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मनोरम भूटान

मनोरम भूटान 
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          मैदानी इलाके में रहने वाले लोग पहाड़ की ओर बेहद आकर्षित होते हैं और मौका मिलने पर उनकी ओर दौड़े-दौड़े पहुँच जाते हैं। भारत के उत्तरी राज्यों को हिमालय की पर्वत शृंखलाओं ने इतना खूबसूरत बना दिया है कि पूरा भारत वहाँ की ठंडक और हरियाली को अपनी बाँहों में समेटने के लिए लालायित रहता है, चाहे जा पाएँ, न जा पाएँ। भारत की उत्तरी सीमाओं से लगे हुए तीन राष्ट्र और हैं जो प्रकृति की इस सुंदरता को अपने ललाट पर सजाकर सैलानियों को ललचाते हैं, पाक अधिकृत काश्मीर, नेपाल और भूटान। भारत के नागरिकों के लिए पाक अधिकृत काश्मीर का सौन्दर्य दर्शन तो सदियों तक स्वप्नवत रहेगा क्योंकि भारत और पाकिस्तान ने अनादिकाल तक आपस में लड़ना-भिड़ना तय कर रखा है लेकिन नेपाल और भूटान में आवाजाही जारी है।
          भूटान जिसे आधिकारिक तौर पर 'किंग्डम ऑफ भूटान' कहा जाता है, हिमालय पर्वत के पूर्वी किनारे पर स्थित है। इसकी उत्तरी सीमा से चीन और पूर्वी, दक्षिणी और पश्चिमी सीमा से भारत जुड़ा हुआ है। सत्रहवी शताब्दि में एक धार्मिक गुरु ग्वांग नांगयाल ने इस क्षेत्र को एकीकृत करके भूटान नाम की पहचान दी। बीसवी सदी में भूटान अंग्रेजों के प्रभाव में आया और भारत की आज़ादी के बाद से उसके भारत के साथ मजबूत आपसी संबंध चले आ रहे हैं। लगभग सात लाख की आबादी वाला यह देश जनसंख्या की दृष्टि से कमजोर लेकिन जलवायु, प्राकृतिक सौन्दर्य और मानवीय-श्रम की दृष्टि से बेहद मजबूत है। भूटान की अधिसंख्य आबादी बौद्ध धर्म की अनुयायी है, उसके बाद उनसे कम संख्या में हिन्दू धर्म मानने वाले लोग हैं।
          मेरी मिस्र की रेतीली यात्रा के पश्चात भूटान की पथरीली यात्रा का कार्यक्रम अनायास बन गया और मैं अपनी पत्नी माधुरी, माधुरी जी के छोटे भाई मदन, मदन जी की पत्नी हेमलता और हमारी दस वर्षीय नातिन अनन्या के साथ घर से भूटान जाने के लिए निकल पड़ा। रास्ते में मित्र पत्रकार और साहित्यकारगण भी जुड़ गए और सोलह लोगों का एक समूह भारत-भूटान की सीमा पर स्थित हासीमारा में एकत्रित हुआ। भूटान के शहर फुस्लिंग में वीजा लिया, हम सब रात को वहीं रुके और सुबह के समय भूटान की राजधानी थिम्फू के लिए बस पर सवार होकर चल पड़े। भीमकाय पहाड़ों और गहरी घाटियों के बीच बनी सड़कों पर तीखे मोड़ों से घूमती-फिरती बस ग्यारह घंटे बाद भूटान की राजधानी थिम्फू पहुंची जहां एक पहाड़ी पर स्थित वांगचुक होटल एंड रिसोर्ट में पहुँच कर हमारी बस और हम सब ने चैन की सांस ली। 
          थिंफू जिसे पहले 'थिंबू' कहा जाता था, सन 1961 से भूटान की राजधानी है। यह भूटान के पश्चिम-मध्य में स्थित है जिसकी आबादी सन 2011 की जनगणना के अनुसार 91,000 है। इस शहर के पश्चिमी किनारे पर रैदक नदी बहती है जिसे अब लोग वाङ छू या थिंफू छू कहते हैं, 'छू' यानी नदी। यद्यपि थिंफू देश की राजधानी है लेकिन वहाँ हवाई अड्डा नहीं है इसलिए वायुयात्रा के लिए थिंफू से 54 किलोमीटर दूर स्थित पारो में निर्मित विमानतल का सहारा है। भूटान की अर्थव्यवस्था में अन्न एवं विद्युत ऊर्जा का उत्पादन का बड़ा योगदान है। सन 1974 से भूटान सरकार ने पर्यटन के लिए जब प्रयास आरंभ किए, तब से पर्यटन भी राष्ट्रीय आय का नया स्रोत बन गया है।
          वहाँ भूटानी करेंसी NGULTRUM और भारतीय रुपया समान मूल्य पर प्रचलन में हैं। नोटों पर एक तरफ भूटान के सम्राट का चित्र अंकित है तो दूसरी तरफ पुराने राजमहल का। भूटान के सम्राट और सामाज्ञी के चित्र वहाँ की सभी दूकानों, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह लगे हुए हैं जैसे भारत में चुनाव के समय नेताओं के पोस्टर छाए रहते हैं। पूरे भूटान में राजतंत्र का प्रभाव स्पष्ट झलकता है, लोग अनुशासित दिखते हैं, सफाई-प्रिय हैं। किसी की मजाल नहीं है कि रास्ते में थूक दे, कचरा फेंक दे, यातायात नियमों का उल्लंघन करे या यहाँ-वहाँ पर मूत्र-त्याग करे। राजधानी की सड़कों पर हमें कहीं एक भी 'ट्रेफिक सिग्नल' नहीं दिखा, किसी को हार्न बजाते नहीं सुना और न ही किसी को 'ओवर-टेक' करते देखा। सड़क पर पैदल चलने वालों के लिए सड़क-पार-चिन्ह बने हुए है, यदि कोई व्यक्ति उस चिन्ह से होकर सड़क पार कर रहा है तो कारें अपने-आप रुक जाएंगी और शांति के साथ तब तक रुकी रहेंगी जब तक रास्ता खाली न हो।
          भूटान की राष्ट्रीय वेषभूषा वहाँ की ठंडे मौसम के अनुरूप है, आकर्षक और रंगबिरंगी है। सरकारी कार्यालयों में राष्ट्रीय वेषभूषा पहन कर आना अनिवार्य है। मैं उन्हें इस तरह देखकर कल्पना कर रहा था कि क्या कभी भारत में भी राष्ट्रीय वेशभूषा घोषित होना संभव है ? क्या हमारे देश के पुरुष धोती-कुरता, पैजामा-कमीज़ या महिलाएं साड़ी, सलवार-कमीज़ पहनकर शान से देश में घूमेंगे और अपनी वेषभूषा पर गर्व करेंगे?
भूटान के मैदानी इलाके में नदियों के आसपास चावल और भुट्टा की खेती बड़े पैमाने पर होती है। अधिकांश भूटानवासी मांसभक्षी है। मैं नहीं जानता कि 'बीफ' किस पशु का मांस होता है लेकिन उन्हें यह बेहद प्रिय है। यहाँ एक विरोधाभास उल्लेखनीय है कि यदि सड़क में कोई पशु रास्ता पार कर रहा हो तो सभी कारों में 'ब्रेक' लग जाता है ! उन्हें कुत्ते और बिल्ली पालने का शौक है, ये घरेलू कुत्ते और बिल्लियाँ हमारे देश जैसे हैं किन्तु थोड़ा फर्क है। मैंने उन पाँच दिनों में किसी कुत्ते को भौंकते या बिल्ली को म्याऊँ करते नहीं सुना। 
          भूटान दुनिया का पहला देश है जहां धूम्रपान सर्वथा वर्जित है। सार्वजनिक स्थल पर धूम्रपान करते पाए जाने पर 232 डालर का जुर्माना है जो वहाँ के सामान्य व्यक्ति के माहवारी वेतन का लगभग दो गुना है। वहाँ पान भी लोकप्रिय है जिसे महिलाएं बड़े शौक से खाती हैं। पान के बीड़े में तनिक सा चूना और ताजी-कच्ची सुपारी की बड़ा टुकड़ा रहता है। सुपारी में हल्की सी दुर्गंध होती है लेकिन पान के अनूठे स्वाद में उसकी गंध लापता हो जाती है। हाँ, शराब पीने की खुली छूट है। जिस तरह हमारे देश में चाय बिकती है, उसी तरह वहाँ जगह-जगह दूकानों में विदेशी शराब उपलब्ध है। पीने वाले दो पेग दो मिनट में खींच कर खत्म कर देते हैं, वे भारतीयों की तरह 'सिप' ले-लेकर अपना समय बर्बाद नहीं करते।
          वहाँ की लड़कियां गोरी-नारी और खूबसूरत हैं लेकिन उत्तेजक नहीं हैं क्योंकि वे घुटनों तक पहनी जाने वाली 'किरा' और उसके ऊपर जाकिटनुमा 'टोगो' से अपने शरीर के उत्तरीय भाग में तथा कमर के नीचे लुंगीनुमा मोटा कपड़ा धारण करती हैं। इस प्रकार चेहरे के अतिरिक्त शरीर का अन्य हिस्सा भलीभाँति ढंका-छुपा होता है। वहाँ की महिलाएं परिश्रम करने में पुरुषों से कम नहीं हैं, हमने उन्हें अनेक कठिन कार्यों को इस तरह हंसी-खुशी से करते हुए देखा कि आश्चर्य हो रहा था। बाजार की अधिसंख्य दूकानें महिलाएं चला रही है, वे जितनी काम करने में तेज हैं, उतनी ही मुस्कान बिखेरने में भी। उनके आत्मविश्वास का स्तर को इस घटना से समझा जा सकता है कि भूटान की संसद में जब महिलाओं को आरक्षण देने का प्रस्ताव आया तो प्रस्ताव के विरोध में वे सड़कों पर उतर पड़ी। उनका तर्क था कि वे किसी से कमजोर नहीं हैं, उन्हें आरक्षण नहीं चाहिए, परिणामस्वरूप आरक्षण का प्रस्ताव वापस ले लिया गया।
          जिस तरह भारत मंदिर, मस्जिद और चर्च का देश है, उसी तरह भूटान बौद्ध मठों का है। वहाँ इतिहास और पुराने किस्से-कहानियों से सजी अनेक रंग-बिरंगी इमारतें और मूर्तियाँ हैं जिन्हें देखकर अपूर्व आत्मिक शांति मिलती है। भूटान की पुरानी राजधानी पुनाखा में एक प्राचीन किला है, 'कुएन रिया जाङ्ग'। सन 1594 से 1691 के बीच इसे भूटान की सुरक्षा और बौद्ध परम्पराओं के संरक्षण के उद्देश्य से पत्थर और मिट्टी से निर्मित किया गया था। सभी द्वार लकड़ी के हैं और मनोरम चित्रकारी से सुसज्जित हैं। इस छः मंजिले किले को देखने-परखने के कम-से-कम एक दिन पूरा चाहिए। यह बाहर से एक किला है लेकिन भीतर मठ है। बाईस सीढ़ियों से चढ़कर उसके प्रवेश द्वार में घुसते ही बौद्ध धर्म की मान्यताओं पर आधारित भित्ति चित्र न केवल अद्भुत हैं वरन महात्मा बुद्ध के पवित्र संदेश भी देते हैं। एक भित्ति चित्र में मनुष्य के इस जीवन के कर्मों का पुनर्जन्म पर प्रभाव का विस्तृत विवरण है जैसे उनमें से एक में बंदर का चित्र बना हुआ था जो यह बताता था कि इस जन्म में यदि मनुष्य का मन स्थिर नहीं है और विषय-वासना में लिप्त है तो अगले जन्म में उसे बंदर की योनि प्राप्त होगी। उस चित्र के कारण मुझे अपने अगले जन्म के बारे में अनायास पता चल गया।
          अंदर आँगन में एक श्वेत स्तूप है और एक विशालकाय बोधि-वृक्ष। किले में अनेक प्रार्थना गृह हैं, जिनमें बौद्ध भिक्षु कतार में आमने-सामने बैठकर मंत्रोच्चारण करते हुए प्रार्थना करते हुए मिले। वहाँ स्थापित भगवान बुद्ध की मनोहारी प्रतिमा सबके हृदय में शांति का भाव संचारित करती है। रंगीन चित्रकारी से सजे इस भव्य किले में पुराने चित्रों को संरक्षित करने का काम कलाकार लगातार कर रहे हैं। पुनाखा के 'जाङ्ग' में आपको महात्मा बुद्ध की उपस्थिति का अनुभव हो सकता है बशर्ते आपके पास समय हो, कोई बताने-समझाने वाला हो और आपने अपने मन के द्वार खुले रख छोड़े हों।
          भूटान में इस स्थान से अधिक मनोरम और रोचक मुझे कुछ नहीं लगा। इस यात्रा में आरंभ से अंत तक हमें कोई गाइड नहीं मिला इसलिए जो जानकारियाँ मिलनी चाहिए थी, नहीं मिली। अपनी आँख और अक्ल के सहारे बहुत सी बातें समझ में नहीं आती, ऐसे में वहाँ उपलब्ध गाइड मदद किया करते हैं। पुनाखा के किले में गाइड की कमी सच में खल गई। कुछ पश्चिम देश के पर्यटकों के गाइड उन्हें वहाँ की चित्रकारी के रहस्य उन्हें बता रहे थे तो मैं एक-दो मिनट के लिए रुक कर चुपके से कुछ सुन लेता और मन मसोस कर आगे बढ़ जाता क्योंकि ग्रुप के साथ बने रहना जरूरी जो था।
          भूटान की राजधानी थिम्फू में वांग नदी के पास 300 फुट की ऊंचाई पर महात्मा बुद्ध की कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है जो उनकी चिरपरिचित स्मित-ध्यान मुद्रा में है। यह बुद्ध की 169 फुट ऊंची विश्व की सर्वाधिक बड़ी मूर्ति है जो निकट भविष्य में दुनिया के आठवें आश्चर्य की सूची में सम्मिलित होने जा रही है। यह मूर्ति चीन से बन कर आई है जिसे अनेक हिस्सों में यहाँ लाकर जोड़ कर बनाया गया है। इस प्रकल्प को एक बौद्ध लामा ने अपने द्वारा प्रबंधित आर्थिक संसाधनों से बनवाया है। इस विशालकाय मूर्ति के आधार में बने खाली 'स्पेस' में बुद्ध की तांबे से निर्मित और स्वर्ण-पत्र से लिपटी हुई एक लाख मूर्तियाँ जो आठ इंच बड़ी होंगी और पचीस हज़ार मूर्तियाँ जो बारह इंच बड़ी होंगी, को रखा जाएगा। महात्मा बुद्ध की इस चमचमाती मूर्ति को देखना विस्मयकारी है। मूर्ति-निर्माण-कला, आकार और रंग-संयोजन के समग्र प्रभाव का प्रभाव अद्भुत है। इस मूर्ति के पास खड़े होकर सम्पूर्ण थिम्फू शहर को देखा जा सकता है और सम्पूर्ण थिम्फू शहर से अपना सिर उठाकर इस मूर्ति को देखा जा सकता है। 
          भूटान की आबादी इतनी कम है कि यात्रा के दौरान कई बार ऐसा लगा जैसे हम किसी वीराने में आ गए हों। राह में पहाड़ पर यदि कोई अकेला घर दिख गया तो समझिए, वह एक गाँव है। अधिक घर वाले गाँव बड़े गाँव माने जाते हैं। भले ही बाज़ार सूने मिले, सड़कें सूनी दिखी लेकिन घर रंग-बिरंगे थे, पोषाक बहुरंगी दिखी और पेड़-पौधे हरियाए हुए। हिन्दी भाषा सब जानते हैं, प्यार से बोलते हैं और भारतीयों से इज्जत से पेश आते हैं। वे जानते हैं कि भारत उनकी ढाल है जिसने तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद अपना सुरक्षा-कवच प्रदान कर उन्हें एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बने रहने का सौभाग्य दिया। मैंने अपनी अन्य यात्राओं के दौरान अपने देश के एक हिस्से कश्मीर में और पड़ोसी देश श्रीलंका में भी भारतीयों के प्रति आम तौर पर नफरत का भाव देखा लेकिन भूटान में सम्मान का भाव दिखा। ऐसा लगा, जैसे भूटान उपकार मनाने वाला राष्ट्र है।
          भूटान की बात चले और 'मोमो' का ज़िक्र न हो तो अन्याय होगा। मोमो अपने समोसे जैसा एक नास्ता है जिसके अंदर पत्तागोभी, शिमला मिर्च, प्याज का मसाला भरा जाता है और मैदा से बनी ऊपरी खोल को पानी की भाप से पकाया जाता है। फूल जैसा प्यारा आकार वाला मोमो लाल रंग की तीखी चटनी के साथ परोसा जाता है। वैसे तो मोमो अब भारत के शहरों में पर्याप्त लोकप्रिय हो गया है, मैंने इसे यहाँ खाया भी है लेकिन भूटान में बने मोमो के स्वाद का क्या कहना ? कभी मोमो खाने के लिए भूटान घूम आइए, आपका पैसा वसूल हो जाएगा। 

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