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सुनो जी ये कलकत्ता है

सुनो जी ये कलकत्ता है
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(१) 
          फिल्म हावड़ा ब्रिज (1958) को आशा भोसले के गाए इस एक गीत ने यादगार बना दिया- 'आइए मेहरबान, बैठिए जान-ए-जान, शौक से लीजिए फिर, इश्क के इम्तिहान॰' इसी फिल्म में एक और गीत उन दिनों बेहद लोकप्रिय हुआ था जिसे मोहम्मद रफी ने गाया था-

'चौरंगी के चौक में देखो मतवाले बंगाली
रसगुल्ले सी मीठी बातें इनकी शान निराली,
कहीं मुखर्जी कहीं बनर्जी कहीं घोष कहीं दत्ता है,
सुनो जी ये कलकत्ता है॰
ईंट की दुक्की पान का इक्का, कहीं जोकर कहीं सत्ता है,
सुनो जी ये कलकत्ता है॰'

          घोड़े वाली बग्घियाँ अब गुम हो चुकी हैं, बंगालियों की भीड़ दिखाई नहीं पड़ती, यहाँ तक कि कलकत्ता भी लापता हो चुका, अब वहाँ कोलकाता नाम का महानगर है। देश भर से आए प्रवासियों का लहराता हुजूम जिसमें कुछ बंगाली भी हैं, जो पेट भरने या फिर जेब भरने की चाहत में कोलकाता की सड़कों पर भटक रहा है। भारत की इस पुरानी राजधानी कलकत्ता की रातें अब भी वैसी रंगीन है जैसी अंग्रेजों के समय थी लेकिन कोलकाता के दिन का उजाला वैसा ही कंगाल है जैसा देश की आज़ादी के समय था। कोलकाता में गगनचुंबी अट्टालिकाएँ हैं तो अनगिनत मुक्ताकाश बसेरे भी। जिसकी जेब गरम है वह गरीब को हिकारत से देखता है और जो कंगाल है वह अमीर को नफरत से देखता है। खाई दिन-ब-दिन चौड़ी होती जा रही है, न समाजवाद कुछ कर पाया, न साम्यवाद; अब पूंजीवाद अपने करतब दिखा रहा है। कोलकाता ठहाका मार कर हंस रहा है। 
          मुझसे बनारस को वाराणसी या बंबई को मुंबई या कलकत्ता को कोलकाता कहना जमता नहीं। हमारे पुत्र अब पैंतीस वर्ष के हो गए हैं लेकिन उनको बचपन से जिस नाम से पुकारते चले आए हैं, कम्मू, अब भी उसी नाम से पुकारते हैं तब मन को भला लगता है। तो, कोलकाता की जगह कलकत्ता का नाम चलाते हैं।
          थिम्फू से वापस लौटते समय ट्रेन कलकत्ता के एक उपनगरीय स्टेशन सियालदह में पहुंची तो ऐसा लगा जैसे किसी वीराने से निकालने के बाद अथाह जन-समुद्र की लहरों से साक्षात्कार हो गया हो। हमारी नातिन अनन्या ने रेल-यात्रियों की भीड़ को देखकर पूछा- 'नाना, क्या कलकत्ता में इतने सारे लोग रहते हैं ?'
'हाँ, यहाँ बहुत सारे लोग रहते हैं। बड़ा शहर है यह।' मैंने कहा।
'कलकत्ता हम क्यों आए हैं ?'
'मेरे दोस्त हैं यहाँ, उनसे मिलने आए हैं।'
'आपके दोस्त रहते हैं, बस ?'
'ऐसा नहीं है, यहाँ बहुत कुछ है, तुमको दिखाएंगे।'
'क्या दिखाएंगे ?'
'ट्राम दिखाएंगे, मेट्रो दिखाएंगे, चिड़ियाघर दिखाएंगे।'
'नाना, ये ट्राम क्या है ?'
'सड़क पर चलने वाली रेलगाड़ी।'
'तो सड़क पर टक्कर नहीं होती ?'
'नहीं, धीरे-धीरे चलती है।' मैंने समझाया। अनन्या के चेहरे पर विस्मय का भाव आया। इसके पहले कि वह अगला प्रश्न पूछे मैंने उसे चेताया- 'आनी, उंगली पकड़े रहना, गुम मत जाना, बहुत भीड़ है।' अनन्या ने मेरी उँगलियों को कस कर थाम लिया।
          हमारे मित्र चन्द्रशेखर जालान की कार स्टेशन के बाहर हमारा इंतज़ार कर रही थी। जालान जी साल्ट लेक सिटी में रहते हैं, उनके घर में गरम पूरी-कचौरी और जलेबी का नास्ता करने के बाद हम लोग रामकृष्ण आश्रम देखने के लिए चल पड़े। सवा बारह बजे वहाँ पहुंचे तो आश्रम का मुख्य द्वार चार घंटों के लिए बंद हो चुका था। निराश होकर वहाँ से वापस लौटे और बड़ा बाज़ार में पहुँच गए। माधुरी जी, उनके भाई और भाभी जी 'मार्केटिंग' में भिड़ गए, मैंने इधर-उधर देखा तो मुझे फुटपाथ पर एक वृद्ध ईंट पर पटा बिछाकर बैठे हुए दिखे जो किसी कटिंग या दाढ़ी बनवाने वाले ग्राहक को अगोर रहे थे। मैं उनके पास बैठ गया और उनसे बात करने लगा।
'दाढ़ी बनाने का कितना पैसा लेते हैं ?'
'बीस रुपया ?'
'हाँ, बीस रुपया जादा लगता है क्या ?'
'मुझे दाढ़ी नहीं बनवानी, मैं अपने हाथ से बनाता हूँ।' मैंने अपनी चिकनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा।
'तो फिर क्यों पूछ रहे हो ?' उसने चिढ़कर मुझसे पूछा।
'ऐसे ही, 'रेट' जानना चाहता हूँ।'
'कोई रेट नहीं है, कपड़ा देखकर रेट होता है।'
'क्या नाम है आपका ?'
'कोई नाम नहीं है।' अब वह 'डिफ़ेंसिव मूड' में आ गया था।
'नाम नहीं है, ऐसा कैसा हो सकता है ?'
'क्यों बताएं अपना नाम ?'
'नाम बताने में क्या हर्ज़ है ? अच्छा ये बताओ आपकी अम्मा क्या कह कर पुकारती थी ?'
'कुछ नहीं कहती थी।'
'अच्छा ये बताओ, कहाँ के रहने वाले हो ?'
'बनारस के।'
'बनारस में कहाँ ?'
'गोधौलिया में।'
'अच्छा, मैं बनारस गया था तो उसी मोहल्ले में रुका था और वहाँ के ठेले में बढ़िया आइसक्रीम खाई थी।' मेरा जवाब सुनकर उनके चेहरे का तनाव तनिक कम हुआ फिर शेविंग ब्रश को कटोरी में रखे हुए पानी में डुबाते हुए मुझसे कहा- 'बहुत बात कर लिए, अब बैठो, दाढ़ी बनवा लो।'
'पर मुझे दाढ़ी नहीं बनवानी, मैं तो आपसे केवल बात करने बैठ गया था।'
'सुबह के टैम खोपड़ी खा रहे हो, दो, कुछ पैसा ही दे दो।' उसने झल्लाकर कहा। मैं फुर्ती से उठा, उसकी फोटो अपने कैमरे में कैद की और वहाँ से भाग खड़ा हुआ।

(२)

          बड़ा बाज़ार सच में बड़ा है और बड़े लोगों का बाज़ार है। खरीददार ऐसे खरीदी करते हैं जैसे उनका पसंदीदा सामान कल मिले, न मिले। वहाँ सब मिलता है, बस, पर्स भरी हुई होनी चाहिए। चिलचिलाती धूप से तपते हुए कलकत्ता में महिलाओं से संबन्धित शृंगार-परिधान की खरीददारी ने शरीर और पर्स दोनों का वजन घटा दिया। शाम के समय हम लोग कालीघाट के लिए निकल पड़े। सब लोग काली माँ के दर्शन हेतु कार से उतरे और मंदिर चले गए लेकिन मैं कार में ही जमा रहा, थकान से बेचैन था, मेरा मंदिर जाने का मन नहीं हुआ।
          हमारी कार की अवैध पार्किंग के पीछे फुटपाथ पर एक कब्जा भी था जिसमें कुछ महिलाएं घरेलू काम कर रही थी, छोटे-छोटे बच्चे इधर-उधर डोल रहे थे। मन बहलाने के लिए मैं 40 वर्गफुट के उस अस्थाई निवास की ओर चल पड़ा। पचासवर्षीय एक महिला बैठी हुई सड़क की ओर देख रही थी, बीस वर्ष की एक लड़की बर्तन माँज रही थी, सोलह साल की लड़की आलू काट रही थी, इस दोनों से उम्र में बड़ी लड़की टेबल पर कपड़े तह कर रही थी। एक कागज बिछाकर मैं उनके पास बैठ गया। सबसे 'सीनियर' महिला से मैंने पूछा- 'यही घर है तुम्हारा ?'
'हाँ, अब यही है।'
'मतलब पहले कोई और था ?'
'पीछे जो बिल्डिंग बनी है, हम वहाँ रहते थे। हमको उठाकर बाहर फेंक दिया, तब से हम यहीं रहते हैं।'
'वहाँ कब से रह रहे थे ?'
'मेरी नानी बांग्लादेश से आई थी, उसने घर बनवाया था।'
'बांग्लादेश से ? तुम्हारी नानी के समय तो वह पूर्वी पाकिस्तान था ?'
'हाँ, पर अब हमको लोग बंगलादेशी कहते हैं।' बातचीत का छोर अब बीस वर्षीय लड़की ने सम्हाल लिया था जो अपनी मांग में सिंदूर भरे हुए थी और बेझिझक बात कर रही थी।
'तुम भी बांग्लादेशी हो क्या ?'
'अंकल, मेरा जन्म कलकत्ता हुआ, मेरी माँ का जन्म कलकत्ता में हुआ, हम बांग्लादेशी कैसे हुए ?'
'फिर तो तुम लोग हिन्दुस्तानी हो।'
'ठीक बोले आप।'
'तुम्हारी शादी हो गई ?'
'हो गई और खतम भी हो गई। यहीं के लड़के ने मेरे से शादी बनाया, ये दो बच्चे पैदा किया और कमीना भाग गया।' अब उसके बर्तन माँजते हाथ रुक गए थे, अपने एक हाथ को उठाकर उसने माथा पोछा और मेरी ओर उदास नज़रों से देखा।
'क्यों भाग गया ?'
'उसका मतलब निकल गया, भाग गया। वो डरपोक था, अपनी ज़िम्मेदारी नहीं उठाना चाहता था।'
'तुम लोग कितने भाई बहन हो ?'
'तीन बहन हैं, भाई नहीं है।'
'सौ दो सौ रुपया दो तो हमारा खाना बनेगा।'  टेबल पर कपड़े तह कर रही लड़की ऊंची आवाज़ में मुझसे बोली।
'अरे, तुम लोगों से बात करने बैठ गया तो क्या मुझे उसका रुपया देना होगा ?' मैंने पूछा।
'अंकल, आप उसकी बात मत सुनो, वह पागल है। आप अच्छे आदमी हो जो हमारे बगल से बैठकर इतनी बात कर रहे हो। दीगर लोग तो हमारी तरफ देखते तक नहीं है।' बर्तन माँजने वाली लड़की ने बात संभाली।
'तुम लोगों का घर कैसे चलता है ?'
'आसपास घरों का काम मिल जाता है, कभी मजदूरी कर लेते है, कभी सामने खड़ी कारों से किराया वसूल करते हैं। कई बार भीख भी मांगना पड़ता है।'
'अच्छा, तो मैं चलता हूँ।' मैंने अपनी पर्स निकाली, चार बच्चे आसपास थे, उनके हाथ में कुछ रुपए दिए और उनसे पूछा- 'यहाँ कहीं चाय मिलेगी ?'
'कोने में पुलिस थाना है, उसके बगल में।' लड़कियों की माँ ने बताया।
          चाय की दूकान खोजने के लिए मैं आगे बढ़ा तो रास्ते में खड़े पंडों ने मुझे घेरना शुरू किया- 'बाबू जी माँ के दर्शन करवा दें क्या ?'
उनसे पिंड छुड़ाते हुए चाय की दूकान पहुंचा, चाय पी और कुछ आगे बढ़ गया। पचास-पचपन साल का एक आदमी सिगड़ी में भुट्टा सेंक रहा था। मैंने उससे पूछा- 'क्या नाम है तुम्हारा ?'
'रामभरोस।'
'कहाँ के रहने वाले हो ?'
'बिहार।'
'यहाँ कब से हो ?'
'चालीस साल हो गए होंगे।'
'भुट्टा तो हर समय नहीं आता, फिर क्या बेचते हो ?'
'पाप कार्न बेचता हूँ।'
'कभी अपने गाँव जाते हो ? कितने बाल-बच्चे हैं ?'
'हर साल जाता हूँ, दो-तीन महीना रहता हूँ। चार बच्चे हैं, तीन लड़की, एक लड़का।'
'घरवाली यहीं रहती है या देस में ?'
'गाँव में रहती है, कभी-कभार यहाँ आ जाती है।'
'तुम्हारा घर कहाँ है ?'
'घर ? मेरा घर ? घर कहाँ है साहब, फुटपाथ पर सोता हूँ।'
'जब तुम्हारी घरवाली आती है तो कैसा करते हो ?'
'वह भी बगल में सो जाती है, हम लोग चादर ओढ़ लेते हैं।'
'ओह।'
'हाँ साहब, गरीब आदमी का क्या ? लुकना-छिपना बड़े आदमियों के चोचले है।' बोलते-बोलते वह हंस पड़ा।
'भुट्टा खाएँगे साहब ?' उसने पूछा।'
'भुट्टा खाता लेकिन मेरे पास भुट्टा खाने लायक दाँत नहीं है, क्या करूँ ?'
'कोई बात नहीं।'
'तुमसे बात करके मुझे बहुत अच्छा लगा।' मैंने कहा। रामभरोस मुझे देखकर मुस्कुरा दिया।

(३)

          मैं ऐसे अनेक व्यक्तियों को जानता हूँ जो अपनी मित्रता का नवीनीकरण करते रहते हैं और अपने मित्रों से सतत संपर्क बनाए रखते हैं। किसी जमाने में पोस्ट कार्ड मददगार हुआ करते थे, 'हेप्पी न्यू ईयर', 'हेप्पी दिवाली' 'हेप्पी बर्थडे' और 'हेप्पी एनिवर्सरी' के रंग-रंगीले कार्ड आपस में भेजे जाते थे, अब ये सब चलन से बाहर हो गए। फोन से संपर्क बनाना पहले कठिन था, ट्रंक-काल लगाओ, फिर फोन की तरफ घंटों देखते रहो, घंटी बजने की प्रतीक्षा करो। घंटों तक घंटी न बजे और बजे भी तो तब, जब आप संडास में बैठे हों। उसके बाद अपने देश में दूरसंचार की क्रान्ति आई और देश दुनिया से बात करना इतना आसान हो गया जैसे कलकत्ते के के॰सी॰दास का रसगुल्ला निगलना।
          कई लोग फोन से इस तरह चिपके रहते हैं जैसे नव-विवाहित युगल जबकि मैं फोन पर बात करने के मामले में परम आलसी हूँ। बहुत जरूरी होने पर मिनट-दो मिनट बात कर लेता हूँ, उसके बाद मेरा गला 'चोक' होने लगता है, विचार और शब्द खो जाते हैं। अपनी इस कमजोरी के चलते मेरी मित्रता का नवीनीकरण नहीं हो पाता और जिनके लिए मेरा दिल हमेशा धड़कता है, वे भी समय बीतने के साथ अपरिचित जैसे हो जाते हैं। इसलिए मैं जब कभी अपने शहर से बाहर निकलता हूँ तो उस शहर के अपने पुराने मित्रों से मिलने के लिए बहुत जतन करता हूँ। यह सोचकर उनसे मिलने जाता हूँ कि मेरी पारी समाप्ति घोषणा न जाने किस क्षण हो जाए, एक बार अपने दोस्त से मिल लिया जाए। इस बार कलकत्ता मैं अपने जिगरी यार चन्द्रशेखर जालान से मिलने के लिए गया जो मेरी ज़िंदगी में बहुत अहमियत रखने वाला दोस्त है। यारों का यार है।
          जब से मैं फेसबुकिया लेखक बना, भारत और विदेश के बहुत से लोगों से जान-पहचान हुई। इस समूह में विविध विशिष्टताओं वाले स्त्री-पुरुष मित्र बने, उनसे जुड़ कर मेरा ज्ञान बढ़ा, परिचय का दायरा भी बढ़ा। इस मित्र-समूह में बहुत से ऐसे लोग हैं जिनसे मेरा वैचारिक मतभेद है लेकिन तनिक भी मनभेद नहीं है। कई ऐसे हैं जो इतनी अच्छी समझ रखते हैं कि उनकी सकारात्मक सोच का मैं आशिक हूँ तो कुछ ऐसे भी हैं जिनकी बचकाना सोच पर तरस आता है फिर भी वे मेरे करीबी बने हुए हैं क्योंकि उन्हें नया रास्ता दिखाना भी तो हम मित्रों का दायित्व है। कुछ मुझसे नाराज़ हो जाते हैं क्योंकि मैं 'चैट' नहीं करता, अपना मोबाइल नंबर नहीं देता लेकिन क्या करूँ, शुरुआती असावधानी ने मुझे इतना सताया कि अब सतर्क हो गया हूँ।
          मेरे मित्रसमूह में सर्वाधिक संख्या उनकी है जो साहित्यकार हैं या साहित्यप्रेमी। साहित्यप्रेमियों से मेरे संबंध सर्वाधिक निकट के हैं, वैसा ही प्यार जैसा सगे भाई-बहन के मध्य होता है लेकिन 'साहित्यकारों' से संबंध बनाए रखना जरा कठिन कार्य है क्योंकि उनमें से कई लोग हर समय अहंकार के सिंहासन पर विराजमान रहते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो विद्वान हैं और विनीत भी। ऐसे ही नरम स्वभाव वाले व्यक्तित्व हैं कोलकाता के श्री अरुण माहेश्वरी जिन्होंने दो वर्ष पूर्व अपनी एक पुस्तक मुझे पढ़ने के लिए भेजी थी, 'एक और ब्रह्मांड'। यह आभासी मित्रता बहुत समय से चल रही है, मिल-बैठकर बात करने का मन होता रहा लेकिन बिलासपुर से कोलकाता की दूरी बाधक बन जाती। भूटान से लौटते समय इस बाधा को दूर करने का मौका मिला, मैंने कलकत्ता रुकने का कार्यक्रम बनाया और मैं अपने प्रवास की अगली सुबह दस बजे साल्ट-लेक-सिटी स्थित उनके आवास पर अपनी पत्नी माधुरी और नातिन अनन्या के साथ पहुँच गया।
          उनका घर खोजने में हमें आधे घंटे की देर हो गई, वे सपत्नीक हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने हमें आदरपूर्वक बिठाया और कुछ ही देर में शुद्ध घी की खुशबू कमरे में फैलने लगी। कुछ पल के पश्चात हम सब डायनिंग टेबल पर थे और हमारे सामने दाल-भरी-कचौड़ी, आलू की रसीली सब्जी, जलेबी और दही हाजिर था। नास्ते के बाद हम उनकी लाइब्रेरी में बैठे और अरुण माहेश्वरी जी और उनकी धर्मपत्नी सरला माहेश्वरी से चर्चा का लंबा दौर शुरू हुआ। मैं सरला जी की कविता से बहुत प्रभावित रहा हूँ इसलिए मैंने उनसे कविता सुनाने का अनुरोध किया। उन्होने हमें तीन कविताएं सुनाई और उनकी लिखी एक कविता मैंने उन्हें सुनाई। शायद ही किसी कवि के भाग्य में ऐसा अवसर आया हो कि उसकी कविता कोई उसे पढ़कर सुनाए।
          मेरी समझ में, अरुण जी जितने अच्छे विचारक-लेखक हैं, सरला जी उतनी अच्छी कवियित्री और गृहिणी है। मुझे यह बात मालूम थी कि सरला जी साम्यवादी दल की सक्रिय कार्यकर्ता रही हैं, बड़ाबाजार क्षेत्र से उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा था, दो बार राज्यसभा की सदस्य मनोनीत हो चुकी हैं लेकिन उनके सद्व्यवहार को देखकर मैं चकित था क्योंकि मैंने देखा है कि राजनीति में हल्की-फुल्की उपलब्धियां मनुष्य का दिमाग घुमा देती हैं लेकिन सरला जी 'यथा नाम तथा गुण' वाली हैं, सच में सरल।
          अरुण माहेश्वरी जी की लाइब्रेरी में विविध विषयों पर किताबें सजी हुई हैं, हर पुस्तक सूचीबद्ध है, व्यवस्थित है। जमीन से लेकर सीलिंग तक खड़ी आलमारियाँ पूरे कमरे को घेरे हुए हैं और वे आलमारियाँ अंग्रेजी, हिन्दी और बंगला पुस्तकों से समृद्ध हैं। संभवतः वे पुस्तकें ही अरुण जी की लेखनी की स्याही है, उनके विचारों का स्रोत हैं। माहेश्वरी दंपत्ति की पढ़ने की अभिरुचि देखकर मुझे समझ आया कि मनुष्य में लिखने, सोचने और बोलने का हुनर किताबों से होकर आता है। 

(४)

          मनुष्य को कहीं चैन नहीं है, घर में रहो तो बाहर निकलने का मन करता है और बाहर निकल जाओ तो घर वापस पहुँचने की जल्दी लग जाती है। भूटान और कोलकाता की आठ दिवसीय यात्रा के बाद घर की याद आने लगी। रात को आठ बजे की ट्रेन थी इसलिए शाम को साढ़े पाँच बजे हम लोग साल्टलेक सिटी से निकल पड़े ताकि कोलकाता की सड़कों की बेतहाशा भीड़ को चीरते हुए हम लोग समय पर स्टेशन पहुँच सकें। स्टेशन के रास्ते डलहौजी में इलाहाबाद बैंक की मुख्य शाखा में भी कुछ देर के लिए रुकना ज़रूरी था क्योंकि बैंक की कार्य अवधि समाप्त हो जाने के बाद भी मेरे कवि-मित्र राजेश्वर वशिष्ठ हमारी राह तक रहे थे। हम दोनों ने एक-दूसरे को बीकानेर उत्सव में देखा था, भाषण सुने थे लेकिन मुलाक़ात नहीं हुई थी।
          मैं जहां भी किसी समूह में जाता हूँ, लोग एक दूसरे से मिलने और बातचीत करने में बहुत संकोच किया करते हैं। सबसे बड़ी समस्या पहल करने की होती है जो साधारण सी समस्या पहाड़ जैसी कठिन बन जाती है। कार्यक्रम आयोजक अपनी कार्यसूची में 'मेल-जोल' के सत्र का उल्लेख अवश्य करते हैं लेकिन तीन-चार  दिनों तक साथ रहने के बावजूद लोग अपरिचित रह जाते हैं। बीकानेर और शिमला के साहित्य उत्सवों में हिन्दी साहित्य से जुड़े अनेक लेखक, कवि, चित्रकार और फोटोग्राफर एकत्रित हुए थे जो बाद में मेरे 'फेसबुक' मित्र बने और अब हम सब अफसोस करते हैं- 'लो, वहाँ मिलकर भी नहीं मिले !' ऐसे ही 'मिलकर भी नहीं मिले' वाली गफलत श्री राजेश्वर वशिष्ठ के साथ भी हुई थी। हम दोनों एक दूसरे से मिलने के लिए व्याकुल थे, उस व्याकुलता का अंत कोलकाता में हुआ, उनके खाली पड़े बैंक में, जहां हम दोनों जब एक दूसरे के गले मिले तो अपरिचय का पर्वत पिघलकर बह गया। दस मिनट की छोटी सी मुलाक़ात में बहुत कम बातें हुई लेकिन जो रह गई उसका अफसोस भी नहीं क्योंकि हम दोनों ने दिल ही दिल में आपस में बहुत कुछ कह-सुन लिया।

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