गुजरात का गुजरा
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(एक)
આ અમદાવાદ છે :
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अहमदाबाद गुजरात का सबसे बड़ा शहर है। अहमदाबाद को कर्णावती के नाम से भी जाना जाता है। अहमदाबाद का नाम सुल्तान अहमद शाह के नाम पर रखा गया है। अहमद शाह ने इस शहर की स्थापना 1411 ईसवी में की थी। ऐतिहासिक तौर पर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अहमदाबाद बहुचर्चित रहा है। यहाँ महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम की स्थापना की और स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े अनेक आन्दोलनों की शुरुआत भी यही से हुई थी। वर्तमान समय में अहमदाबाद को भारत के गुजरात के प्रमुख औद्योगिक शहर के रूप में जाना जाता है।
विगत चालीस वर्षों में मुझे चार बार अहमदाबाद जाने का अवसर मिला, हर बार मैंने इसे तनिक बदलते देखा, कुछ आधुनिक होता गया लेकिन गांधी नगर को यदि अलग शहर माना जाए तो चालीस वर्षों में जितनी प्रगति अहमदाबाद की होनी चाहिए, नहीं हुई। मुख्य सड़कें मुझे चकाचक दिखी लेकिन अंदरूनी शहर अभी भी पचास साल पीछे जी रहा है। अन्य शहरों की तरह यहाँ भी दो किस्म की ज़िंदगियाँ हैं, एक जो वैभव के समीप हैं और दूसरी जो वैभव से बहुत-बहुत दूर हैं। वैभव और अभाव की दूरी तो हमेशा से रही है लेकिन मेरी कल्पना थी कि मेरे इस प्रवास में 'वाइब्रेंट गुजरात' में ये दूरियाँ नज़दीकियों में अवश्य बदली हुई दिखेंगी लेकिन गुजरात भी शेष भारत की तरह ही है। कहने का मतलब यह है कि आँखें तब खोलो, जब सब ठीक दिख रहा हो और बाकी समय आँखें बंद रखो या यदि आँखें बंद न कर सको तो कम से कम 'देखना' बंद कर दो।
हमने बदलाव देखने के लिए सुबह का समय चुना। बड़ी सुबह मैं और मेरी पत्नी माधुरी पैदल निकल पड़ते थे और मुख्य सड़क के साथ-साथ गलियों में भी घुस कर अहमदाबादियों की 'गुड मार्निंग' झाँकते।
गांधीग्राम रेल्वे कालोनी में हम लोग अपनी भतीजी सुहानी मिश्रा शिवरायण के घर तीन दिनों तक रहे, वहाँ से जितना हम पैदल घूम सकते थे, देखा, कार में पसर कर जितना घूम सकते थे, देखा और एक आटो में बैठकर भी अहमदाबाद घूम-घूम कर देखा। अहमदाबाद का एक उपनगरी रेल्वेस्टेशन है- गांधीग्राम, जिसके प्लेटफार्म पर सुबह के समय एक पैसेंजर ट्रेन का आगमन हुआ है। सारे डिब्बे खाली पड़े हैं लेकिन यात्री उसमें घुसने के लिए बेचैन हैं। धक्कम-धुक्का और रेलम-पेल मची है। वैसे, प्रत्येक डिब्बे में दो द्वार होते हैं, एक 'एंटर' और दूसरा 'एक्ज़िट' लेकिन सम्पूर्ण भारतवर्ष में रेल्वे की इस व्यवस्था को 'ओवरलुक' कर दिया गया है। यात्री दोनों द्वार से घुसते हैं और दोनों से निकलते हैं। यदि किसी यात्री के पास सामान अधिक है, अमूमन अधिक ही रहता है, तो अन्य लोगों का घुसना और निकलना दोनों को मुश्किल बना देता है।
फिलहाल गांधीग्राम स्टेशन में खड़े यात्री डिब्बों में घुस गए, अपनी मनपसंद सीट पर बैठ गए और ट्रेन के रवाना होने का इंतज़ार कर रहे है। हम दोनों प्लेटफार्म के एक छोर से दूसरे छोर के लिए निकल गए। प्लेटफार्म में किसी ने 'पचीसा' खेलने के लिए स्थायी रेखांकन कर रखा है जो धूप और पानी से बेअसर है। लगता है, आसपास का बचपन रोज पचीसा खेलने आता है, अभी सुबह है, खिलाड़ी शायद सो रहे होंगे।
स्टेशन के बाहर दो-तीन ठेले खड़े हैं, उन्हें यहाँ के लोग 'लारी' कहते है। इन ठेलों में गुजराती नास्ता उपलब्ध नहीं है, हाँ, सेंडविच, इडली, डोसा, मस्का-बन आदि मिलता है। हमने पूछा- 'ढोकला और खमण मिलेगा ?'
'ना।' उसने हमारी ओर देखे बिना उत्तर दिया।
शहर अहमदाबाद में चाय के ठेले हर सौ मीटर की दूरी में गरम चाय उबालते मिलेंगे। लोगों का मजमा मिलेगा। एक चाय विक्रेता से मैंने पूछा- 'तुम्हारा ठेला है ?'
'नहीं, किराए का है।'
'किराए का, पर यह तो फुटपाथ है, बेजा कब्जा होगा, किराया कैसा ?
'यहाँ दूसरे की दूकान थी, उसने छोड़ा ताकि उसे किराया मिले।'
'अच्छा, कितना किराया देते हो ?'
'अढ़ाई हजार रुपया महीना।'
'अरे, इतना अधिक, वह भी बेजा कब्जा वाली जगह का ?'
'नहीं साहब, उसने मुझे जमी-जमाई दूकान दी है, इतना तो बनता है।' चाय वाले ने बताया। कुछ दूर आगे बढ़े तो हमें 'अमिताभ टी स्टाल' दिखा, वह भी फुटपाथिया था....अमिताभ बच्चन का असर अहमदाबाद के फुटपाथ से लेकर मुख्यमंत्री निवास तक है, भई, काम हो तो ऐसा, नाम हो तो ऐसा!
(दो)
महात्मा गांधी ने 25 मई 1915 को अहमदाबाद के कोचरब इलाके में एक आश्रम की स्थापना की जिसे 17 जून 1917 को अहमदाबाद की जीवनदायिनी साबरमती नदी के तीरे स्थानांतरित किया गया। इसे आरंभ में 'सत्याग्रह आश्रम' के नाम से जाना जाता था, बाद में 'हरिजन आश्रम' और अब 'गांधी आश्रम'। आज़ादी के पूर्व यह स्थान भारत की राजनीति का सक्रिय केंद्र था। यह आश्रम सन 1930 तक गांधीजी का निवास था। इसी आश्रम से ऐतिहासिक दांडी यात्रा आरंभ हुई थी तब उन्होंने शपथ ली थी कि वे तब तक यहाँ वापस नहीं आएंगे जब तक भारत स्वतंत्र नहीं होगा। तब से इस आश्रम का उपयोग हरिजन बालिकाओं को शिक्षित करने एवं अन्य रचनात्मक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए होता रहा।
इस प्रवास में गांधी आश्रम में प्रविष्ट होना और वहाँ की ऊर्जा को 'फील' करना मेरे लिए अविस्मरणीय बन गया। मैंने वहाँ बैठकर उस व्यक्ति का स्मरण किया जिसने अपना जीवन स्वयं के लिए नहीं, देशवासियों के शुभ के लिए अर्पित कर दिया। उस भूमि को प्रणाम करते समय मेरा माथा उस चरण-रज के लिए तरस रहा था जहां बापू के कदम हुआ करते थे। मुझे वहाँ सर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म 'गांधी' की याद आई, मैंने गिरिराज किशोर के उपन्यास 'पहला गिरमिटिया' को याद किया, 'गांधी वाङ्ग्मय' का स्मरण हो आया और एकबारगी मेरे मन-मस्तिष्क में वह सब तैर गया जो कुछ मैं उन्हें समझ पाया था। बहुत रोया। मैं धन्य हो गया।
वहाँ हमें ज़न्ठना बहन मिली जो समर्पित भाव से आश्रम में रहती हैं, बैठकर आधुनिक चरखे से सूत कातती हैं। उन्होंने धैर्य के साथ हम दोनों को सूत कातना सिखाया। आश्रम के बगल में बहती साबरमती नदी का वह जल बह चुका जिसने गांधी जी को साक्षात देखा था, फिर भी, नदी का प्रवाहवान जल बड़े गर्व से घोषणा करता है कि उसके पूर्वज कभी उस महात्मा के चरण धोते थे।
गुजरात की धरती ने एक अद्भुत प्रयोगधर्मी गुजराती को जन्म दिया था जिसके 'होने' और 'करने' पर आगामी पीढ़ियां निश्चयतः विस्मय करेंगी।
(तीन)
गाँधी आश्रम से लगभग दस किलोमीटर दूर सुघड़ में एक मनोहारी केंद्र है- 'पर्यावर्णीय स्वच्छता संस्थान' जिसकी स्थापना ईश्वर भाई पटेल ने की थी। 13 सितंबर 1934 को जन्मे ईश्वर भाई को उनके अद्भुत कार्यों की सम्मानार्थ 'पद्म श्री' से अलंकृत किया गया था। स्वच्छता को अपने जीवन का परम कर्तव्य मानने वाले इस संत ने जन जागरण के माध्यम से गुजरात के गाँव-गाँव में लोगों को शिक्षित किया और उन्हें सफाई के महत्व से जोड़ा। यद्यपि ईश्वर भाई अब न रहे लेकिन संस्थान में आज भी सफाई की दिशा में शिक्षण और प्रशिक्षण का कार्य बखूबी चल रहा है। संस्थान परिसर में महात्मा गाँधी की आत्मिक उपस्थिति सर्वत्र व्याप्त है। सम्पूर्ण परिसर अत्यंत मनमोहक और ज्ञानवर्धक है।
जिस दिन हम वहाँ गए, गुजरात के विभिन्न गांवों से आई आँगन बाड़ी कार्यकर्ता प्रशिक्षण के लिए विगत पाँच दिनों से आई हुई थी। उनके आवास की सुविधाजनक व्यवस्था देखने लायक है। उसी समय, वहाँ का भोजन काल था, हम सब ने उनके साथ बैठकर लहसुन-प्याज रहित स्वादिष्ट गुजराती भोजन का आनंद लिया, वह भी निःशुल्क !
सबसे अधिक ज़ोर शौचालयों के निर्माण के लिए है। परिसर में अनेक प्रकार के शौचालयों की अनुकृतियाँ बनाई गई हैं ताकि दर्शक उनके निर्माण व कार्यविधि को आसानी से समझ सकें। आज भी अनेक समर्पित कार्यकर्ता सांसारिक मोह-माया त्याग कर देवेंद्र भाई के मार्गदर्शन में सतत प्रयत्नशील हैं और गुजरात में पर्यावर्णीय स्वच्छता के प्रचार-प्रसार के लिए निःस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं।
अहमदाबाद में एक खूबसूरत काँकरिया झील है जिसका निर्माण कुतुब-उ-द्दीन ने 1451 ईस्वी में कराया था। इस झील के चारों ओर बगीचा है और मध्य में द्वीप महल है, जहां मुगलकाल के दौरान नूरजहां और जहांगीर घूमने आया करते थे। आज यह सैलानियों के घूमने और मस्ती करने की जगह है। अहमदाबाद में हाथीसिंह जैन मंदिर भी है जिसकी सजावट व पत्थर पर नक्काशी अनुपम है। इस मंदिर का निर्माण 19 वीं शताब्दी में रिचजन मर्चेंट ने किया था और उन्होंने वह मंदिर जैनों के 15 वें गुरु धर्मनाथ को समर्पित किया था। अहमदाबाद में एक अहमदशाह मस्जिद है जिसे जामा मस्जिद कहा जाता है जिसका निर्माण 1414 ईस्वी में किया गया था। यह मस्जिद उस युग की बेहतरीन कारीगरी का नायाब नमूना है। किसी मस्जिद में प्रवेश करने का हमारा प्रथम सुअवसर था। यह स्थान हृदय को सुख देने वाली शांति और ऊर्जा से ओतप्रोत लगा। जब हम दोनों वहाँ पहुंचे, शाम के समय था, लोग इबादत के लिए आ रहे थे और वज्रासन जैसी मुद्रा में बैठकर अमूर्त की आराधना कर रहे थे। इबादत के लिए मस्जिद में आने के पहले वे अपने हाथ, पैर और चेहरा भली-भांति धो रहे थे। पानी के नल के सामने बैठने की जगह इस तरह बनाई गई थी ताकि सुविधाजनक ढंग से हाथ-पैर धोये जा सकें। वहीं पर एक बड़ा सा गोलाकार पानी से भरा कुंड था जिसमें कुछ लोग मस्जिद जाने के पहले कुल्ला कर रहे थे। वे मुंह में भरा पान और गुटका पानी में उगलते और फिर उसी पानी को लेकर कुल्ला कर लेते जिसे देखकर मेरा जी मितला गया। धार्मिक स्थलों में मनुष्य की आस्था से जुड़ा पवित्रता का भाव होता है लेकिन वह स्वच्छ और शुद्ध भी तो होना चाहिए।
मुझे अपने इलाहाबाद के पिछले प्रवास का स्मरण हो आया। सुबह-सुबह हम लोग गंगा-स्नान के लिए निकले। आटो और नाव वाले से चिक-चिक करते हुए किसी प्रकार संगम पहुंचे। संगम में स्नान का पुरातन महत्व है, कहते हैं कि गंगा नदी के पवित्र जल में स्नान करना सौभाग्य की बात है, मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं। मैंने वहाँ गंगाजल की जो दुर्दशा देखी, मैं स्तब्ध रहा गया। मन को बहुत तैयार करने के बाद भी उस जल में प्रवेश करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। न मैं अपना शरीर निर्मल कर पाया और न अपने पाप (?) धो पाया। मेरे ऊपर एक पाप और चढ़ गया कि मैंने उस दिन गंगाजी के जल का अनादर कर दिया। बिलकुल यही हाल बनारस की गंगा नदी का था। हम भारतीयों में पवित्रता का जितना भाव है उतना स्वच्छता और शुद्धता को बनाए रखने का भी हो जाए तो निर्मल आनंद की प्राप्ति हो सकती है।
अहमदाबाद में एक नदी थी जिसका नाम था साबरमती, अब वह केवल नदी न रही। वर्षा ऋतु में नदी होती है लेकिन शेष ऋतुओं में सागर जैसी हो जाती है, ठहरा हुआ सागर जिसमें लहरें नहीं हैं, हिलोरे हैं। यह नदी अब साल भर जल से परिपूर्ण रहती है, बेहद खूबसूरत नज़ारा रहता है। नदी के दोनों व्यवस्थित किनारे प्रबंधन के वैज्ञानिक और दूरदर्शी सोच का परिचय देते हुए मुस्कुराते हैं। खास तौर रात के अंधेरे में नगर की अट्टालिकाओं से निकलती रोशनी का प्रतिबिंब जब जल पर उभरता है तो देखने वालों की नज़रें वही ठहर जाती हैं। शानदार।
(चार)
अहमदाबाद में हम दोनों तीन दिन रुके और तीन ऐसे लोगों से मिले जिनके बारे में जानकार आपको भी अच्छा लगेगा। अपनी बात शुरू करता हूँ उदय भाई से। उदयसिंह जाधव आटो चलाते हैं। उनकी आटो में संगीत तो बजता ही है, गर्मी से बचने के लिए पंखा है, न्यूज़ पेपर लाइब्रेरी है, पेय जल का कन्टेनर है, नास्ते के लिए फरसाण रहता है, डस्टबिन भी है। हमारे आटो में बैठने के पहले उन्होंने हमें दो 'बैज' दिए, दिल के, जो वे अपनी आटो में बैठने वाले प्रत्येक यात्री को देते हैं। मज़े की बात यह है कि उनकी आटो में मीटर नहीं है, वे अपने ग्राहकों से किराये की बात नहीं करते और न ही किराया मांगते। आप न दें तो भी कोई उज्र नहीं, यदि देना चाहते हैं तो वे आपको एक लिफाफा दे देंगे, आप जो उचित समझे, उसमें भर दें, वे चुपचाप रख लेंगे और आपको प्रणाम करेंगे। लिफाफे तीन हैं, एक हिन्दी भाषा का, दूसरा गुजराती और तीसरा अंग्रेजी में। उसमें लिखा हुआ है- 'दिल से दें।' मैंने उदय भाई से पूछा- 'दिल से कैसे दें, पैसे तो जेब में रहते हैं ?'
'बिलकुल यही बात मुझसे महेंद्र सिंह धोनी ने भी पूछी थी।' वे हंसते हुए बोले।
'ऐसा क्या ?'
'जी, मैंने उनको कहा- 'दूसरे आटो वालों को जेब वाला पैसा पसंद आता है, मुझे तो दिल वाला पैसा चाहिए।'
'इस दिलदारी में घर का खर्च चल जाता है ?'
'हाँ अंकल जी, बीस साल से आटो चला रहा हूँ, मेरा परिवार है, मैं बहुत मज़े में हूँ।'
'मान लो, किसी ने पैसे नहीं दिये या लिफाफे में कम दिए तो ?'
'तो भी मेरा दिल खुश हो जाता है क्योंकि मैं यह आटो पेट भरने के लिए नहीं चलाता।'
'फिर किसलिए चलाते हो ?'
'खुशी के लिए, अपनी खुशी के लिए, सबकी खुशी के लिए। अगर किसी को मैं 'फ्री' में घुमाया और उसे खुशी दे पाया तो मेरा जीवन सफल हो गया।' उदय भाई बोले। हम उन टोपीधारी उदय भाई के साथ तीन घंटे रहे, पूरे समय वे हमको अहमदाबाद के बारे में बताते रहे, पूरा शहर हमें घुमाया और हर समय मस्ती में मटकते रहे, गुनगुनाते रहे। अमिताभ बच्चन भी उनके आटो में घूम चुके हैं और उनके घर भी गए थे। धन की अंधी दौड़ में पागल दुनिया के लिए इन ज़िंदादिल उदय भाई का जज़्बा गौर करने लायक है। आप कभी अहमदाबाद जाएँ तो उन्हें बुला लें, वे आपको लेने स्टेशन भी आ सकते हैं। उनका मोबाइल नंबर नोट कर लीजिए : 09428017326॰ उन्हें मेरे बारे में भी बताइएगा, 'बिलासपुर वाले द्वारिका भाई।' उनसे मैं प्यार का अपना 'कमीशन' वसूल करूंगा।
मधुसूदन प्यारा नाम है, इस प्यारे नाम से हमारी भेंट अहमदाबाद में हुई। रायगढ़ (छत्तीसगढ़) में जन्मे मधुसूदन अग्रवाल ने रायपुर के राजकुमार कालेज में आरंभिक शिक्षा ली, उसके बाद बी॰काम॰ करने दिल्ली में तीन साल रहे और वहाँ से अमेरिका चले गए, जहां उन्होंने 'मीडिया और फिल्म मेकिंग' का कोर्स किया। पढ़ाई के दौरान कुछ ऐसी लघु फिल्में बनाई जो अमेरिका में बहुत चर्चित हुई। पाँच वर्ष अमेरिका में बिताकर अपने घर लौटे, उनके पिता अक्षय अग्रवाल अब बिलासपुर में व्यापार करते हैं। मधुसूदन का ब्याह हुआ, कुछ दिन अपने पिता की 'श्री राम टायर्स' में बैठे, ऊब गए, एक दिन पिता से कहा- 'मेरा पैसे कमाने में दिल नहीं लगता, आपको अच्छा लगता है, आप करो। मैं आपकी दूकान में बैठा तो मुनाफा होना दूर, नुकसान होना शुरू हो जाएगा।'
'तो क्या करोगे ?' पिता ने पूछा।
'पता नहीं, कोई दिशा नहीं लेकिन लक्ष्य स्पष्ट है, मैं जीवन में खुशी खोजना चाहता हूँ।'
'कहाँ मिलेगी ?'
'जब खोजूंगा तब तो मिलेगी ! मुझे आप मुक्त कर दीजिए।' मधुसूदन ने कहा। पिता सामान्य व्यापारी हैं, समर्थ हैं लेकिन पुत्र की बात न समझ पाए। मधुसूदन ने बताया- 'मैं उनको कुछ समझा नहीं पा रहा था, वे भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे। उन्होंने कहा- 'ठीक है, तुमको जिसमें खुशी मिले, जो अच्छा लगता है करो।'
पुत्र अहमदाबाद पहुँच गए और महात्मा गांधी के विचारों की शरण में चले गए। वहाँ से उन्हें 'पर्यावर्णीय स्वच्छता संस्थान' से जुडने का अवसर मिला। मधुसूदन कहते हैं- 'कोई काम छोटा नहीं होता। वह हर एक काम जो दूसरों को खुशी देता हो, उससे जुड़ना चाहिए।'
'जैसे ?' मैंने पूछा।
'जैसे बच्चों के लिए कार्य करना, रोगियों की मदद करना, लोगों को स्वच्छता की भावना से जोड़ना।'
'इन कामों के लिए धन चाहिए, कहाँ से आएगा ?'
'फंड? काम शुरू हो जाए तो साधन अपने-आप बनने लगते हैं। मदर टेरीसा ने सेवा के बड़े लक्ष्य कभी नहीं बनाए, वे जनकल्याण का काम सेवा की भावना से करती रही, काम बढ़ता गया और उसकी व्यवस्था भी होती गई।'
'अभी किस दिशा में काम कर रहे हो, फिल्म बनाते हो क्या ?'
'जिसे आप 'फिल्म' समझते हैं, वह नहीं बनाता। मैंने उस काम को सीखा, पढ़ाई के दौरान फिल्में बनाई पर फिल्म बनाना मुझे खुशी नहीं देता।'
'फिर ?'
'छोटे-छोटे काम हाथ में लेता हूँ, सेवा में लगे अन्य लोगों से जुड़ता हूँ, जैसे अभी 'पर्यावर्णीय स्वच्छता संस्थान' से जुड़ा हुआ हूँ। ये संस्थान गुजरात के गाँव-गाँव में सफाई के प्रति जागरूकता लाने का बढ़िया काम कर रहे हैं। जहां आने-जाने के साधन नहीं हैं, वहाँ भी कार्यकर्ता मीलों पैदल चलकर पहुँचते हैं, ग्रामीणों को जोड़ते हैं और उनके साथ रहते भी हैं।'
'कैसे ?'
'इनसे मिलिए, मुस्तू खान हैं ये, सुदूर अंचल के एक गाँव में बारह किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचे और स्वच्छता का व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए अपनी पत्नी के साथ वहीं रहने लगे। गाँव के लोग इनके रहने और भोजन की व्यवस्था करते हैं। महीनों बीत चुके हैं, वहीं काम कर रहे हैं। कोई आर्थिक लाभ नहीं, कोई लालच नहीं। बस, ग्रामीणों को बदलता देख उन्हें खुशी होती है, उसी खुशी के लिए दोनों समर्पित हैं।'
'यह तो अद्भुत है, यह पागलपन नहीं है क्या ?'
'अंकल, आपने ठीक कहा। ये पागलपन ही है। मैं अन्ना हज़ारे से मिला था, उन्होंने मुझसे कहा था- आधा पागल बनने से काम नहीं चलेगा, पूरा पागल बनो।'
'अब क्या हाल है, आधे हो या पूरे ?'
'पूरा होने का प्रयास चल रहा है।'
'इस प्रकल्प में कब तक रहोगे ?'
'अभी मुझे यहाँ अच्छा लग रहा, खुशी मिल रही है। यहाँ हमेशा के लिए नहीं आया हूँ, जब तक अच्छा लगेगा, रहूंगा।'
'शादीशुदा हो, एक बच्ची के पिता हो, तुम्हें उनसे असुविधा नहीं होती ?
'नहीं, असुविधा होती तो मैं यहाँ कैसे रहता ? मैं अपने और सबके जीवन में खुशियों के मौके खोजता हूँ।'
'इस जीवन शैली से खुद में क्या बदलाव आ रहा है ?'
'अब मुझसे धीरे-धीरे सब छूटते जा रहा है। पढ़ने का शौक रहा है, अच्छी ख़ासी लाइब्रेरी है, उसे भी मैं खाली कर रहा हूँ, सबको 'गिफ्ट' देकर। गिफ्ट मिलने से लेने वाले को जितनी खुशी होती है उतनी देने में भी होती है, आजकल उसी को 'एंजॉय' कर रहा हूँ।'
ऐसे मधुसूदन अग्रवाल से मिलकर हम दोनों का मन प्रसन्न हो गया। उसे देखकर हमें अपने पुत्र कुंतल की याद आती रही, वह दिखता भी उसी के जैसा है, बोलता भी उसी के जैसा है और कार्यक्षेत्र भले ही अलग है, करता भी उसी के जैसा है। नई पीढ़ी के लिए ये लोग अथाह समुद्र के मध्य स्थापित प्रकाशस्तम्भ हैं।
सुहानी एक लड़की का नाम है, सुहानी एक औरत का नाम है और सुहानी एक व्यक्तित्व का भी नाम है। सुहानी उस व्यक्ति की लड़की है जो मेरा अभिन्न मित्र थे- रमाकांत मिश्रा जो अब नहीं रहे। मेरा उनका दुख-सुख का साथ था। न जाने कब उनसे पहचान हुई, कैसे मित्रता स्थापित हुई और कैसे वह पक्की दोस्ती में बदल गई, मुझे नहीं मालूम। मैं उनके बारे में कितना बताऊँ, एक उपन्यास लिखना पड़ेगा। सच में, वे यारों के यार थे। रमाकांत मिश्रा जिनका चलित नाम था- राजा, बचपन में ही पिता विहीन हो गए, पीछे बड़ा परिवार और उसकी ज़िम्मेदारी छोड़ गए। पढ़ाई छोडकर मास्टरी की, बाद में स्टेट बैंक में लग गए। भाई-बहनों को पाला, पढ़ाया और व्यवस्थित किया। इस चक्कर में अनब्याहे रह गए। मेरा पक्का अनुमान है कि उन्होंने चुपचाप क्रिकेट के साथ सात भांवरे घूम ली थी। उम्र अधिक हो चली थी, ब्याह मुश्किल हो चला था, अनायास उन्हें हमारी भाभीजी मन भा गई और अपनी कान्यकुब्जियत को दांव लगाकर उनसे ब्याह कर लिया। उनके तीन बच्चे हुए, जिनमें उनकी प्रथम संतान थी- सुहानी।
जब सुहानी पढ़ाई कर रही थी, उसने प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना देखा। बिलासपुर में उपलब्ध मार्गदर्शन लिया लेकिन उस प्रतिस्पर्धा के लिए दिल्ली जाकर कोचिंग लेना आवश्यक था। राजा उसे शहर से बाहर भेज कर पढ़ाने के लिए तैयार न थे इसलिए सुहानी स्थानीय सी॰एम॰डी॰ कालेज में भूगोल पढ़ाने लगी। कुछ ऐसी परिस्थिति बनी कि सुहानी की छोटी बहन खुशबू को कंप्यूटर ग्राफिक्स के अध्ययन के लिए मुंबई भेजना पड़ा तो सुहानी के बाहर जाने का स्वाभाविक अधिकार बन गया। सुहानी दिल्ली गई और 'इंडियन सिविल सर्विस' की तैयारी में लग गई। प्रारम्भिक और लिखित परीक्षा में सफल होने बाद साक्षात्कार भी प्रभावशाली रहा, लेकिन जब परिणाम आए तो 'रैंक' पिछड़ गई और सुहानी का प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना टूट गया। प्रशासनिक सेवाओं के चयन में प्राथमिकता योग्यता पर नहीं, जन्म पर आधारित है परिणामस्वरूप उसे रेलवे प्रशासनिक सेवा से ही संतोष करना पड़ा।
सुहानी मिश्रा शिवरायण की पहली पोस्टिंग बड़ौदा में, फिर मुंबई में, फिर अहमदाबाद में, फिर रतलाम में डिवीज़नल ऑपरेटिंग मैनेजर के पद पर रही, अब पदोन्नत होकर अहमदाबाद में वरिष्ठ अधिकारी हो गई है। जब मिलती, कहती- 'चाचाजी, आप लोग घूमने आइये।' संयोग से 2 अगस्त 2015 को ईशा योग के 'सत्संग' कार्यक्रम करने के लिए माधुरी जी को आश्रम से आदेश मिला तो मैं भी उनके साथ में लग गया। हमारी प्यारी बिटिया ने हमें अहमदाबाद दिखाया और अत्यंत आत्मीयता के साथ अपने घर में रखा।
अपने सामने हमने सुहानी को बड़ा होते देखा, फिर और बड़ा होते देखा फिर आज की स्थिति में देखा। काश, सुहानी के पापा अपने जीते-जी अपनी इस सुहानी को देख पाते। हाँ, मैंने उसी नज़र से सुहानी को देखा जिस तरह से अभिभूत होकर मेरे दोस्त राजा देखते। जेहि सुख परम अनूपा।
જય શ્રી દ્વારકાધીશ જી :
(एक)
मैं अभी भी बहुत 'कन्फ़्यूज्ड' हूँ कि मैं भगवान को मानता हूँ या नहीं। अब इस बुढ़ापे में समझ आ जाता तो जगत-प्रयाण के पूर्व मेरी दुविधा समाप्त हो जाती। अब मैं पूजा-पाठ नहीं करता, दुख में भी उसे याद नहीं करता और सुख में तो याद करने का सवाल नहीं उठता। भगवान मेरे लिए उस पावर वाले चश्मे की तरह है जो जरूरतन पहनने पर उपयोगी है अन्यथा मुश्किल पैदा करता है। वैसे, मैंने अपने किशोर और युवावस्था में धार्मिक पुस्तकें पढ़ी, रामचरित मानस का पाठ किया, पूजा की, यज्ञ किया, जप किया, कीर्तन-भजन किया; कहने का तात्पर्य यह है कि आम हिंदुओं के घर जो संस्कार दिए जाते हैं, मेरी भी प्रचलित धार्मिक प्रभाव और स्वभाव से नज़दीकी रही है, बहुत रही लेकिन अपने जीवन में मैंने जो देखा और समझा, उससे यह निष्कर्ष निकला कि भगवान के बिना भी काम चल सकता है।
भगवान के 'होने या न होने' के बारे में कुछ कहने लायक बुद्धि मेरे पास नहीं है लेकिन यह सत्य है कि उनकी मदद के बिना भी मेरी गाड़ी ठीक चल रही है। वैसे भी, भगवान की देखरेख के लिए इतनी बड़ी सृष्टि है, बहुत काम होंगे उनके पास, कहाँ तक वे एक-एक को देखेंगे ? मैंने स्वयं को उनकी देखरेख से अलग कर लिया है इसके बावजूद अगर वे मुझ पर नज़र रख रहें हैं तो निश्चयतः वे अपने काम का बोझ बढ़ा रहे हैं।
एक बार की बात है, मैं लार्सेन एंड टूब्रो के हिरमी स्थित सीमेंट संयंत्र में तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम कर रहा था। प्रशिक्षण के दौरान एक प्रतिभागी ने मुझसे प्रश्न पूछा- 'सर, क्या आप भगवान को मानते हैं ?'
'इसका उत्तर मैं क्या दूँ ?' मैंने उन्हीं से पूछ लिया.
'मानते हो तो हाँ बोलिए, न मानते हो ना बोलिए.' प्रशिक्षु ने कहा लेकिन मैं चुप रहा। जब मैं कोई जवाब न दे सका तो उन्होंने एक नया प्रश्न मुझ पर फेंका- 'अच्छा यह बताइये, आप अपने घर में भगवान की पूजा करते हैं या नहीं?'
'हाँ, करता हूँ.' मैंने कहा.
'इसका मतलब साफ़ है कि आप भगवान को मानते हैं.'
'न, न, पूजा करना और भगवान को मानना अलग-अलग बात है.'
'क्या मतलब ?'
'मेरे पूजा करने की वज़ह कुछ और है.'
'क्या है सर ?'
'हुआ यह, जब मेरे माता-पिता बिलासपुर वाला अपना घर छोड़कर रायपुर अपने बड़े बेटे के घर 'शिफ्ट' हो रहे थे तब उनके घर में स्थापित भगवान की मूर्तियाँ उन्होंने हमें दे दी ताकि उनकी नियमित पूजा होती रहे. उन मूर्तियों को हमारे घर में स्थापित कर दिया गया और मेरी पत्नी माधुरी उनकी पूजा किया करती थी. एक दिन माधुरी जी ने मुझसे कहा- "घर में भगवान विराजे हैं, तुम अगर सिर झुकाकर प्रणाम कर लोगे तो क्या तुम्हारी इज्ज़त चली जाएगी ?"
"ऐसा नहीं है, पर तुम जानती हो मेरा पूजा-पाठ पर से विश्वास उठ चुका है, यह सब अब मुझसे नहीं होता."
"ठीक है, लेकिन यह तो सोचो, हमारे घर में भगवान प्रतिदिन पूजे जाने के लिए भेजे गए हैं लेकिन हर माह के चार दिन बिना पूजे रह जाते हैं ! क्या यह ठीक है ?" माधुरी जी ने मुझसे पूछा. मैं सोच-विचार में पड़ गया. उनकी बात में दम था. अगले दिन से प्रतिदिन मैं स्नान के बाद ज्ञात-विधि-विधान से भगवान की दिल लगाकर पूजा करने लगा. अन्त में शंख भी बजाता ताकि माधुरी जी घर में जहां कहीं हों, उन्हें मालूम पड़ जाए कि मैंने पूजा की !'
'आपने सही किया, सर.' प्रतिभागी ने कहा. 'आखिर आपको आपकी पत्नी ने भगवान से जोड़ दिया, वे कितनी समझदार हैं.'
'आप सही कह रहे हैं लेकिन वह पूजा मैं भगवान को प्रसन्न करने के लिए नहीं, अपनी पत्नी को खुश रखने के लिए करता हूँ.' मैंने उनको बताया।
(दो)
जब अहमदाबाद जाने का कार्यक्रम बन रहा था, माधुरी जी ने मुझसे कहा- 'द्वारका जी जाएंगे।'
'एक बार तो अपन हो आएं हैं, फिर से ?'
'उस बार उनके दर्शन ठीक से नहीं हुए थे। तुम कहीं भी जाते हो, इतनी हड़बड़ी मचाते हो कि कोई कैसे जी भर के देखे ?'
'ठीक है, फिर चलते हैं, इस बार जी भर कर दर्शन कर लेना।' मैंने कहा। इस प्रकार अहमदाबाद से द्वारका जी जाने का कार्यक्रम बना। 3 अगस्त 2015 की रात को हम लोग वहाँ पहुंचे, रात्रि विश्राम किया और सुबह टहलने निकले। विश्रामस्थल से मंदिर ढाई किलोमीटर दूर था इसलिए वहाँ स्नानादि के पश्चात जाना तय हुआ, कुछ दूर घूमने के लिए हम दोनों पैदल निकल गए। भारत के चार धामों में एक द्वारका जी के रेलवे स्टेशन से मंदिर तक पहुँचने का मार्ग चंद्रमा की भूमि जैसा मनोरंजक था। रास्ते में एक ठेला दिखा जिसमें चाय बन रही थी, चाय के गंज से भाप उठ रही थी, उसकी महक फैल रही थी, हम लोग वहीं रुक गए। चाय सुड़कने के बाद मैंने चाय विक्रेता से पूछा- 'क्या नाम है आपका ?'
'प्रकाश।'
'यहाँ कब से हो ?'
'मुझे यहाँ आए बीस साल हो गए।'
'इतने बड़े तीर्थ की सड़क का ये हाल है ?'
'क्या करें साहब ? कहते हैं कि तीन साल और लगेगा तब ये बढ़िया हो जाएगी।'
'तीन साल ? क्यों तीन साल क्यों लगेगा ?'
'अभी सीवरेज़ पाइप बिछाया गया है, फिर गेस का पाइप डाला जाएगा, उसके बाद बिजली की लाइन बिछेगी, जब सब हो जाएगा तब सड़क बनेगी।'
'तब तक ?'
'तब तक जो आप देख रहे हो, वैसा ही रहेगा।'
'मोदी जी आपके मुख्य मंत्री थे, अब प्रधान मंत्री हैं, फिर भी ये हाल है ?'
'क्या करेंगे मोदी जी ? मोदी ईमानदार हैं तो अकेले क्या कर लेंगे, नब्बे परसेंट तो साले चोर हैं। तीस करोड़ का काम होगा तो बीस करोड़ उनके जेब में चला जाएगा, दस करोड़ का काम होगा तो ऐसे ही टाइम लगेगा।' प्रकाश ने बताया। उसके चेहरे में काम न होने पीड़ा और देर-सबेर काम हो जाने की उम्मीद के भाव मिश्रित रूप से उभर रहे थे।
उस समय मुझे श्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी से सारनाथ तक जाने वाली सड़क की दुर्दशा की याद आ गई। राजधानियों में राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के आवास की आसपास की सड़कें दो दिन में बन जाती हैं, जिला मुख्यालयों में कमिश्नर और कलेक्टर के घर तक पहुँचने वाले मार्ग हर समय दुरुस्त और चमचमाते रहते हैं जबकि जनसाधारण के लिए बने आवागमन हेतु सड़कें इस कदर बदहाल हैं, वह भी द्वारका जी के मंदिर या सारनाथ के स्तूप तक जानेवाले महत्वपूर्ण मार्ग! पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयास और प्रचार करने वालों को क्या इतनी सी समझ नहीं है कि देश-विदेश से पहुंचनेवाले सैलानियों के मन पर इस असुविधा और दुर्दशा का क्या प्रभाव पड़ेगा ?
भक्ति व्यक्तिगत जुड़ाव है जबकि श्रद्धा व्यक्ति-मात्र से ऊपर उठकर व्यापक हो जाती है। जब किसी के प्रति श्रद्धा विकसित होती है तो भक्त अपनी भावना को जन-जन में प्रसारित करता है ताकि उसकी अनुभूति से और लोग भी जुड़ें।
इष्ट से जुड़ाव की प्रक्रिया शैशव काल से आरंभ हो जाती है। शिशु अपने माता-पिता को प्रार्थना स्थल में किसी के समक्ष झुकते देखता है तो वह स्वयमेव अपने मस्तिष्क में उसके प्रति आदर का भाव स्वीकार कर लेता है। माता-पिता अपने बच्चे को वहाँ झुकना सिखाते हैं, आदर करना सिखाते हैं, वही भाव सहजता से आगे बढ़ जाता है और उसी परिधि में सीमित हो जाता है। यह भावना समूह के हिसाब से विकसित होती है, जैसे हिंदुओं के हृदय में भगवान के प्रति, ईसाइयों में ईश्वर, मुस्लिमों में खुदा, सिक्खों में गुरु ग्रंथ साहब के प्रति, आदि। सभी सम्प्रदाय अपने समूह के व्यक्ति को इतनी दक्षता से जोड़ते हैं कि वह आजीवन उसी लक्ष्मणरेखा में सिमटकर रहे। यह तानाबाना अत्यंत चतुराई से इतना घना बुना जाता है कि पारदर्शी न हो. उसके उपरान्त अपने-अपने जाल और अपनी-अपनी दृष्टिबाधित मछलियाँ।
(तीन)
द्वारका भारत के पश्चिम में अरब सागर के तट पर बसा हुआ है जिसे प्राचीन मान्यता के अनुसार हजारों वर्ष पूर्व आदिपुरुष श्री कृष्ण ने बसाया था। जनश्रुति है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी उनके देहोत्सर्ग के पश्चात समुद्र में डूब गई थी। यह भारतवर्ष के चार धामों में से एक है इसलिए इस स्थान का धार्मिक महत्व है लेकिन इसके रहस्य भी कम नहीं हैं। वैज्ञानिक इसे महाभारतकालीन निर्माण नहीं मानते। सन 2005 में द्वारिका के रहस्य को जानने के लिए एक अभियान शुरू किया गया था जिसमें भारतीय नौसेना ने भी मदद की। अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए लेकिन आज तक यह तय नहीं हो पाया कि यह वही प्राचीन नगरी है अथवा नहीं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने बसाया था। आज भी वैज्ञानिक 'स्कूबा डायविंग' के जरिए सागर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे हैं।
अरब सागर और गोमती नदी के संगम स्थल श्री द्वारकाधीश का मंदिर है जो जगत मंदिर कहलाता है। इस मंदिर को यद्यपि 2500 वर्ष प्राचीन बताया जाता है लेकिन निर्माण व उसकी शैली को देखकर सहज अनुमान लगता है कि यह उतना पुराना तो नहीं है। पाँच-मंज़िला यह भव्य मंदिर आठ खंभों में टिका हुआ है जिसमें पाषाण कलाकारी के अनेक उदाहरण उत्कीर्ण हैं। सर्वाधिक आकर्षक है, मुख्य गर्भगृह में विराजित श्यामवर्णी श्री कृष्ण की सुशोभित मनमोहक चतुर्भुजी पाषाण मूर्ति जिसके दर्शन के लिए अनगिनत श्रद्धालु यहाँ दूर-सुदूर से आते है। वैसे यहाँ दर्शनार्थियों का समूह प्रतिदिन एकत्रित होता है लेकिन श्री कृष्ण जन्माष्टमी और होली के समय अपार जन-सागर उमड़ पड़ता है और सम्पूर्ण तीर्थ कृष्णमय हो जाता है।
स्टेशन से मंदिर पहुँचने का रास्ता खराब था लेकिन मंदिर के एक किलोमीटर पहले से और अधिक बर्बाद था। हमारी आटो पैंसठ वर्षीय बुजुर्ग चला रहे थे। उस ऊबड़खाबड़ रास्ते में में आटो चलाना बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन वे अपने काम में दक्ष थे। माधुरी जी ने पूछा- 'ऐसे खराब रास्ते में तो आपकी आटो भी खराब होती होगी ?'
'क्या करें, जैसी भी हालत हो, गाड़ी चलाना पड़ता है।' आटो चालक ने कहा।
'इस उम्र में इतनी मेहनत करते हैं ?'
'मेरा एक लड़का है, नौकरी पर बाहर है। मुझे उससे अपने लिए पैसा मांगना अच्छा नहीं लगता। इसी से मेरा खर्च चल जाता है और टाइम भी कट जाता है।' इतने में मंदिर आ गया। हम उतरे, अपना सामान 'लाकर' में रखवाया और 'चेकपोस्ट' पर जांच के पश्चात मंदिर के प्रांगण में प्रविष्ट हो गए।
अंदर भीड़ थी, दर्शन के लिए लोग पंक्तिबद्ध लेकिन बेसब्र खड़े थे। वह आरती का समय था इसलिए चहलपहल अधिक थी। वातावरण द्वारकाधीश की जयघोष से गुंजायमान था। लोग समूह में भजन गा रहे थे, नृत्यमग्न थे। हम भी अपनी-अपनी पंक्ति में खड़े हो गए। आधा घंटा बीता होगा, मैं द्वारकाधीश जी की प्रतिमा के समक्ष था। वहाँ रुकने की गुंजाइश ही नहीं थी, उनकी एक झलक दिखी और मेरे होश उड़ गए। आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। कुछ नहीं कह पाया, रोते हुए बाहर निकल गया, दर्शन हो गए।
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