कुल्लू से मनाली से दिल्ली ------------------------------ (१) मगरमच्छ पानी से ऊबकर कुछ देर के लिए वह धरती पर आता है, धूप के मज़े लेने या खुली हवा में सांस लेने, उसी प्रकार मैदानी इलाकों में रहने वाले नीरस लोग रस की तलाश में समुद्र की ओर भागते हैं या पर्वत की ओर. मगरमच्छ और मनुष्य का स्वभाव एक जैसा है, कुछ देर के लिए बाहर निकलने का लेकिन दोनों में कुछ मौलिक अंतर है. मगरमच्छ बाहर निकल कर रेत पर पसरकर आराम करता है जबकि मनुष्य पैदल चल-चल कर हैरान होने के लिये बाहर निकलता है. जिसे भी पैदल चलने में कष्ट होता हो, उसे अपने घर में टीवी के सामने बैठकर दुनिया देखनी चाहिए लेकिन यदि घर से निकल पड़े तो ट्रेन, टैक्सी, ऑटो, होटल की विविध समस्यायों के साथ पैरों का दर्द भी सहना होगा, यह यात्रा का समानान्तर सुख है. एक दिन की बात है, जाने-माने कवि-व्यंग्यकार लालित्य ललित, असली नाम डा.ललित किशोर मंडोरा, सहायक संपादक नेशनल बुक ट्रस्ट, नयी दिल्ली, बिलासपुर आये थे, उनसे अचानक मुलाकात हो गयी. उन्होंने मुझे कुल्लू में होने वाले 'व्यंग...