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यात्रा वृत्तांत का प्रयोजन

यात्रा करना मनुष्य का शौक माना जाता है जबकि यह अनिवार्यता भी होती है. शौक उनका है जो आर्थिक और शारीरिक रूप से सक्षम है, दुनिया को अपनी आँखों से देखना चाहते हैं. अनिवार्यता उनकी है जिन्हें मंदिर में प्रार्थना या मनौती करनी है, रिश्तेदारी या नौकरी पर जाना है, इलाज़ करवाना है, अपना माल बेचने के लिए दर-दर भटकना है. मेरे लिये यात्रा करना अपने जीवन के शेष रह गये काम को निपटाना है. जब घूमने-फिरने के दिन थे तब जेब खाली थी, अब जब मेरी जेब में ख़र्च करने के लिए कुछ है तो मेरे साठोत्तर शरीर की परेशानियां हाज़िर हैं. फिर भी, मैं उतना अशक्त नहीं कि चल-फिर न सकूं इसलिए जब भी शहर से बाहर निकलने का कोई अवसर मुझे मिलता है तो मैं ट्रेन में बाद में बैठता हूँ, उस जगह पर दिमागी तौर पर पहले ही पहुँच जाता हूँ. 'मुसाफिर.....जाएगा कहाँ ' में विगत दस वर्षों की यात्राओं पर मेरे द्वारा लिखे गए कुछ संस्मरण हैं. इन यात्राओं में मेरी दृष्टि स्थूल पर कम थी, मानवीय व्यवहार पर अधिक. इस यात्राविवरण को पढ़कर आपका दिल भी घूमने जाने के लिए मचल पड़े तो समझिए, मेरा लिखना सार्थक हो गया. तो, चलिए, मेरे साथ आप भी सैर ...

सेठानी ट्रेन में नहीं चढ़ी

सेठानी ट्रेन में नहीं चढ़ी  ================          ईशा फ़ाउन्डेशन द्वारा आयोजित बद्रीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री की ध्यान-यात्रा संपन्न होने के पश्चात मैं अपनी पत्नी माधुरी के साथ नई दिल्ली वापस आया। दिल्ली हम लोग २४ अक्टूबर २००८ को अल-सुबह पहुंचे, हमारी वापसी ट्रेन ‘सम्पर्क क्रान्ति’ शाम को साढ़े पांच बजे थी, इसलिए हम दोनों दिल्ली के एक उपनगर ‘द्वारका’ में माधुरी की बड़ी बहन विद्या जवाहर अग्रवाल से भेंट करने चले गए। बिलासपुर जाने वाली यह ट्रेन निज़ामुद्दीन से आरंभ होती है जो द्वारका से लगभग डेढ़ घंटे की दूरी पर है इसलिए थोड़ी अधिक ‘मार्जिन’ लेकर दोपहर तीन बजे कार में स्टेशन के लिए रवाना हो गए। रास्ते में लगातार ट्रेफ़िक जाम होता रहा और जब हम लोग स्टेशन पहुंचे तब हमारी घड़ी में पांच बजकर पच्चीस मिनट हो चुके थे। स्टेशन में कुली ने हमें समझाया कि प्लेटफ़ार्म दूर है, हम लोग जब तक पहुंचेंगे तब तक गाड़ी जा चुकी होगी- ‘आप कहें तो कोशिश करें।’ ‘कोशिश करो।’ मैंने कहा।            ठंड के दिन थे, हिमालय की पन्द्रह दिवसीय यात्रा थी, इसलिए साथ मे...

योग की संयोग यात्रा

योग की संयोग यात्रा : ==============           तमिलनाडु में चेन्नई के बाद यदि किसी शहर को भारत भर में जाना जाता है तो वह है कोयम्बत्तुर. इसे मशीनों का उत्पादक नगर कहते हैं। अब कोयम्बत्तुर की प्रसिद्धता में एक स्थान और जुड़ गया है , सद्गुरु जग्गी वासुदेव द्वारा संचालित ईशा योग केंद्र जिसे वहां की बोलचाल में ' ईशा ' कहते हैं। हमारे पुत्र कुंतल जब वहां पूर्णकालिक स्वयंसेवक बन गए तो हमारे मन में यह प्रश्न अक्सर आता था कि ऐसा कौन सा आकर्षण है जिसके वशीभूत होकर उन्होंने गृहस्थी त्याग दी और योगी बन गए. उस बात को समझने के लिए उस प्रकल्प में घुसना ज़रूरी था इसलिए हमने वहां आयोजित आठ दिवसीय कार्यक्रम 'Wholeness' में अपना पंजीकरण करवाया और कोयम्बत्तुर पहुँच गए।            योग प्रशिक्षण का कार्यक्रम कोयंबत्तुर के वेलियंगिरी पहाड़ की तलहटी में बसे पुंडी ग्राम में स्थापित ईशा योग केंद्र के स्पंद सभागार में चल रहा था जिसमें लगभग तीन सौ स्त्री-पुरुष योग की प्राचीन विधा को सद्गुरु जग्गी वासुदेव के मार्गनिर्देशन में अत्यंत मनोयोग से सीख रहे ...

थाइलैण्ड में ता-था-थइया

थाइलैण्ड में ता-था-थइया ================= (१)           थाइलैण्ड के बारे में मेरी जानकारी कम थी, जो थी वह वहां के अश्लील माहौल की थी. आम तौर पर चर्चा होती थी कि नवकुबेर वहां 'मसाज़' कराने जाते हैं, खूबसूरत लडकियां उनके सम्पूर्ण बदन की मालिश करती हैं और उनकी युवावस्था की मानसिक-शारीरिक ज़रूरतें पूरा करती हैं. जिसे देखो, थाईलैण्ड जाने का जुगाड़ बना रहा है और वहां से तर-ओ-ताज़ा होकर वापस आ रहा है. अब मेरी उम्र सत्तर साल की होने वाली है, कब्र में पैर लटके हुए हैं, क्या तर और क्या ताज़ा?           मेरे साहित्यप्रेमी रायपुरिया मित्र सुधीर शर्मा ने 'क्रबी साहित्य महोत्सव' में साथ चलने के लिये अनुरोध किया. आर्थिक असुविधा चल रही थी इसलिए मैंने असमर्थता ज़ाहिर की तो वे बोले- 'आप हाँ करो, बस, पैसा आता रहेगा.' अर्थात विदेश यात्रा भी उधार में! बिना रकम ढीले हवाई-ज़हाज की टिकट आ गयी, वीज़ा बन गया और मैं अपनी पत्नी माधुरी जी के साथ १जून २०१७ को थाईलैण्ड की यात्रा पर निकल गया. थाइलैण्ड के नजदीकी द्वीप फुकेट में हम दोनों उस स्ट्रीट में गये जिससे वहां की प...

कुल्लू से मनाली से दिल्ली

कुल्लू से मनाली से दिल्ली  ------------------------------ (१)           मगरमच्छ पानी से ऊबकर कुछ देर के लिए वह धरती पर आता है, धूप के मज़े लेने या खुली हवा में सांस लेने, उसी प्रकार मैदानी इलाकों में रहने वाले नीरस लोग रस की तलाश में समुद्र की ओर भागते हैं या पर्वत की ओर. मगरमच्छ और मनुष्य का स्वभाव एक जैसा है, कुछ देर के लिए बाहर निकलने का लेकिन दोनों में कुछ मौलिक अंतर है. मगरमच्छ बाहर निकल कर रेत पर पसरकर आराम करता है जबकि मनुष्य पैदल चल-चल कर हैरान होने के लिये बाहर निकलता है. जिसे भी पैदल चलने में कष्ट होता हो, उसे अपने घर में टीवी के सामने बैठकर दुनिया देखनी चाहिए लेकिन यदि घर से निकल पड़े तो ट्रेन, टैक्सी, ऑटो, होटल की विविध समस्यायों के साथ पैरों का दर्द भी सहना होगा, यह यात्रा का समानान्तर सुख है.           एक दिन की बात है, जाने-माने कवि-व्यंग्यकार लालित्य ललित, असली नाम डा.ललित किशोर मंडोरा, सहायक संपादक नेशनल बुक ट्रस्ट, नयी दिल्ली, बिलासपुर आये थे, उनसे अचानक मुलाकात हो गयी. उन्होंने मुझे कुल्लू में होने वाले 'व्यंग...