्या ?'
'हें हें हें, बहुत दूर है जी।'
'सेव बनाने के लिए कितनी भट्ठियाँ हैं ?'
'हें हें हें, हमें क्या मालूम जी !'
'आप मालिक हो और आपको यह नहीं मालूम कि आपके कारखाने में कितनी भट्ठियाँ हैं ?'
'हें हें हें, हम तो वहाँ जाते नहीं जी '
'मैं इन्कमटेक्स वाला नहीं हूँ, आपका बिरादर हूँ, बिलासपुर से आया हूँ।' 
'हें हें हें, वो तो ठीक है जी।' उन्होंने जवाब दिया और मुंह मोड़कर दूसरे ग्राहकों से जुड़ गए लेकिन इसने प्रयास के बावजूद मैं उनसे भट्ठियों की संख्या नहीं उगलवा पाया। मैं और मरवाह जी उस सेठ की चर्चा करते एक दूकान पर खड़े-खड़े चाय सुड़की और आटो में बैठकर कार्यक्रम स्थल में वापस आए।

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          उन्मुक्त सभागार में नाट्यकर्मी नादिरा बब्बर के शिष्य नाटक की एकल प्रस्तुति कर रहे थे। शुरुआती दो प्रस्तुतियाँ बेदम थी लेकिन अंतिम दो प्रस्तुतियाँ अद्भुत थी, उन प्रस्तुतियों के बारे में बाद में बताउंगा, उस समय तो मेरे दिमाग में पराठा वाला और भुजिया वाला झूल रहे थे। मैं सोच रहा था कि बीकानेर वाले इतना रहस्यपूर्ण व्यवहार क्यों करते हैं? समापन कार्यक्रम के दौरान वह रहस्य खुला जब आयोजक श्री अशोक गुप्ता ने एक व्यक्तव्य दिया। पूरा व्यक्तव्य आपके काम का नहीं है, केवल एक वाक्य काम का है। उन्होंने कहा- 'आप सोचते होंगे के अशोक गुप्ता बड्डा आदमी हे, पेसे वाल्ला है लेकण ऐसा नई हे। कार बेचणे का धन्दा करता हूँ पर म्हारे जेब में एक रूपिया बी नहीं होवे।' 
          मुझे समझ में आ गया कि बीकानेर का हर धनिक 'कथरी ओढ़ कर घी खाने वाला' है। सब इतने चतुर और सतर्क हैं कि अपनी तिजोरी दूसरे के सामने कभी नहीं खोलते। मैं तो समझ गया, आप समझे कि नहीं ?

(2) मेरा नाम है सईद अयूब :

          35 घंटे की लंबी रेलयात्रा के बाद जब मैं और बिलासपुर के श्री बजरंग केडिया अल-सुबह बीकानेर पहुँचे तो सबसे पहले सईद अयूब हमें मिले, चार रातों से जगे हुए थे लेकिन खुश थे। स्टेशन के पास की एक होटल में चाय पिलाकर वे हमें आवास स्थल 'आशीर्वाद' ले गए।
          बीकानेर साहित्य और कला उत्सव में बहुत लोग आए थे, चारों तरफ के लोग जिनमें साहित्यकार थे, कलाकार थे, नाटककार थे, चित्रकार थे, फोटोग्राफर थे। नास्ते-चाय और भोजन का काबिल-ए-तारीफ़ इंतज़ाम था। कार्यक्रम स्थल में सहज और सादगी पूर्ण सजावट थी। तीन दिन चले इस महोत्सव में एक भी 'इन्डोर' कार्यक्रम नहीं हुआ, सारे कार्यक्रम आस-पास गुजरती ठंडी हवा और प्राकृतिक प्रकाश में आयोजित हुए। फोटोग्राफ और पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगी थी, 'वर्कशाप' चल रहे थे, साहित्यिक पुस्तकों के स्टाल लगे थे। खुली हवा में सांस लेते हुए साहित्यिक कार्यक्रम का आनंद लेना एक अनोखा अनुभव था। आयोजक श्री अशोक गुप्ता हम लोगों की भीड़ देखकर पुलकित थे साथ ही हड़बड़ाए से दिख रहे थे शायद उन्हें ऐसे बड़े मजमे की कल्पना भी नहीं रही होगी।
        साहित्यकार और कलाकार आम तौर पर सिरफिरे होते हैं जिसे साहित्यिक भाषा में 'संवेदनशील मस्तिष्क' कहा जाता है। सिरफिरों की इतनी बड़ी भीड़ को सम्हालना और तीन-दिनी कार्यक्रम परम शान्ति से निपट जाना, सच में, गज़ब हो गया। इस गज़बनाक सफलता के पीछे लगभग एक दर्जन बजरंगबलियों की अथक मेहनत थी जिसका नेतृत्व सईद अयूब के हाथों में था। 
          इस युवा की तारीफ़ में 'सईद चालीसा' लिखी जा सकती है। इसको काम के समय नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती, गुस्सा नहीं आता। हरदम मुस्कुराते रहता है, हरदम तरोताजा रहता है, हरदम दौड़ते रहता है, हरदम सबसे मिलने के लिए लालायित रहता है, सबकी समस्या का समाधान उसके पास रहता है। सबसे बड़ी बात है कि लड़का कुँवारा है। अपनी बीवी बनाने लायक लड़की खोज रहा है, कुंवारी लड़कियों और उनके फ़िक्रमंद अब्बाओं के लिए यह खुशखबरी हो सकती है। लड़का 'गेरेंटी-शुदा' है, जे॰एन॰यू॰ में पढ़ा है, 'यूपीयन' है, अमेरिका के नागरिकों को हिन्दी भाषा पढ़ाता है, कमाऊपूत है। इच्छुक परिवार डा॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल से संपर्क करें क्योंकि सईद अयूब सिर्फ उनका कहना मानता है और उनके ही निर्देश पर अपने साथियों को लेकर बीकानेर में डेरा डाले बैठा था।
          दूसरे दिन दोपहर को सब लोग 'डेजर्ट सफारी' के लिए बस में बैठकर निकल गए, हम देर से पहुंचे तब तक बसें जा चुकी थी लेकिन एक खाली बस को रोककर सईद हम 'लेटलतीफों' का इंतज़ार कर रहे थे. धीरे-धीरे दस लोगों की अन्तिम खेप के रूप में हम लोग रवाना हुए. रास्ते में सईद ने बातचीत शुरू की जिसमें कुछ उपयोगी और ज्ञानवर्धक सूचनाएं मिली. उपरोक्त कुछ सूचनाएं इसी वार्तालाप के अंश हैं. कुछ और भी आपको बताने लायक है, जैसे, सईद ने घोषित किया- 'मैं ऐसी लड़की से शादी करूंगा जो मेरे जैसे स्वभाव की हो.'
'पति-पत्नी एक स्वभाव के होते ही नहीं सईद.' मैंने कहा.
'मैं शादी के पहले से ही सब बातें साफ़ कर लूँगा.'
'लडकियां बहुत होशियार होती हैं. शादी के पहले वह तुम्हारी हर बात मान जाएगी, शादी के बाद तबला बजाएगी.'
'मैं तो खुले दिमागवाला हूँ, न दबाउंगा और न दबूंगा.'
'मान लो आपस में न पटी तो ?'
'तलाक दे दूंगा, मैं भी आज़ाद और वह भी.'
'तलाक दोगे तो लड़की बड़ी रकम वसूलेगी.' मेरे पीछे बैठे व्यक्ति ने धमकाया.
'हम लोगों में यह समस्या नहीं है. शादी के वक्त मेहर की रकम तय होती है, बस, उतना ही देना होता है. मैं तो मेहर की रकम को शादी के समय ही अपनी बीवी के नाम बैंक में जमा करवा दूंगा.' सईद ने अपनी योजना बताई.
          सईद अयूब की बात से मुझे समझ में आया कि लड़का दूरदर्शी है, खुले दिमाग का है, साफ़-साफ़ बातें करता है, बीवी को तलाक दे सकता है और एक से अधिक शादियाँ करने का हौसला रखता है. खुदा खैर करे. इस 'स्मार्ट' बन्दे ने मुस्कुराते हुए इस उत्सव में मेरी जो बाट लगाई, उसे आगे बताउंगा, तब तक आप इंतज़ार कीजिए.


 (3) मेरा नाम है पुरुषोत्तम अग्रवाल :

          आपने 'मार्क' किया होगा कि कुछ फिल्में सिर्फ कलाकार के नाम से चल जाती हैं। हमारे ज़माने में दिलीपकुमार, राजकपूर, देवानन्द, सुरैया, मधुबाला, नर्गिस के नाम से फिल्में चल जाती थी, वैसे ही मध्यकाल में मेहमूद, साधना, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र जैसे नाम दर्शकों को सिनेमाहाल तक खींच लाते थे। आजकल शाहरुख, सलमान, आमिर, ओमपुरी, परेश रावल आदि अपने नाम से फिल्म हिट करवा लेते हैं उसी प्रकार बीकानेर साहित्य और कला उत्सव प्रो॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल के नाम से सफल हो गया।
          आयोजक अशोक गुप्ता से मेरी मित्रता हाल की है, उनकी 'वाल' पर चिपके हुए 'दिल दहला देने वाले' फ़ोटोग्राफ के आकर्षण में मैं उनकी 'वाल' से लिपट गया और उन्ही मनमोहक चित्रों पर नज़र घुमाते-घुमाते एक दिन अचानक 'बीकानेर साहित्य और कला उत्सव' के बारे में पढ़ा तो मुझे लगा-'आयोजन अच्छा होना चाहिए. सब  साहित्यकारआमने-सामने दिखेंगे, 'फेसबुक' के परिचित मित्र मिलेंगे, कुछ नए मित्र बनाएँगे, अपनी आत्मकथा 'कहाँ शुरू कहाँ खत्म' का प्रचार भी करेंगे।'

          डर के मारे मैं अपनी पत्नी को साथ बीकानेर नहीं ले गया क्योंकि वहाँ की चित्र प्रदर्शनी में 'ऐसे-वैसे' दृश्यों को उनके सामने कैसे देख पाऊँगा ? इतने सारे लोगों के सामने यदि वे मुझे डाँटती- 'इसलिए मुझे यहाँ लाए हो?' तो मेरी सार्वजनिक छवि बिगड़ने का अंदेशा था. वैसे घर में डांटती हैं तो कोई ख़ास बात नहीं, वह बात घर के अंदर रहती है। 'सौन्दर्य बोध' की आधुनिक अवधारणा की आड़ में सौन्दर्य दर्शन करने की बेखौफ़ हिम्मत मुझमें नहीं है !

'अंदाज़ अपने देखते हैं आईने में वो,
ये भी देखते हैं कि कोई देखता न हो।'


          पुरुषोत्तम जी से मेरी पहली मुलाक़ात बिलासपुर में 7 अप्रैल 2013 को हुई। वे मेरे द्वारा संचालित संगठन 'विचार मंच' के सौवें कार्यक्रम में अतिथि वक्ता के रूप में 'लोकतन्त्र की विषमताएँ एवं संभावनाएँ' विषय पर अपने विचार व्यक्त करने हेतु बिलासपुर पधारे थे। उनके अध्ययन, मनन-चिंतन, नवोन्मेषी दृष्टि और प्रभावपूर्ण वक्तृत्व शैली ने मुझे बेहद प्रभावित किया। उसी दिन मैं उनका 'फैन' बन गया। 'फेसबुक' में उनसे जुड़ने के बाद उनका मित्रसमूह मुझसे जुड़ा, परिणामस्वरूप मेरी मित्रसूची अनवरत समृद्ध होती गई। ये होता है- किसी समर्थ व्यक्ति से मित्रता स्थापित होने का सकारात्मक प्रभाव। ठीक ऐसा ही लाभ इस उत्सव के आयोजक श्री अशोक गुप्ता को मिला और यह उत्सव एक महोत्सव में परिवर्तित हो गया।

          कार्यक्रम आयोजक ने अपने एक भाषण में कहा कि उनके कार्यक्रमों में किसी को भी मुख्य अतिथि या विशिष्ट अतिथि नहीं बनाया गया लेकिन आयोजन में बड़ी चतुराई से प्रो॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल, श्री नरेश सक्सेना, श्री शीन काफ़ निज़ाम, श्री चंद्र प्रकाश देवल, श्री नंद भारद्वाज, श्री शिवरतन अग्रवाल आदि नामचीन हस्तियों को कभी मंच के उधर, कभी मंच के इधर बैठाकर उन्हें अघोषित 'मुख्य' या 'विशिष्ट' अतिथि बनाए रखा गया। इसका मतलब यह मत लगा लीजिएगा कि ये लोग उस योग्य नहीं थे, ये सब योग्य थे, महायोग्य थे लेकिन समझने की बात यह है कि आयोजकों का दावा कितना हसीन था!    

          हाँ, तो मैं आपको प्रो॰पुरुषोत्तम अग्रवाल के बारे में बता रहा था लेकिन इधर-उधर भटक गया। आप मानें या न मानें, इस उत्सव को प्रो॰पुरुषोत्तम अग्रवाल के नाम ने 'हिट' करवा दिया। पुरुषोत्तम जी की ख्याति पूरे हिन्दी जगत में विचारक और प्रभावशाली वक्ता के रूप में है। जब से टेलीविज़न के न्यूज़ चैनल में चर्चा करने के लिए दिखने लगे है तब से उनकी लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। बिना डरे दो टूक टिप्पणियाँ अब बहुत कम सुनने को मिलती है लेकिन जब पुरुषोत्तम जी चर्चा में बैठते हैं तो किसी भी विषय पर उनकी संतुलित और सधी हुई बात बरबस मन मोह लेती है। इस उत्सव से उनका जुड़ना- कार्यक्रम का आकर्षण बिन्दु हो गया। न जुड़ने वाले भी इसलिए जुड़ गए कि 'जब प्रो॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल जुड़ गए तो मुझे भी जुड़ जाना चाहिए।' मेरा अनुमान कि यह कारवां ऐसे ही कुछ विशिष्ट लोगों के जुड़ जाने की वज़ह से बढ़ता गया और अशोकजी की साहित्यिक फ़सल लहलहा उठी।

          यदि आपकी प्रो॰पुरुषोत्तम अग्रवाल से मुलाक़ात हो चुकी है तो आप भाग्यशाली हैं और यदि नहीं हुई है तो मिलने का कोई जतन कीजिए, किसी व्यक्ति में विद्वता और नम्रता एक साथ हो जाए तो ऐसे व्यक्ति से मिलने का मज़ा कुछ और है। भई, हम सब तो उनसे उत्सव में मिले, उन्हें सुना, उन्हें देखा और 'एक सामान की खरीदी पर एक फ्री' भी हासिल हुआ, हमें उनकी धर्मपत्नी श्रीमति सुमन केशरी के भी दर्शन हो गए, अहोभाग्य।


(4) मेरा नाम है अशोक गुप्ता :

          कोई व्यापारी यदि साहित्यानुरागी या कला प्रेमी हो जाए तो समझ लीजिए की उसे खुजली वाला कोढ़ हो गया है जो उसे चैन से नहीं रहने देगा. मैं स्वयं व्यापारियों की ज़मात का हूँ इसलिए श्री अशोक गुप्ता के बारे में इस अभद्र भाषा का उपयोग करने की पात्रता रखता हूँ. बीकानेर साहित्य और कला उत्सव उसी दुखद बेचैनी की सुखद परिणिति है.
          जिस व्यापारी में आर्थिक सामर्थ्य होता है वह स्वयं को साहित्यप्रेमी घोषित करवाने के लिए अपने वित्त-सामर्थ्य को काम पर लगाता है और किसी ऐसे 'पैदल' को तलाशता है जो उसको मंच पर स्थापित करें ( अशोक जी ने ऐसा एक प्रयोग करके हमें साक्षात दिखाया ), उसकी जय-जयकार करवाए और नगर हो रही साहित्यिक और कलात्मक गतिविधियों का आधार स्तम्भ बताए. जाहिर है, सब जानते हैं कि 'धन' ही धर्म का आधार है, राजनीति का आधार है, फिल्मों के निर्माण का आधार है, वैसे ही साहित्य और कला के वृहद कार्यक्रमों का भी धन ही आधार है. परन्तु अशोक जी ने अपने बुद्धिचातुर्य से धन-सामर्थ्य-बल के स्थान पर 'फेसबुक' को अपना पैदल बनाया और आप देखिये, यह अद्भुत सम्मलेन घटित हो गया.
          अशोक गुप्ता मेरे जैसे व्यापारी और अन्य साहित्य-कार्यक्रम-आयोजकों के लिए एक प्रकाश-स्तम्भ हो गए हैं जिन्होंने अपने धन का नहीं वरन बुद्धि का प्रयोग करके इस आयोजन को सफल करके बता दिया। मैं तो अत्यंत उत्साहित हो गया हूँ कि ऐसा ही धांसू कार्यक्रम अपने शहर बिलासपुर में भी करूँ, बस, प्रो॰ पुरुषोत्तम अग्रवाल का आसरा मिल जाए और सईद अयूब का सहारा, माँ कसम, बीकानेर से एक इंच ऊँचा कार्यक्रम करके बताऊंगा। किसी साहित्योन्मुखी धनिक की तलाश में हूँ, जैसे ही वह मुझे मिला, मैं गुरु-चेला को पटाता हूँ।
          अशोक जी एक आदर्श पुरुष हैं, उनसे बहुत कुछ सीखने लायक है। मैंने पूरे उत्सव में उन्हें उत्तेजित होते, चिंतित होते, हड़बड़ी करते या दौड़ते-भागते नहीं देखा, हाँ, तनिक बेचैन से दिखाई पड़ते थे। इतना बड़ा आयोजन हो तो ऐसी बेचैनी स्वाभाविक है। मैं सबको तो पहचानता नहीं परंतु मैंने वहाँ अनुमान लगाया कि उत्सव में स्थानीय कार्यकर्ताओं की कमी थी और प्रतिभागी ही कार्यकर्ता की भूमिका में अवतरित हो गए थे। अशोकजी की एक 'पोस्ट' से मेरा अनुमान पुष्ट भी हुआ है। यह अशोकजी की विलक्षण नेतृत्व क्षमता का परिचायक है, सीखने लायक है। उन्होंने इस 'पोस्ट' में इन 'दिहाड़ी' वालों को मालदीव घुमाने ले जाने का आश्वासन दिया है जिसे पढ़कर मेरा मन बेहद दुखी हो गया। अब मेरी उम्र 67 वर्ष हो गई है, आस-पास का समझ आता है लेकिन दूर-दृष्टि कमजोर हो गई है अन्यथा मैं दस-बीस कुर्सियाँ इधर-उधर कर देता और अशोकजी के द्वारा प्रायोजित मालदीव-यात्रा-दल की सूची में मेरा नाम भी होता ! सच में, अखर गया।
          मैं यह भी जानता हूँ कि इतने बड़े उत्सव में बेतहाशा खर्च होता है, फिर, 'फ्री फंड' वाले भी कार्यक्रम दाँत निपोरते घुस जाते हैं, 'लोकल' तो निःशुल्क थे ही। ज़रूर अशोक जी का 'पर्स' भी हल्का हुआ होगा। अब चूंकि 'वन में शो' था इसलिए कुछ कहा नहीं जा सकता पर अशोकजी अपनी सज्जनता के कारण अपनी जेब से काफ़ी खर्च हो जाने के बावजूद मुझे उम्मीद है कि वे अपने मुंह से किसी से कुछ नहीं बताएँगे, स्वयं सह लेंगे। बधाई अशोकजी और भाभी जी। बधाई के पात्र वे सब भी हैं जिन्होंने इस उत्सव में अपनी भागीदारी दी और इसे उत्सव से महोत्सव बना दिया।  

(5) मेरा नाम है द्वारिका ::

          मैं बहुत दिनों से स्वयं को साहित्यकारों की ज़मात में शामिल करवाना चाहता था। कोई भी कितना भी अच्छा लेखक हो, कवि हो, या ये हो या वो हो, जब तक वह पुराने पापियों के बीच घुसकर खड़ा नहीं होता तब तक उसे मान्यता नहीं मिलती। वैसे भी साहित्य में मेरा कोई योगदान नहीं रहा है, पर पिछले वर्ष मेरा उपन्यास 'कहाँ शुरू कहाँ खत्म' प्रकाशक को पचास हज़ार रुपया देकर प्रकाशित हुआ तो मेरा दिल भी साहित्यकार कहलाए जाने के लिए मचल गया।
          मैंने कभी किसी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग नहीं लिया था इसलिए श्री अशोक गुप्ता का 'बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव' मेरे लिए एक ऐसे सुअवसर के रूप में प्रगट हुआ जिसमें मुझे 'अखिल भारतीय' स्तर पर पहचाने जाने की संभावना दिखी। यह बात दूसरी है कि वहाँ मेल-मुलाक़ात का माहौल नहीं बना, सब अपने-अपने समूह में विचरते रहे जैसे- बीकानेरी समूह, लखनवी समूह, जयपुरी समूह, दिल्ली समूह, वृद्ध समूह, युवा समूह, युवती समूह आदि। अधिकतर लोग अपनी लक-दक या मेक-अप दिखाने या उपस्थिति दर्ज़ कराने के लिए आए थे परंतु इसमें गलत क्या है- सब अपनी जेब के पैसे खर्च करके आए आए थे. कुछ लोग अपनी लिखी कविता सुनाने आए थे इसीलिए उनका दिल रखने के लिए आयोजक ने भरपूर लम्बी और बहुत लम्बी काव्य गोष्ठियाँ रखी। उसी प्रकार मैं भी अपने 'एक्सपोजर' के लिए लालायित था।
          मौका ऐसे मिला कि जब सह-आयोजक नवनीत पांडे जी ने मुझे 'प्रोफाइल' भेजने के संदेश दिया तो मैंने उत्तर दिया- 'मेरी कोई फाइल नहीं है तो 'प्रोफाइल' कैसे बनाऊँ ?' अब आप बताइये, जिंदगी भर व्यापार किया, अचानक एक पुस्तक छपवा ली तो 'इत्ती' सी उपलब्धि पर भला कोई 'प्रोफाइल' बनती है ? मैंने उस संदेश में एक वाक्य और जोड़ दिया था- 'सिनेमा का मुझ पर प्रभाव' विषय पर बोलने के लिए मुझे तीस मिनट का समय दिया जाए।'
          25 अक्तूबर की रात को मुझे 'इनबॉक्स' में एक संदेश मिला - 'सर, 3 नवम्बर को 11.30 से 12.00 बजे तक का समय सिनेमा पर आपके व्यक्तव्य के लिए निर्धारित किया गया है। आपके व्यक्तव्य का विषय क्या होगा सर ?'- सईद अयूब, कन्वेनर, बीकानेर आर्ट एण्ड लिटरेचर फेस्टिवल।'
          आपसे क्या झूठ बोलना, मेरा मन मयूर नाचने लगा। समय कम था, हमें बिलासपुर से 30 नवम्बर कि शाम को बीकानेर के लिए निकलना था, हाथ में पाँच दिन थे और जीवन भर देखी फिल्मों के प्रभाव पर 30 मिनट में बोलना था ! मेरे दिमाग में सौ-पचास फिल्में तैर गई और मैं 'कन्फ्यूज़' हो गया। फिर सईद जी ने संदेश दिया- 'सर, क्या जान सकता हूँ कि कौन-कौन सी फिल्मों के बारे में आप बात करेंगे? बस जिज्ञासावश पूछ रहा हूँ. बुरा मत मानियेगा।'  
मैंने जवाब दिया- 'फिल्मों की भीड़ ने मुझ पर हमला कर दिया. हर फिल्म मुझसे सवाल कर रही है- 'अरे, मुझे कैसे छोड़ दोगे?' यह बिलकुल उस तरह है जैसे किसी बच्चे से पूछा जाए- 'तुम किसे ज़्यादा मोहब्बत करते हो, अम्मी को या अब्बा को?' आज दिन भर में तय करने की कोशिश करूंगा कि किन फिल्मों पर चर्चा करना मुझे अपने और श्रोताओं के जीवन से जोड़ेगा. कल आपको अवश्य बताउंगा.
बड़ी मुश्किल से फिल्मों की भीड़ में से छः फिल्म को मैंने चर्चा के लिए चुना, 'श्री 420, 'मदर इंडिया', 'मुगल-ए-आजम', 'दो आंखे बारह हाथ', 'अनाड़ी' और 'आनंद'। इस सभी को मैंने फिर से 'यू ट्यूब' में देखा क्योंकि मुझे इन फिल्मों से वे टुकड़े निकालकर 'आडिएन्स' को दिखाने थे जो असरदार हों। तीन पृष्ठ का एक आलेख तैयार किया, एक विशेषज्ञ की मदद से फिल्म के उन टुकड़ों को निकालकर अपने कंप्यूटर में 'सेव' किया, फिर उसे 'पेन ड्राइव' में डाला।
मैं पूरी तैयारी के साथ अपना 'वीडियो प्रोजेक्टर' लेकर बीकानेर पहुंचा। वहाँ पहुँचने पर मालूम हुआ कि श्री दुर्गा प्रसाद अग्रवाल (जयपुर) भी इसी विषय में बोलेंगे लेकिन समय, वही तीस मिनट! हम दोनों ने आपसी बातचीत में फिल्मों के दृश्य न दिखाने और केवल वार्तालाप प्रस्तुत करने का निर्णय लिया। फिर, दूसरे दिन मालूम हुआ कि प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक श्री राकेश मित्तल (इंदौर) भी सिनेमा पर बोलेंगे लेकिन समय, वही तीस मिनट ! फिलहाल, हम तीनों ने आपस में बात करके एक योजना बनाई और तीस मिनट की आपसी वार्ता प्रस्तुत की जाए।
तीसरे दिन 'सिनेमा और हम' विषय पर कार्यक्रम शुरू हुआ, हम तीनों ने अपने विचार रखे। बाईसवें मिनट पर 'डाइस' पर अशोक गुप्ता जी आए और उन्होंने मुझे वार्ता समाप्त करने का इशारा किया मैं मध्य में बैठा था, मैंने दुर्गा प्रसाद जी और राकेश जी को उंगली से कोंचा और वार्तालाप रोकने के लिए संकेत किया। उसके बाद श्रोताओं में से एक सज्जन उठे, प्रश्न करना चाहते थे लेकिन समय की कमी थी इसलिए मना हो गया। ज़िद करके वे 'डाइस' तक आ गए लेकिन फिर भी मना हो गया क्योंकि समय की कमी थी! 
इस प्रकार केवल बाईस मिनट में भारत के हिन्दी सिनेमा पर तीन विशेषज्ञों की वह चर्चा सम्पन्न हो गई। मेरा अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित होने का वह सुनहरा अवसर समय की कमी की वजह से मेरे हाथ से निकाल गया। मुकेश जी का गाया एक गीत आपको याद होगा :

'वो तेरे प्यार का गम, इक बहाना था सनम,
अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी कि दिल टूट गया।'

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तब जब अब जबलपुर ============== ( १)           अपनी ससुराल होने के कारण मुझे शहर जबलपुर अत्यंत प्रिय है क्योंकि वहाँ दामाद होने के कारण मेरे मान-सम्मान की स्थायी व्यवस्था बनी हुई है यद्यपि सास-श्वसुर अब न रहे लेकिन तीन में से दो भाई , मदन जी और कैलाश जी , मुझे अभी भी अपना जीजा मानते हुए अपने माता-पिता की कोमल भावनाओं का प्रसन्नतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं। मैं पहली बार जबलपुर विवाह में बाराती बन कर दस वर्ष की उम्र (सन 1957) में गया था। मोहल्ला हनुमानताल , सेठ गोविंद दास की ' बखरी ' के कुछ आगे , जैन मंदिर के पास , सेठ परसराम अग्रवाल के घर , जहां से उनकी भतीजी मंदो का ब्याह मेरे बड़े भाई रूपनारायण जी के साथ हुआ था। उन्हीं दिनों सेठ गोविंद दास की ' बखरी ' के बाजू में स्थित एक घर में एक वर्ष की एक नहीं सी लड़की जिसका नाम माधुरी था , वह घुटनों के बल पूरे घर में घूमती और खड़े होने का अभ्यास करती हुई बार-बार गिर जाती थी। इसी घर में 8 मई 1975 में मैं दूल्हा बनकर आया था तब माधुरी 19 वर्ष की हो चुकी थी , वे मेरी अर्धांगिनी बनी।      ...

रंगीला राजस्थान

राजस्थान अंग्रेजों के ज़माने में राजपूताना कहलाता था क्योंकि इस क्षेत्र में अजमेर-मेरवाड़ा और भरतपुर को छोड़कर अन्य भूभाग पर राजपूतों की रियासतें थी. बारहवीं सदी के पूर्व यहाँ गुर्जरों का राज्य था इसलिए इस क्षेत्र को गुर्जरत्रा कहा जाता था. अजमेर-मेरवाड़ा अंग्रेजों के अधीन था जबकि भरतपुर में जाटों के. कुल मिलाकर छोटी-बड़ी 21 रियासतें थी जिन्हें स्वाधीन भारत में शामिल करना बेहद कठिन था क्योंकि अधिकतर राजा एकीकरण के पक्ष में नहीं थे, कुछ खुद-मुख्त्यारी चाहते थे तो कुछ पाकिस्तान में विलय चाहते थे. स्वाधीन भारत के तात्कालीन गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल और उनके सचिव वी. के. मेनन ने इस असंभव को संभव कर दिखाया और उसकी परिणिति बनी, भारतवर्ष का नूतन राज्य, राजस्थान, जो 30 मार्च 1949 को संवैधानिक रूप से गठित हुआ. राजस्थान की आकृति पतंगाकार है. इसके उत्तर में पाकिस्तान , पंजाब और हरियाणा , दक्षिण में मध्यप्रदेश और गुजरात , पूर्व में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश एवं पश्चिम में पाकिस्तान हैं. सिरोही से अलवर जाती हुई अरावली-पर्वत-श्रृंखला राज्य  को दो भागों में विभाजित करती है.  राजस्थान का...

म्हारो प्यारो राजस्थान

 ञ से खूब सारी बातें करने का सुख मिला. वहां से निवृत्त होकर हम तीनों सफारी के लिए निकले. वहां पहुंचकर एक जिप्सी मिली, उसमे बैठकर रेगिस्तान के छोटे से स्वरूप में प्रवेश कर गए. रेशम जैसी बारीक रेत का स्पर्श बेहद सुहावना लगा. सूर्यास्त होने वाला था, पहाड़ियों के पीछे से झांकती सूर्य की किरणें मन मोह रही थी. ऊंचे-नीचे रास्ते से होते हुए हम लोग एक काटेज में पहुंचे जहाँ हमारे लिए चाय आई. कुछ देर में एक सजा-धजा ऊंट सामने आकर खड़ा हो गया. अब उस पर सवार होकर घूमने जाना था. माधुरी जी ने उस पर पैर फैला कर चढ़ने का प्रयास किया, असफल रही. उनके बाद मैंने प्रयास किया, बन गया और थोड़ी दूर तक जाकर लौट आए. इस प्रकार रंग-रंगीले राजस्थान के एक छोटे से हिस्से का दौरा संपन्न हुआ. इस 'देस' का आतिथ्य सत्कार, खान-पान और मेहमान की आवभगत करने की कला बाकी देश को भी सीखना चाहिए. शेष बचे राजस्थान को देखने के लिए फिर आएंगे, अवश्य आएंगे. ==========