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यात्रा वृत्तांत का प्रयोजन

यात्रा करना मनुष्य का शौक माना जाता है जबकि यह अनिवार्यता भी होती है. शौक उनका है जो आर्थिक और शारीरिक रूप से सक्षम है, दुनिया को अपनी आँखों से देखना चाहते हैं. अनिवार्यता उनकी है जिन्हें मंदिर में प्रार्थना या मनौती करनी है, रिश्तेदारी या नौकरी पर जाना है, इलाज़ करवाना है, अपना माल बेचने के लिए दर-दर भटकना है.

मेरे लिये यात्रा करना अपने जीवन के शेष रह गये काम को निपटाना है. जब घूमने-फिरने के दिन थे तब जेब खाली थी, अब जब मेरी जेब में ख़र्च करने के लिए कुछ है तो मेरे साठोत्तर शरीर की परेशानियां हाज़िर हैं. फिर भी, मैं उतना अशक्त नहीं कि चल-फिर न सकूं इसलिए जब भी शहर से बाहर निकलने का कोई अवसर मुझे मिलता है तो मैं ट्रेन में बाद में बैठता हूँ, उस जगह पर दिमागी तौर पर पहले ही पहुँच जाता हूँ.

'मुसाफिर.....जाएगा कहाँ ' में विगत दस वर्षों की यात्राओं पर मेरे द्वारा लिखे गए कुछ संस्मरण हैं. इन यात्राओं में मेरी दृष्टि स्थूल पर कम थी, मानवीय व्यवहार पर अधिक. इस यात्राविवरण को पढ़कर आपका दिल भी घूमने जाने के लिए मचल पड़े तो समझिए, मेरा लिखना सार्थक हो गया.

तो, चलिए, मेरे साथ आप भी सैर करें, पृथ्वी के इस छोटे से हिस्से की.


बिलासपुर (छत्तीसगढ़)                                                                         द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
१ फरवरी २०१८  

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