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मनोरम भूटान

मनोरम भूटान  ==========           मैदानी इलाके में रहने वाले लोग पहाड़ की ओर बेहद आकर्षित होते हैं और मौका मिलने पर उनकी ओर दौड़े-दौड़े पहुँच जाते हैं। भारत के उत्तरी राज्यों को हिमालय की पर्वत शृंखलाओं ने इतना खूबसूरत बना दिया है कि पूरा भारत वहाँ की ठंडक और हरियाली को अपनी बाँहों में समेटने के लिए लालायित रहता है, चाहे जा पाएँ, न जा पाएँ। भारत की उत्तरी सीमाओं से लगे हुए तीन राष्ट्र और हैं जो प्रकृति की इस सुंदरता को अपने ललाट पर सजाकर सैलानियों को ललचाते हैं, पाक अधिकृत काश्मीर, नेपाल और भूटान। भारत के नागरिकों के लिए पाक अधिकृत काश्मीर का सौन्दर्य दर्शन तो सदियों तक स्वप्नवत रहेगा क्योंकि भारत और पाकिस्तान ने अनादिकाल तक आपस में लड़ना-भिड़ना तय कर रखा है लेकिन नेपाल और भूटान में आवाजाही जारी है।           भूटान जिसे आधिकारिक तौर पर 'किंग्डम ऑफ भूटान' कहा जाता है, हिमालय पर्वत के पूर्वी किनारे पर स्थित है। इसकी उत्तरी सीमा से चीन और पूर्वी, दक्षिणी और पश्चिमी सीमा से भारत जुड़ा हुआ है। सत्रहवी शताब्दि में एक धा...

मिस्र की मिस्ट्री

मिस्र की मिस्ट्री  =========== (१)           जब मैं नवीं कक्षा में पढ़ता था तो फिल्म 'जंगली' में सायराबानो को देखकर मेरे दिल ने उन्हें बाहों में समेट लेने की तमन्ना की थी। ऐसी ही ख़्वाहिश 'मेरे महबूब' में साधना को देखकर भी हुई। इसी तरह की और भी अनेक ख्वाहिशें दिल में समाई और सिर पटक-पटक कर टें बोल गई। मैं समझ गया कि मुझे जो मिलना होगा वह तदबीर से नहीं, तकदीर से मिलेगा।           किशोरावस्था में यात्रा वृतांत पढ़ने का बहुत शौक था। इस विषयक जो भी पुस्तक मिलती उसे बड़े प्यार से पढ़ता, लेखक के साथ घूमते हुए पढ़ता था। उन दिनों पढ़ी पुस्तकों में राहुल सांकृत्यायन की 'वोल्गा से गंगा तक', धर्मवीर भारती की 'ठेले पर हिमालय', रामेश्वर नौटियाल की 'मेरी विश्व यात्रा', सतीश कुमार की 'बिना पैसे दुनिया का सफर' आदि की याद आज भी ताज़ा है। उसी दौरान भगवतशरण उपाध्याय की पुस्तक 'पुरातत्व का रोमांस' मेरे हाथ लगी जिसमें तूतनखामेन की कब्र के रहस्योद्घाटन पर एक अध्याय इतना रोचक था कि उसे पढ़कर मैंने कभी-न-कभी मिस्र देखने की चाहत अपने दिल में सँजो ली थी। तकदी...

जब तब अब जबलपुर

तब जब अब जबलपुर ============== ( १)           अपनी ससुराल होने के कारण मुझे शहर जबलपुर अत्यंत प्रिय है क्योंकि वहाँ दामाद होने के कारण मेरे मान-सम्मान की स्थायी व्यवस्था बनी हुई है यद्यपि सास-श्वसुर अब न रहे लेकिन तीन में से दो भाई , मदन जी और कैलाश जी , मुझे अभी भी अपना जीजा मानते हुए अपने माता-पिता की कोमल भावनाओं का प्रसन्नतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं। मैं पहली बार जबलपुर विवाह में बाराती बन कर दस वर्ष की उम्र (सन 1957) में गया था। मोहल्ला हनुमानताल , सेठ गोविंद दास की ' बखरी ' के कुछ आगे , जैन मंदिर के पास , सेठ परसराम अग्रवाल के घर , जहां से उनकी भतीजी मंदो का ब्याह मेरे बड़े भाई रूपनारायण जी के साथ हुआ था। उन्हीं दिनों सेठ गोविंद दास की ' बखरी ' के बाजू में स्थित एक घर में एक वर्ष की एक नहीं सी लड़की जिसका नाम माधुरी था , वह घुटनों के बल पूरे घर में घूमती और खड़े होने का अभ्यास करती हुई बार-बार गिर जाती थी। इसी घर में 8 मई 1975 में मैं दूल्हा बनकर आया था तब माधुरी 19 वर्ष की हो चुकी थी , वे मेरी अर्धांगिनी बनी।      ...