सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

मई, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कुल्लू से मनाली से दिल्ली

कुल्लू से मनाली से दिल्ली  ------------------------------ (१)           मगरमच्छ पानी से ऊबकर कुछ देर के लिए वह धरती पर आता है, धूप के मज़े लेने या खुली हवा में सांस लेने, उसी प्रकार मैदानी इलाकों में रहने वाले नीरस लोग रस की तलाश में समुद्र की ओर भागते हैं या पर्वत की ओर. मगरमच्छ और मनुष्य का स्वभाव एक जैसा है, कुछ देर के लिए बाहर निकलने का लेकिन दोनों में कुछ मौलिक अंतर है. मगरमच्छ बाहर निकल कर रेत पर पसरकर आराम करता है जबकि मनुष्य पैदल चल-चल कर हैरान होने के लिये बाहर निकलता है. जिसे भी पैदल चलने में कष्ट होता हो, उसे अपने घर में टीवी के सामने बैठकर दुनिया देखनी चाहिए लेकिन यदि घर से निकल पड़े तो ट्रेन, टैक्सी, ऑटो, होटल की विविध समस्यायों के साथ पैरों का दर्द भी सहना होगा, यह यात्रा का समानान्तर सुख है.           एक दिन की बात है, जाने-माने कवि-व्यंग्यकार लालित्य ललित, असली नाम डा.ललित किशोर मंडोरा, सहायक संपादक नेशनल बुक ट्रस्ट, नयी दिल्ली, बिलासपुर आये थे, उनसे अचानक मुलाकात हो गयी. उन्होंने मुझे कुल्लू में होने वाले 'व्यंग...

मंडला में मन डोला

मंडला में मन डोला : ---------------------           हिन्दू मान्यता के अनुसार चार युगों में एक त्रेता युग है। यह मानवकाल का द्वितीय युग था जिसमें भगवान विष्णु के पांचवें, छठवें और सातवें अवतार क्रमशः वामन, परशुराम और राम  के रूप में प्रगट हुए। त्रेता युग 12,96,000 वर्ष का था। इसी युग में महर्षि बाल्मीकि ने अपनी अंतर्दृष्टि से राम जन्म से लेकर रावण वध तक की घटनाओं को घटने के पूर्व ही देख लिया था और रामायण महाकाव्य की रचना की। बाल्मीकि के पिता का नाम वरुण और माँ का नाम चार्ष्णी था। वे अपने माता-पिता की दसवीं संतान थे। महर्षि बाल्मीकि राम के समकालीन थे।           रामकथा के अनुसार जब लोकनिन्दा के डर से राम ने अपनी गर्भवती पत्नी सीता को त्याग दिया तो लक्ष्मण उन्हें तमसा नदी के किनारे छोड़ आए। जब यह सूचना वाल्मीकि तक पहुंची तो वे स्वयं नदी के तट पर पहुंचे। दुख से विकल सीता को देखकर उनका पितृत्व जागा और उन्होंने वात्सल्य से सीता के सिर पर हाथ फेर कर आश्वासन दिया कि वह पुत्रीवत् उनके आश्रम में रहे। सीता उनके साथ आश्रम पहुंची और वहाँ रहने लगी...

भोपाल की गपशप

भोपाल की गपशप ============= (१)           भोपाल इसके पहले कई बार जा चुका था लेकिन इस बार की बात कुछ और थी। इस लेखक को बहुत बड़े 'केनवास' पर अपनी बात कहने का अवसर मिल रहा था, लेखक से 'साहित्यकार' बनने के लिए ललचायमान हृदय को संतोष का अनुभव हो रहा था।           जब से टीवी देखना शुरू किया था, लगभग तीस वर्ष पूर्व से, तब से कई बार दिल खुद से पूछता था कि इस खिड़की से क्या कभी मैं झाकूंगा ? मेरे मित्र शिवशंकर गहलोत ने मेरी चिरप्रतीक्षित अभिलाषा को साकार कर दिया और उनके सहयोग से मैं भोपाल के दूरदर्शन कें द्र में उड़ते-लहराते पहुँच गया। दोपहर के साढ़े बारह बजे थे, शूटिंग का समय हो चुका था। कार्यक्रम संयोजक सुश्री नीलेश रघुवंशी ने मुझे एक सहायक के साथ 'मेक-अप-रूम' में भेजा।           कमरे में दो शृंगार बालाएँ, दो कुर्सियाँ, दो दर्पण थे। एक कुर्सी पर मैं अपनी आँखें बन्द करके बैठ गया। चेहरे पर 'पफ' के खुशबूदार पावडर का स्पर्श मनमोहक था। चूंकि किसी 'ब्यूटी पार्लर' में सजने-सँवरने का मेरा पूर्व-अनुभव न था, यह अल्पकालि...

सुनो जी ये कलकत्ता है

सुनो जी ये कलकत्ता है ================ (१)            फिल्म हावड़ा ब्रिज (1958) को आशा भोसले के गाए इस एक गीत ने यादगार बना दिया- 'आइए मेहरबान, बैठिए जान-ए-जान, शौक से लीजिए फिर, इश्क के इम्तिहान॰' इसी फिल्म में एक और गीत उन दिनों बेहद लोकप्रिय हुआ था जिसे मोहम्मद रफी ने गाया था- 'चौरंगी के चौक में देखो मतवाले बंगाली रसगुल्ले सी मीठी बातें इनकी शान निराली, कहीं मुखर्जी कहीं बनर्जी कहीं घोष कहीं दत्ता है, सुनो जी ये कलकत्ता है॰ ईंट की दुक्की पान का इक्का, कहीं जोकर कहीं सत्ता है, सुनो जी ये कलकत्ता है॰'           घोड़े वाली बग्घियाँ अब गुम हो चुकी हैं, बंगालियों की भीड़ दिखाई नहीं पड़ती, यहाँ तक कि कलकत्ता भी लापता हो चुका, अब वहाँ कोलकाता नाम का महानगर है। देश भर से आए प्रवासियों का लहराता हुजूम जिसमें कुछ बंगाली भी हैं, जो पेट भरने या फिर जेब भरने की चाहत में कोलकाता की सड़कों पर भटक रहा है। भारत की इस पुरानी राजधानी कलकत्ता की रातें अब भी वैसी रंगीन है जैसी अंग्रेजों के समय थी लेकिन कोलकाता के दिन का उजाला वैसा ह...