शिमला पर इमला
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(एक)
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में, जहां मैं रहता हूँ, साल भर में दो मौसम होते हैं- गर्मी और बहुत गर्मी। शिमला जाने के नाम से ही जी में हू-हू-हू-हू होने लगी इसलिए एक बैग भरकर इनर, स्वेटर, मफ़लर, मोजे जैसे ठंड से मुक़ाबला करने वाले वजनदार जिरह-बख्तर से लैस होकर 13 और 14 जून 2015 को शिमला में आयोजित 'कविता और कला उत्सव' में सम्मिलित होने के लिए मैं सपत्नीक निकल पड़ा। हमारे फेसबुक मित्र बीकानेरवासी अशोक गुप्ता गजब के 'शोमेन' हैं, अपने दोस्तों को उत्सव में बुलाने के लिए एक से एक उपाय करके ललचाते हैं और हम उनके चुम्बकीय आकर्षण में खिंचे चले जाते हैं।
इस ढलती उम्र में अब मुझसे अधिक ही गलतियाँ हो रही हैं, जैसे, मेरी मति मारी गई थी इसलिए मैंने आत्मकथा लिख मारी, मेरे जीवन के नौ साल खप गए, सिर्फ इसलिए कि जाते-जाते साहित्यकारों की जमात में शामिल हो जाऊँ ताकि मेरी शोकसभा में वक्ताओं के पास मेरे विषय में बोलने के लिए कुछ तो रहे।
मेरे पिता कहते थे- 'फायदा होशियारी बताने में नहीं है, मूर्ख बन जाने में है' इसलिए मैं उनके कहे पर आज भी चलता हूँ और मूर्ख बन कर फायदा उठाने की उनकी बात पर भरोसा करता हूँ। अब तो मैं घोषित मूर्ख सिद्ध हो चुका हूँ, घर-परिवार के लोग मेरे मूर्खतापूर्ण निर्णयों पर चटकारे लेकर बातें करते हैं। मेरी पत्नी और संतानें मेरे मुंह पर तो कुछ नहीं कहती लेकिन मेरे मूर्ख होने का भाव उनके मुखमंडल पर सदैव अंकित रहता है।
आत्मकथा लिखना कोई सरल काम नहीं, कपड़े उतार कर नंगा खड़ा होना पड़ता है, इसी चक्कर में कुछ और लोगों के भी कपड़े उतर जाते हैं परिणामस्वरूप आपसी सद्भाव कम हो जाता है। मुसीबत केवल यही नहीं है, उसे ढेर सारा धन देकर छपवाना पड़ता है, पुस्तक का विमोचन करवाना होता है, बंटवाना पड़ता है, पढ़वाना पड़ता है, समीक्षा लिखने के लिए लेखकों की चिरौरी करनी पड़ती है तब किताब की दूकानदारी शुरू होती है।
केवल किताब लिख लेने से कुछ नहीं होता, जब तक किसी गुट की 'गुडबुक' में अपना नाम न लिखवाओ, साहित्यिक गोष्ठियों में कोई बुलाता भी नहीं जबकि किताब प्रकाशित होने के बाद मेरा दिल साहित्यकार घोषित होने के लिए लालायित हो रहा था। उसी समय अशोक गुप्ता ने मुझे पहले बीकानेर के साहित्य उत्सव में प्रवेश का अवसर दिया पर उसमें मेरा काम उतना सिद्ध नहीं हुआ किन्तु उस भीड़ में मेरी उंगली घुस गई। उसके बाद अब जब शिमला उत्सव की खबर आई तो मुझे लगा कि इस बार शायद मेरा हाथ घुस जाए इसलिए मैं शिमला के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अपनी जेब से धन लगाकर मूर्ख बनने के लिए पुनः निकल पड़ा।
जब शिमला जाने का मन बन गया तो सबसे पहले मैंने अपनी पत्नी को मनाया। चार माह पूर्व ही उनके हृदय की 'बाय-पास सर्जरी' हुई थी, पहाड़ पर जाना उनके लिए असुविधाजनक हो सकता था लेकिन वे तैयार हो गई। मैंने सोचा कि कविता कला उत्सव में सब प्रतिभाशाली लोग एकत्रित होंगे तो वहाँ पर उनको देखइया-सुनइय्या भी लगेंगे तो अपने दो गैर-साहित्यिक मित्रों को सपत्नीक साथ चलने के लिए पटाया। इस प्रकार जब छः लोगों का समूह बन गया तो बहुत मारामारी के बाद आने-जाने का रेल्वे आरक्षण हुआ और जब अशोक गुप्ता को मैंने खबर की तो वे खुश होकर मुझसे बोले- 'आप शिमला आओ, मैं बीकानेर में आपका सम्मान नहीं कर पाया, शिमला में करूंगा, आप 'ग्रेट' हो सर।'
बिलासपुर से शिमला जाते समय तक चार 'विकेट' रास्ते में गिर गए, हम दो बचे और मैं और मेरी पत्नी माधुरी। हम एक दूसरे की देखरेख करते दिल्ली पहुँच गए और अपने फेसबुक मित्र सुबोधकुमार (दिल्ली) की देखरेख में शिमला के लिए रवाना हुए। Volvo बस के नाम से हिमांचल टूरिस्ट कार्पोरेशन ने हमें बेवकूफ बनाया, सारी रात सो न सके। सुबह छः बजे बस से थके-मांदे उतरे, निर्धारित होटल में पहुँचने बहुत दूर पैदल चले, बहुत ऊंचाई तक सीढ़ियों में चढ़े तब तक सात बज चुके थे। वहाँ के होटल हिमानी में हमारे रुकने की व्यवस्था थी किन्तु मैनेजर ने बताया- 'अभी रूम खाली नहीं है, 12 बजे से आपकी 'बुकिंग' है तब तक ऊपर छत में चले जाइए, इंतज़ार करिए।'
'एक-आध बाथरूम खुलवा दो मालिक, टट्टी-पेशाब कर लें।' मैंने कहा।
'सब रूम भरे है, कुछ नहीं हो सकता।'
'स्टाफ वाला बाथरूम दे दो भाई साहब।'
'ऐसा कोई बाथरूम नहीं है।' उसने बेरुखी से कहा।
हम अपना पेट साधते हुए छत पर पहुंचे तो देखा कि श्री लालित्य ललित, श्री प्रेम जनमेजय, श्री गोपीकृष्ण बूबना आदि सात-आठ हस्तियाँ 'वेटिंग लिस्ट' में खिसियानी हंसी बिखेरते खड़े थे और बारह बजने का इन्तजार कर रहे थे। हम पति-पत्नी वहीं छत पर वज्रासन में बैठ गए और प्राणायाम करने लगे ताकि हमारा ध्यान शरीर की उत्सर्जन क्रिया से हटकर शरीर की आंतरिक ऊर्जा की ओर मुड़ जाए।
आत्मकथा लिखना कोई सरल काम नहीं, कपड़े उतार कर नंगा खड़ा होना पड़ता है, इसी चक्कर में कुछ और लोगों के भी कपड़े उतर जाते हैं परिणामस्वरूप आपसी सद्भाव कम हो जाता है। मुसीबत केवल यही नहीं है, उसे ढेर सारा धन देकर छपवाना पड़ता है, पुस्तक का विमोचन करवाना होता है, बंटवाना पड़ता है, पढ़वाना पड़ता है, समीक्षा लिखने के लिए लेखकों की चिरौरी करनी पड़ती है तब किताब की दूकानदारी शुरू होती है।
केवल किताब लिख लेने से कुछ नहीं होता, जब तक किसी गुट की 'गुडबुक' में अपना नाम न लिखवाओ, साहित्यिक गोष्ठियों में कोई बुलाता भी नहीं जबकि किताब प्रकाशित होने के बाद मेरा दिल साहित्यकार घोषित होने के लिए लालायित हो रहा था। उसी समय अशोक गुप्ता ने मुझे पहले बीकानेर के साहित्य उत्सव में प्रवेश का अवसर दिया पर उसमें मेरा काम उतना सिद्ध नहीं हुआ किन्तु उस भीड़ में मेरी उंगली घुस गई। उसके बाद अब जब शिमला उत्सव की खबर आई तो मुझे लगा कि इस बार शायद मेरा हाथ घुस जाए इसलिए मैं शिमला के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए अपनी जेब से धन लगाकर मूर्ख बनने के लिए पुनः निकल पड़ा।
जब शिमला जाने का मन बन गया तो सबसे पहले मैंने अपनी पत्नी को मनाया। चार माह पूर्व ही उनके हृदय की 'बाय-पास सर्जरी' हुई थी, पहाड़ पर जाना उनके लिए असुविधाजनक हो सकता था लेकिन वे तैयार हो गई। मैंने सोचा कि कविता कला उत्सव में सब प्रतिभाशाली लोग एकत्रित होंगे तो वहाँ पर उनको देखइया-सुनइय्या भी लगेंगे तो अपने दो गैर-साहित्यिक मित्रों को सपत्नीक साथ चलने के लिए पटाया। इस प्रकार जब छः लोगों का समूह बन गया तो बहुत मारामारी के बाद आने-जाने का रेल्वे आरक्षण हुआ और जब अशोक गुप्ता को मैंने खबर की तो वे खुश होकर मुझसे बोले- 'आप शिमला आओ, मैं बीकानेर में आपका सम्मान नहीं कर पाया, शिमला में करूंगा, आप 'ग्रेट' हो सर।'
बिलासपुर से शिमला जाते समय तक चार 'विकेट' रास्ते में गिर गए, हम दो बचे और मैं और मेरी पत्नी माधुरी। हम एक दूसरे की देखरेख करते दिल्ली पहुँच गए और अपने फेसबुक मित्र सुबोधकुमार (दिल्ली) की देखरेख में शिमला के लिए रवाना हुए। Volvo बस के नाम से हिमांचल टूरिस्ट कार्पोरेशन ने हमें बेवकूफ बनाया, सारी रात सो न सके। सुबह छः बजे बस से थके-मांदे उतरे, निर्धारित होटल में पहुँचने बहुत दूर पैदल चले, बहुत ऊंचाई तक सीढ़ियों में चढ़े तब तक सात बज चुके थे। वहाँ के होटल हिमानी में हमारे रुकने की व्यवस्था थी किन्तु मैनेजर ने बताया- 'अभी रूम खाली नहीं है, 12 बजे से आपकी 'बुकिंग' है तब तक ऊपर छत में चले जाइए, इंतज़ार करिए।'
'एक-आध बाथरूम खुलवा दो मालिक, टट्टी-पेशाब कर लें।' मैंने कहा।
'सब रूम भरे है, कुछ नहीं हो सकता।'
'स्टाफ वाला बाथरूम दे दो भाई साहब।'
'ऐसा कोई बाथरूम नहीं है।' उसने बेरुखी से कहा।
हम अपना पेट साधते हुए छत पर पहुंचे तो देखा कि श्री लालित्य ललित, श्री प्रेम जनमेजय, श्री गोपीकृष्ण बूबना आदि सात-आठ हस्तियाँ 'वेटिंग लिस्ट' में खिसियानी हंसी बिखेरते खड़े थे और बारह बजने का इन्तजार कर रहे थे। हम पति-पत्नी वहीं छत पर वज्रासन में बैठ गए और प्राणायाम करने लगे ताकि हमारा ध्यान शरीर की उत्सर्जन क्रिया से हटकर शरीर की आंतरिक ऊर्जा की ओर मुड़ जाए।
लगभग एक घंटे में हम दोनों के दो प्राणायाम सम्पन्न हो गए, आँखें खुली तो देखा कि होटल के बेयरा एक ट्रे में सबको चाय बाँट रहे थे। हमने भी झपटकर ले ली। चाय पीते ही पेट में गुड़गुड़ाहट प्रबल हो गई, रहा-सहा नियंत्रण टूटने लगा, मैं पुनः काउंटर की ओर भागा तब ही बगल के कमरे से एक अंजान पुरुष दरवाजा खोलकर बाहर निकले, मैंने उन्हें समस्या बताई, उन्होंने हिचकते हुए अपने टायलेट के उपयोग की अनुमति दे दी तब कहीं जाकर हम दोनों के प्राण बचे।
उसी समय अचानक दूसरे कमरे से एक षोडशी बाहर निकली, उसने मुझे देखा, तेजी से मेरे करीब आई, चरण-स्पर्श किए और मुझसे पूछा- 'अंकल, कैसे हैं आप ?'
'वैसे ठीक हूँ लेकिन इस समय संकट में हूँ।' मैंने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा।
'क्या हुआ ?' उसके प्रश्न के उत्तर में मैंने अपनी दुर्दशा बताई तो वह बोली- 'मुझे दस मिनट का समय दीजिए, मैं आपकी व्यवस्था करवाती हूँ।'
सच में, दस मिनट के अंदर वह वापस आई और बोली- 'आपकी व्यवस्था दूसरे होटल 'ड्रीम व्यू' में अशोक गुप्ता जी ने कर दी है लेकिन होटल यहाँ से पंद्रह किलोमीटर दूर है !'
'चलेगा।' मैंने कहा।
'तो आप लोग नीचे चले जाइए, आपके लिए 'स्कार्पियो' खड़ी है।' उसने झुककर मुस्कुराते हुए कहा। मैंने उसे धन्यवाद दिया और मन-ही-मन आशीर्वाद दिया- 'इस बाला को 'आज्ञाकारी पति' मिले।'
मेरे मित्र सुबोध कुमार और अमृत सागर सहित हम लोग अपने नए ठिकाने के लिए निकल पड़े। नए ठीहे पर इंतजाम ठीक था। हम लोग शीघ्रता से तैयार हुए, अल्पाहार लिया और शिमला के प्रतिष्ठित सभागार 'गेयटी थियेटर' के लिए रवाना हो गए, जहां पर 'कला एवं कविता महोत्सव' आयोजित होने वाला था।
(दो)
मुझे शिमला का मौसम बहुत भाया, न गर्मी न ठंड, सम्यक और मनमोहक। स्कार्पियो के चालक ने बताया- 'सर, अंग्रेज़ बहुत होशियार थे।'
'कैसे ?' मैंने प्रश्न किया।
'उन्होंने दूसरी राजधानी के लिए शिमला को सोच-समझ कर चुना।'
'क्या सोचा ?'
'शिमला में गर्मी के दिनों में अच्छी ठंडक रहती है जबकि ठंड के दिनों बहुत कम ठंडक रहती है।'
'ऐसा कैसे हो सकता है कि ठंड के दिनों कम ठंडक हो ?'
'सर, ठंड में बर्फबारी होती है, जबर्दस्त।'
'वही तो ?'
'जब बर्फबारी होती है तब ठंड कम हो जाती है।'
'ऐसा क्या ?'
'यस सर।' वह अपनी विद्वता पर खुश था और और मैं उसकी विद्वता से प्रभावित। इतने में शिमला का इन्दिरा गांधी आयुर्विज्ञान महाविद्यालय आ गया। तेज बारिश शुरू हो गई। कार से उतरना मुश्किल हो गया लेकिन उतरकर मेडिकल कालेज की ओर भागे और छांह खोजकर खड़े हो गए। ठंडी हवा के तीव्र वेग और पानी की बौछार ने हमें भिगा दिया, कंपकंपी छूटने लगी। आधा घंटा बीत गया, बारिश तनिक थमी, हमें वहाँ से माल रोड तक पहुँचने के लिए लगभग दो किलोमीटर पैदल चलना था क्योंकि वहाँ तक ले जाने के लिए सभी वाहन प्रतिबंधित थे। हिम्मत करके निकले क्योंकि कार्यक्रम के वैसे ही देर हो रही थी लेकिन कुछ दूर आगे बढ़े कि मेघ पुनः बरस पड़े।
माधुरी
की सर्जरी हुए अभी पाँच माह बीते थे, डाक्टर
ने उन्हें भीगने और ठंड से बचने के लिए कहा था लेकिन अचानक वर्षा के कारण दोनों
प्रतिबंध भंग हो गए। हम दोनों भागते हुए रेडीमेड कपड़ों की एक दूकान में घुस गए
जहां संयोग से छतरियाँ भी बिक रही थी। पहाड़ी दूकानदारिन ने हमारी दशा देखी तो
प्रसन्न हो गई और छतरी की कीमत दोगुनी कर दी। 'मरते, क्या न
करते', छोटी-छोटी दो छतरियाँ मोलभाव करके चार
सौ में खरीदी और उसे तान कर शिमला की शीतल वर्षा में चल पड़े। उस समय मुझे फिल्म 'श्री 420' का
भीगा-भीगा दृश्य याद आ रहा था, वह गीत
भी याद आ रहा था- 'प्यार
हुआ इकरार हुआ है, प्यार से
फिर क्यों डरता है दिल।' अफसोस यह
हो रहा था कि विवाह के चालीस वर्ष के बाद छतरियाँ अलग-अलग हो जाती है और
प्यार-मुहब्बत की बातें भी दूरी बना लेती है।
शिमला के ऐतिहासिक 'गेयटी
थियेटर' तक पहुँचते-पहुँचते बैरन बारिश थम गई।
सुप्रसिद्ध माल रोड पर स्थित यह थिएटर अंग्रेजों के वैभवपूर्ण इतिहास का गवाह है।
लगभग दो सौ दर्शकों को अपनी गोद में बिठा कर रंगमंच के रोमांच को सहज-सुखद बनाने
वाला यह प्रेक्षागृह पुराने जमाने की पाषाण और काष्ठ-शिल्प का नायाब नमूना है। आज
भी, एकदम साफ-सुथरा और 'वेल-मेंटेण्ड'। मंच के
सामने नीचे के 'एंगल' से ऊपर देखने के लिए लगी हुई आरामदेह कुर्सियाँ, ऊपर के 'एंगल' से नीचे देखने के लिए वृत्ताकार में 'बालकनी' का
निर्माण दर्शकों को मंच पर चल रहे कार्यक्रम को सुविधाजनक ढंग से निहारने और सुनने
का पूरा अवसर देता है। आधुनिक 'माल' में बनाए जा रहे 'आयनाक्स
या 'ग्लिट्ज़' इसी 'गेयटी
थियेटर' की अनुकृतियाँ हैं।
'शिमला
कविता एवं कला महोत्सव' का आरंभ
हुआ। दूर-सुदूर से आए प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने दो दिनों तक अपनी कहानियों, कविताओं और सामयिक उद्गारों से उत्सव में चार चाँद लगा दिए।
पुराने और नए साहित्यकारों की इस गंगा-जमनी गोष्ठी ने हिन्दी, उर्दू और पंजाबी के लेखकों, कवियों और कलाकारों को समान रूप से अपनी रचना के प्रस्तुतीकरण के
अवसर दिए। इस उत्सव ने यह जताया कि इन भाषाओं में साहित्य समृद्ध हो रहा है और
ललित कलाएं हाल-फिलहाल धनोपार्जन के व्यामोह से मुक्त हैं, पनप रही है। इस उत्सव में उन दीवानों का मजमा जुटा था जो
साहित्य रच कर धन कमाने नहीं, अपना धन
लुटाने आए हैं।
राजस्थानी
भाषा के कथाकार मालचंद तिवाड़ी, पंजाबी
के कवि सुरजीत पातर, शिमला के
लेखक मन मोहन सिंह मितवा, राजस्थानी
भाषा के कवि-लेखक डा. चंद्रप्रकाश देवल, हिन्दी
भाषा के सूरज प्रकाश, विनोद
भारद्वाज, नीलाभ, ऋषिकेश सुलभ, पवन करण, विमलेश त्रिपाठी, गीता
श्री, के.पी.सक्सेना दूसरे, व्यंग्यकार डा॰ हरीश नवल, ललित लालित्य, प्रेम
जनमेजय, गिरीश पंकज, प्रेमचंद गांधी, अरविंद
कुमार, फारूख अफरीदी, फिल्म समीक्षक अजित रॉय और विष्णु नागर आदि अनेक
साहित्य-सर्जकों को सुनना और गुनना अद्भुत अनुभव था। ऐसा लग रहा था कि मनुष्य के
अंदर की मनुष्यता बचाए रखने वाले लोग अभी भी प्राणवान हैं, सक्रिय हैं और सामाजिक सरोकार के प्रति सचेत भी हैं।
थोड़ी देर
पहले पहले आपको मैंने बताया था कि बीकानेर उत्सव में साहित्यकारों की भीड़ में मेरी
उंगली घुस गई थी,
शिमला उत्सव में मेरा हाथ घुसने
का 'चांस' था लेकिन वहाँ मेरा सिर घुस गया ! इतने सारे बुद्धिजीवियों की
उपस्थिति में मुझे अपनी होशियारी बताने के लिए मेरे मित्र अशोक गुप्ता ने दो अवसर
दे रखे थे, प्रथम दिवस 'कहानी' पर
व्यक्तव्य और द्वितीय दिवस 'सिनेमा' पर। अपनी ज़िंदगी में कोई कहानी नहीं लिखी लेकिन मैंने मन ही
मन डा॰ नामवर सिंह को याद किया, कहानी पर
पंद्रह मिनट का भाषण ढील दिया और बीच-बीच में तालियाँ पिटवा ली।
अगले दिन
मुझे सिनेमा पर आयोजित सत्र में सिनेमा के दो धुरंधर विद्वान विष्णु नागर और अजित रॉय
के साथ मंच पर बैठा दिया गया। दो पहाड़ों के सामने एक छोटा सा टीला ! प्राण सूखे जा
रहे थे, क्या बोलना है- मेरे दिमाग में कोई
खाका नहीं था,
तब ही विकट आपदा सिर पर गिर
पड़ी- संचालक अजित रॉय ने सिनेमा पर चर्चा आरंभ करने का निवेदन मुझसे कर दिया। मैं
समझ गया कि शिमला के इस उत्सव में मेरी आज भद पिटने वाली है लेकिन 'पोडियम' तक
पहुँचने के समयान्तर में मैंने दो-तीन गहरी सांस ली, सामने बैठे 'आडिएन्स' को गौर से देखा, और 'सिनेमा के सामाजिक सरोकार' का सूत्र पकड़ कर बोलना शुरू किया तो बीस मिनट तक बोलता रहा। जय हो। जब अजित
रॉय और विष्णु नागर ने भी अपने व्यक्तव्य दिए तो सिनेमा पर उनके विषय ज्ञान और
विशद अध्ययन को सुनकर मैं विस्मित रह गया। वे दोनों विद्वान सिनेमा पर बोलने के
लिए देश के सर्वोत्तम जानकारों में से थे और मैं उनके समक्ष टुच्चा सा वक्ता, बहुत शर्म आई मुझे खुद पर लेकिन आप तो जानते हैं कि जिस
प्रकार राजनीति और सरकारी नौकरी में कच्चे-पक्के सब खप जाते है, उम्मीद है, उस भाषण
माला में मैं भी खप गया हूंगा।
(तीन)
इंसानी दिमाग अज़ीब होता है, जो है, उसकी कद्र नहीं और जो हासिल नहीं, उसकी तलाश है। मैदान में रहने वाले समुद्र या पहाड़ देखने भागता है और समुद्र या पहाड़ में रहने वाला मैदानी इलाकों में ! कुछ समय के लिए प्राकृतिक दृश्यों का परिवर्तन भला लगता है, फिर उससे भी ऊब होने लगती है। यह केवल प्रकृति के साथ ही नहीं होता, मानवीय रिश्तों में भी ऐसा ही होता है, कितनी जल्दी पति-पत्नी एक दूसरे से ऊबने लगते हैं!
खैर, हम दोनों शिमला उत्सव में पहाड़ के आकर्षण में ही नहीं गए, देश भर के साहित्य सर्जकों और प्रेमियों से मिलने गए थे।
अशोक गुप्ता जैसे सौ-दो सौ दीवाने (पागल लिखूंगा तो बुरा मान जाएंगे इसलिए उन्हें
दीवाना लिखा है) यदि हमारे देश में सक्रिय हो जाएँ तो भारतीय भाषाओं का साहित्य भी
पाश्चात्य देशों के साहित्य की तरह समृद्ध हो सकता है। जब साहित्य 'स्व' में
विकसित होता है तो सीमित अभिव्यक्ति में सिमटा रहता है लेकिन जब वह 'अन्य' के साथ
जुड़ता है तो पुष्पित-पल्लवित होता है। सहकर्मियों का रचना-संसार देख और सुनकर नए
आयाम खुलते हैं,
नई सोच विकसित होती है।
अशोक
गुप्ता ने अब तक दो आयोजन किए हैं, उनमें एक
अद्भुत विशेषता थी- साहित्यकारों में जलनखोरी और दोषारोपण रहित माहौल।
सुविधा-असुविधा की समस्या से परे हर कोई प्रसन्न भाव से कार्यक्रम में अपनी
सहभागिता दे रहा था और सम्मेलन का आनंद उठा रहा था। इसके बावजूद बीकानेर और शिमला
दोनों उत्सवों में एक बड़ी कमी थी, प्रतिभागियों
के मध्य आपसी संवाद। एक वर्ग स्थापित साहित्यकारों का था, शेष लोग विस्थापित थे। स्थापित तो विस्थापित के पास जाने से
रहे और विस्थापित स्थापित से मिलने में संकोच करते रहे, परिणाम यह रहा कि इतने समय तक साथ रहकर भी एक-दूसरे से
सम्प्रेषण स्थापित न हो पाया। सम्मेलन में कुछ लोग मंच पर बैठने वाले थे और अधिक
लोग सुनने वाले थे, कहने का
मतलब यह है कि दोनों बार 'वन वे
ट्रेफिक' हो गया।
बीकानेर
का एक अनुभव बताता हूँ, वहाँ तीन
दिनों तक कार्यक्रम चला लेकिन मेल-मुलाक़ात का माहौल नहीं बना। बीकानेर से जब मैं
वापस बिलासपुर आ गया तो वहाँ से लौटे लोगों की 'पोस्ट' फेसबुक
में आने लगी। एक पोस्ट मेरी मित्र नीलम मेदिरत्ता (दिल्ली) की थी। वे मेरी पुरानी
मित्र हैं, मैंने उनसे पूछा- 'अरे, आप
बीकानेर उत्सव में थी क्या ? महिलाओं
की भीड़ में मैं आपको नहीं पहचान सका लेकिन क्या आप भी मुझे नहीं पहचान सकी ?'
'मैं आपको पहचान गई थी लेकिन आपसे
मिलने में संकोच कर गई।' उनका
उत्तर आया।
मैंने
सोचा कि शिमला में इस 'ग्रुप-बाजी' को तोड़ा जाए। मैंने एक 'गेम' की योजना
बनाई, मुश्किल से आधा घंटा लगता और सब
एक-दूसरे से व्यक्तिरूप से परिचित हो जाते लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि शिमला में एक
भी 'ब्रेकफ़ास्ट', 'लंच' या 'डिनर' समूहिक रूप से नहीं हुआ, 'स्टे' अलग-अलग
होटलों में था,
इस कारण वह 'गेम' नहीं
कराया जा सका। अफसोस की
बात है कि इतने दिन साथ रहकर भी 'ए सी टू' में बैठे यात्रियों की तरह एक दूसरे को घूरते हुए हम लोग
अपरिचित रह गए और उसी अपरिचय के विंध्याचल का बोझ अपने सीने में लिए हुए अपने घर
वापस आ गए।
शायर शकील बदायूँनी का एक मतला
है :
'पास रहकर भी बहुत दूर ,बहुत दूर हैं हम
किस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि
मजबूर हैं हम.
(चार)
शिमला की माल रोड के क्या कहने ! यह जगह वैसे तो दिन भर गुलजार रहती है लेकिन दिन ढलते जब सैलानियों का हुजूम सड़क पर कुछ देखने और कुछ दिखाने निकलता है तो ऐसा लगता है कि राष्ट्रपतिभवन के मुगल-गार्डन के फूल टहलकदमी करने के लिए बाहर निकल पड़े हैं। उत्तर भारत की खूबसूरती जब साँझ के धुंधलके में सज-धज कर मुसकुराते हुए सपरिवार वहाँ निकलती है तो जिंदगी की जद्द-ओ-जहद न जाने कहाँ खो जाती है। चौक में आकर्षक वेषभूषा में सजे-सँवरा तन खड़ा 'ट्रेफिक पुलिस', दर्शनीय पुलिस चौकी, घूमता-फिरता हर सैलानी खुश और गज़ब की मस्ती में दिखाई पड़ता है। समर्थ परिवारों का छलकता हुआ यह वैभव भारत की तीन चौथाई आबादी के पेट में धधकती आग को हिकारत से देखता, माल रोड की सड़कों पर अट्टहास करता हुआ आगे बढ़ता जाता है।
धुली-पुछी
साफ सड़कें, करीने से सजी सौ-दो सौ साल पुरानी
दूकानें, खाने-पीने के विविध व्यंजन और आधुनिक
ढंग से सुसज्जित पोषाकों के शोरूम सहज आकर्षित करते हैं। 'गेयटी थियेटर' से कुछ
आगे बढ़कर तीस सीढ़ियाँ उतर कर एक दूकान दिखी- गुप्ताजी पराठे वाले, हम पति-पत्नी खचाखच भरी छोटी सी दूकान में घुस गए। कुल पंद्रह
ग्राहकों के बैठने का इंतज़ाम था, एक कोने
में बहुत देर खड़े रहे और एक टेबल में बैठे ग्राहक की खाली होती प्लेट को बेसब्री
से देखते रहे। जैसे ही वे उठे, हम दोनों
उन कुर्सियों पर कब्जा करके बैठ गए। जूठे बर्तन उठे, बेयरा जी ने पूछा- 'क्या
चाहिए ?
'पराठा, दो प्लेट पराठा। मैंने कहा। जब वह मुड़कर जाने लगा मैंने पूछा- 'पराठे के साथ क्या दोगे?'
'कुछ नहीं।'
'अरे, चटनी, अचार, सब्जी, दही, कुछ तो दो तब तो पराठा खाएँगे !'
'नहीं साहब, चाय मिलेगी।'
'ठीक है दो चाय भी साथ में ले आना।' मैंने प्रसन्न होकर कहा। असल में, चाय में डुबाकर ब्रेड, रोटी, पूड़ी, और पराठा खाना मुझे बहुत पसंद है। बिस्किट खाना मुझे बिलकुल पसंद नहीं लेकिन यदि 'पारलेजी बिस्कुट' चाय के साथ मिल जाए तो किसी भी महफिल में मैं उसे चाय में डुबाकर खाने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। कुछ देर में 'मिक्स-वेज पराठा' आया, गरम चाय आई और दोनों के संयोग से स्वर्गिक आनंद मिला।
दूसरी शाम जब कविता का लंबा दौर चला, हम दोनों चाय पीने 'गेयटी थियेटर' से बाहर निकले तो बाजार बंद मिला। बहुत खोजने पर एक चाय की दूकान मिली, हमारे साथ टी॰के॰ मरवाह (दिल्ली) भी थे, चाय पीने के बाद मैं और माधुरी कुछ दूर टहलने निकल गए। राह में एक विश्राम स्थल दिखा जो शिमला की सुंदरता को बैठकर देखने का उपयुक्त स्थान था। कोई पंद्रह मिनट बीते होंगे, एक सिख युवक हाथ में छोटी सी कुर्सी और बैग लिए अवतरित हुआ, वहाँ बैठ गया और बैग से कागज पेंसिल निकालकर अपने सामान को इस तरह व्यवस्थित करने लगा जैसे उसे अपनी दूकान सजानी हो। मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछा- 'क्या करते हैं ?''स्केच बनाता हूँ।' उसने हौले से कहा।
'किसका ?'
'आपका बना दूँगा, आंटी का बना दूंगा।'
'कलर पेंटिंग ?'
'जी नहीं, पेंसिल से बनाऊँगा।'
'जस का तस ?'
'न, पर 90% तो उतार दूँगा।'
'इनका बना दो, कितना लेंगे ?'
'दो सौ।'
'ठीक है बनाइए, कितना समय लगेगा ?'
'यही, सात-आठ मिनट।' उसने कहा।
वे माधुरी के सामने एक मीटर की दूरी पर बैठ गए, बैग से सामान निकाला और माधुरी के चेहरे का 'एंगल' सेट किया और उनकी पेंसिल सफ़ेद कागज पर तेजी से चलने लगी। कुछ मिनटों के अंदर उनके पीछे सैलानियों का समूह एकत्रित होने लगा, वे सब उत्सुकता से बार-बार माधुरी को देखते फिर उनकी कलाकृति को देखते और कहते- 'हाय, सेम-टू-सेम!'
'तुम उस तरफ से देखो न, कैसा बन रहा है।' माधुरी ने मुझसे कहा। मैं सरदार जी के पीछे गया, माधुरी का चेहरा तब तक कागज में बन चुका था, उनकी पेंसिल तेजी से चल रही थी। मैंने मोबाइल से कई फोटोग्राफ लिए। आठ मिनट में रेखाचित्र पूर्ण हो गया, सरदारजी मुस्कुराए और बोले- 'आंटी, ये रहा आपका चित्र।' पीछे खड़े लोगों ने ज़ोर से तालिया बजाई और जब माधुरी ने स्केच देखा और पूछा- 'क्या यह मेरा स्केच है, इसमें तो मैं 'यंग' लग रही हूँ ?'
'मुझे तो आप ऐसी ही नज़र आई।' चित्रकार ने हँसते हुए कहा।
(पांच)
शिमला को अन्य 'हिल स्टेशनों' की तरह छोटा-मोटा शहर न समझिएगा। मीलों तक फैली हुई बस्तियाँ, पहाड़ों का सीना तोड़कर बनाए गए हजारों बहुमंज़िला घर, असंख्य होटलों का अम्बार, चारों तरफ फैली ठंडक घुली हरियाली सच में शिमला को दर्शनीय बनाती हैं। वहाँ की रात बेहद सुहावनी लगती है। जिस तरफ नज़र घुमाइए, ऐसा लगेगा कि आसमान के थके-मांदे तारे नीचे जमीन पर उतरकर आ गए है और सुस्ता रहे हैं। ठंडी हवाओं के झोंके आपके पास से यूं गुजर जाएगे जैसे कोई प्यार से आपको सहलाकर निकल गया हो। मुझे आश्चर्य यह हुआ कि इतनी बड़ी आबादी और इतने कम व्यापारिक संस्थान ! सड़कें इतनी सकरी कि जब देखो तब 'जाम'। पूरे शिमला में कारों की पार्किंग की कोई जगह नहीं, यदि किसी को गाड़ी पार्क करना हो तो आठ-दस किलोमीटर आगे जाकर सड़क के किनारे टिकाना पड़ता है। कुछ भी कहो, पहाड़ों की रानी शिमला का वैभव वहाँ की प्राकृतिक सौन्दर्य है जिसे निहारने दुनिया भर के लोग आते हैं और खुश होकर वापस जाते है।
शिमला में सैलानी की जेब गरम होना अनिवार्य है क्योंकि 'सीजन' में होटलवाले धन-भक्षक का रूप धारण कर लेते है। जिन दो होटलों का मैंने अनुभव किया, वे ग्राहक को हलाल करने लायक मुर्गा समझते है। बात-व्यवहार तो निराशाजनक है ही, चाय, नास्ता और भोजन भी स्वादहीन मिला। संभवतः वे जानते हैं कि सैलानी उनके होटल में दोबारा आने से रहा इसलिए वे ग्राहकों की अधिक चिंता नहीं करते, वैसे भी, उनके पास नए ग्राहकों की कोई कमी नहीं।
यही हाल ट्रांसपोर्ट सेवाओं का है, जब हम लोग दिल्ली से शिमला आए तो हिमांचल प्रदेश टूरिस्ट कार्पोरेशन की वोल्वो बस का किराया 830/- प्रति व्यक्ति लगा, शिमला से दिल्ली लौटते समय उसी हिमांचल प्रदेश टूरिस्ट कार्पोरेशन की वोल्वो को ऑनलाइन बुक कराया तो किराया लगा 1150/- प्रति व्यक्ति ! हमने सोचा- 'अधिक आरामदेह बस होगी' लेकिन बस वैसी ही थी लेकिन किराया 320/- अधिक। बाद में और मज़ा आया, निर्धारित स्थल पर बस छूटने का समय रात को दस बजे था, बस आई साढ़े दस बजे, सड़क के किनारे खड़े-खड़े पैर दुख गए। बस आई तो भभ्भड़ मच गई। आप तो जानते हैं कि आम हिन्दुस्तानी, ट्रेन हो या बस, सबको चढ़ने और उतरने की बहुत हड़बड़ी रहती है। मैं उनकी आतुरता को सम्मान दिया करता हूँ, आराम से चढ़ता हूँ, आराम से उतरता हूँ। जब सब यात्रियों का सामान 'लगेज बॉक्स' में घुस गया तो आखिर में मैंने अपने तीन बैग रखवाए और अपनी सीट नम्बर 23-24 पर पहुंचा तो उसमें एक जोड़ा पहले से ही बैठा था।
मैंने उनसे कहा- 'हमारी सीट पर आप बैठे हैं।' उन्होंने अपनी टिकट दिखाई, उनकी टिकट में भी सीट नम्बर 23-24 था ! मैंने कंडक्टर को अपनी समस्या बताई तो वह बोला- 'पीछे की सीट खाली है, वहाँ बैठ जाओ।' जब मैंने उससे अपने नम्बर पर बैठने की बात की तो उसने आदेश दिया- 'जाना है तो जहाँ जगह है, बैठ जाओ, नहीं तो उतर जाओ।'
आप बताइए, उतरकर हम कहाँ जाते? वाह रे हमारा हिंदुस्तान....यह देश कभी नहीं सुधर सकता।शिमला कविता और कला उत्सव में मैंने न केवल पहाड़ों की रानी शिमला को पहली बार देखा वरन वहाँ मुझे भारत के अनेक साहित्यमनीषियों को सुनने का भी सुअवसर मिला, खास तौर से नई पीढ़ी में हिन्दी साहित्य के प्रति बढ़ते अनुराग को देखकर बेहद तसल्ली हुई।
धन्यवाद शिमला।
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